नई दिल्ली: मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को लेकर चुनाव आयोग के भीतर मतभेद चलने की खबर सामने आ रही है। इस मामले पर सफाई देते हुए भारतीय निर्वाचन आयोग (ECI) ने कहा कि किसी मामले पर चर्चा के दौरान चुनाव आयुक्त का सवाल उठाना, अपनी प्रतिक्रिया या राय रखना एक सामान्य प्रक्रिया है। तीन सदस्यीय आयोग में सभी आयुक्तों की समान भूमिका होती है और अगर किसी मुद्दे को लेकर आपस में मतभेद हो तो, बहुमत के आधार पर फैसला किया जाता है। इसलिए किसी भी ऐसी टिप्पणी को औपचारिक असहमति नहीं माना जा सकता है।
किसी भी मुद्दे पर फैसला लेने से पहले तीनों आयुक्तों के हस्ताक्षर जरूरी
भारतीय निर्वाचन आयोग के अनुसार, किसी भी मुद्दे पर फैसले लेने का अधिकार तीन अधिकारियों के पास है। इनमें मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू एवं विवेक जोशी का नाम शामिल हैं। इसलिए चुनाव आयोग में किसी भी मामले में फैसले पर मुहर लगने का अधिकार इन तीनों पर है। किसी भी फैसले पर तीनों अधिकारियों के सहमति के साथ हस्ताक्षर होने जरूरी हैं। भारतीय निर्वाचन आयोग के नियमों के मुताबिक, अगर तीन में से दो चुनाव आयुक्त किसी मामले पर सहमत होते हैं और एक असहमत होता है, तो फैसला बहुमत का मान्य होगा।
SIR से जुड़े मामलों को लेकर चुनाव आयुक्तों में मदभेद
दरअसल, सूत्रों के मुताबिक SIR से जुड़े कुछ मामलों पर दोनों चुनाव आयुक्तों ने टिप्पणियां की थीं। लेकिन इसके बाद किसी भी चुनाव आयुक्त ने अंतिम फैसले के खिलाफ औपचारिक असहमति नहीं जताई। इस मुद्दे को लेकर चुनाव आयोग ने स्पष्ट करते हुए कहा कि जिन आदेशों को लेकर सवाल उठ रहे हैं, उन पर तीनों सदस्यों के हस्ताक्षर हैं। हालांकि, एक रिपोर्ट के मुताबिक चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू एवं विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में SIR से जुड़े फैसलों तथा आदेशों पर कम से कम 14 बार रिकॉर्ड पर आपत्ति जताई है और दोनों ने बिना एक-दूसरे को जानकारी दिए बगैर कुछ कदम भी उठाए उठाए थे।
फैसले को लेकर पहले भी हो चुके हैं आपसी मतभेद
हालांकि चुनाव आयोग के इतिहास में ऐसा पहली बार नहीं हुआ है कि किसी चुनाव आयुक्त ने बहुमत की राय से अलग अपनी राय रखी हो। इस संदर्भ में वर्ष 2009 में तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त एन. गोपालस्वामी ने सोनिया गांधी की अयोग्यता से जुड़े मुद्दे पर चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी एवं नवीन चावला से अलग अपनी राय रखी थी। इसके बाद साल 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान तत्कालीन चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने पीएम मोदी के भाषण सहित आचार संहिता से जुड़ी कुछ शिकायतों पर अपने सहयोगियों से अलग अपनी राय दी थी।
ये भी पढ़े-