समलैंगिक विवाह मामले में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई, पांच साल में काफी चीजें बदली है- चीफ जस्टिस चंद्रचूड़

देश में समलैंगिक विवाह को मान्यता देने के लिए यह सुनवाई की जा रही है। इस विषय में सभी पक्ष अपनी दलील पेश कर रहे है। इस मामले में सुनवाई कर रहे चीफ जस्टिस डी.वाई चंद्रचूड़ ने कहा कि बीते पांच सालों में काफी चीजें बदल गई हैं।

18 April 2023

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समलैंगिक विवाह को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हो रही है। देश में समलैंगिक विवाह को मान्यता देने के लिए यह सुनवाई की जा रही है। इस विषय में सभी पक्ष अपनी दलील पेश कर रहे है। इस मामले में सुनवाई कर रहे चीफ जस्टिस डी.वाई चंद्रचूड ने कहा कि बीते पांच सालों में काफी चीजें बदल गई हैं। समलैंगिकता को लेकर देश में स्वीकार्यता बढ़ी है।

सुनवाई से पहले जमीयत उलेमा-ए-हिन्द के वकील कपिल सिब्बल ने इस मामले में राज्यों का भी पक्ष सुने जाने का सुझाव दिया है। केंद्र सरकार का पक्ष रख रहे सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि, हम सुनवाई का विरोध कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि पहले हमारी आपत्ति पर विचार हो। यह मुद्दा संसद के अधिकार क्षेत्र का है कोर्ट शादी की नई व्यवस्था नहीं बना सकता है। जिस पर चीफ जस्टिस ने कहा कि हमें पहले याचिकाकर्ताओं की दलील सुनने दीजिए। आप सभी अपनी बात बाद में रख सकते हैं।

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सुनवाई के दौरान तुषार मेहता ने कहा

समलैंगिक विवाह मामले पर सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई के दौरान तुषार मेहता ने कहा कि, पहले हमारी आपत्ति पर विचार करना बेहतर रहेगा। वहीं मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की ओर से सुनवाई कर रहे कपील सिब्बल ने भी सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की बातों को समर्थन करते हुए कहा कि यह मामला पर्सनल लॉ से जुड़ा है। इस लॉ से जुड़ी व्यवस्थाएं प्रभावित होगी। तुषार मेहता याचिकाकर्ता की सुनवाई से पहले कहा कि, ‘मैं अभी केस के मेरिट पर कुछ नहीं बोलूंगा। सिर्फ इस पर बात करूंगा कि सुनवाई हो या नहीं।’

सीजेआई ने सुनवाई में कहा कि, यह हमें तय करने दीजिए कि केस पर सुनवाई कैसे होगी। हम शुरू में याचिकाकर्ता पक्ष को थोड़ी देर सुनना चाहते हैं।

यह मौलिक अधिकार का मामला है- याचिकाकर्ता के वकील

इस मामले पर याचिकाकर्ता के वकील मुकुल रोहतगी ने अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि, हमें कोर्ट का दरवाजा खटखटाने से कोई नहीं रोक सकता। मुझे अपनी बात रखने दीजिए। याचिकाकर्ता पक्ष की ओर से दूसरे वकील विश्वनाथन ने भी अपना तर्क रखते हुए कहा कि, हम इसे संसद पर नहीं छोड़ सकते हैं। यह मौलिक अधिकारों का मामला है।

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