नई दिल्ली: देश की राजधानी दिल्ली में कचरा प्रबंधन एक बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। शहर में रोजाना पैदा होने वाले कचरे और उसके निपटान की क्षमता के बीच बड़ा अंतर सामने आया है। दिल्ली में हर दिन करीब 13,500 टन कचरा पैदा होता है, जबकि लगभग 8,000 टन कचरे का ही प्रसंस्करण हो पा रहा है। इस तरह रोजाना करीब 5,500 टन कचरे के प्रबंधन का अंतर बना हुआ है। इसका असर कचरा उठाने की व्यवस्था से लेकर सड़कों पर जमा होने वाले कूड़े और लैंडफिल साइटों पर पड़ रहा है।

रोजाना पैदा हो रहा हजारों टन अतिरिक्त कचरा

दिल्ली में आबादी और शहरी गतिविधियों के साथ कचरे की मात्रा भी बढ़ रही है। घरों, बाजारों, कार्यालयों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों से निकलने वाले कचरे को इकट्ठा करना, अलग-अलग करना और उसका उचित निपटान करना नगर निगम के लिए बड़ी जिम्मेदारी है। लेकिन जब कचरे की मात्रा और उसे प्रोसेस करने की क्षमता के बीच इतना अंतर हो, तो पूरी व्यवस्था पर दबाव बढ़ना स्वाभाविक है।

कचरे का समय पर उठाव नहीं होने पर उसका ढेर सड़कों, गलियों और खाली जगहों पर दिखाई देने लगता है। इससे आसपास रहने वाले लोगों को परेशानी होती है और साफ-सफाई बनाए रखना भी मुश्किल हो जाता है।

लैंडफिल साइटों पर भी बढ़ा दबाव

दिल्ली में लंबे समय से लैंडफिल साइटों पर जमा कचरे का निपटान एक बड़ी समस्या रहा है। इन जगहों पर कचरे के विशाल ढेर को कम करने के लिए अलग-अलग उपाय किए जा रहे हैं। हालांकि, पुराने कचरे को हटाने और रोजाना निकलने वाले नए कचरे का प्रबंधन करना दो अलग-अलग चुनौतियां हैं।

अगर नए कचरे को पर्याप्त क्षमता के साथ प्रोसेस नहीं किया जाता, तो लैंडफिल साइटों पर दबाव बना रहता है। वहीं, कचरे को अलग-अलग किए बिना सीधे डंप करने से उसके वैज्ञानिक निपटान और पुनर्चक्रण की संभावनाएं भी प्रभावित होती हैं।

कचरा प्रबंधन की व्यवस्था पर सवाल

दिल्ली में कचरा प्रबंधन की जिम्मेदारी केवल कूड़ा उठाने तक सीमित नहीं है। इसमें घरों से नियमित संग्रह, कचरे का पृथक्करण, परिवहन, प्रसंस्करण और अंतिम निपटान जैसे कई चरण शामिल हैं। किसी एक स्तर पर कमी आने से पूरी व्यवस्था प्रभावित हो सकती है।

ऐसे में कचरा संग्रह की नियमित निगरानी, प्रसंस्करण संयंत्रों की क्षमता बढ़ाना और लोगों को गीले व सूखे कचरे को अलग रखने के लिए प्रोत्साहित करना जरूरी है। दिल्ली में रोजाना पैदा होने वाले कचरे और उसके प्रसंस्करण के बीच 5,500 टन का अंतर इस बात की ओर इशारा करता है कि शहर की जरूरतों के अनुरूप व्यवस्था को मजबूत करने की आवश्यकता है।

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