नवरात्रि और दशहरे के मौके पर जयपुर में आपसी भाईचारे और सांप्रदायिक सद्भाव की एक खूबसूरत तस्वीर देखने को मिल रही है। शहर के आदर्श नगर में दशहरे के बड़े आयोजन के लिए 105 फीट ऊंचा रावण का पुतला तैयार किया जा रहा है। खास बात यह है कि इस पुतले को बनाने का काम मुस्लिम समुदाय के 20 कारीगर कर रहे हैं। ये सभी कलाकार करीब दो महीने पहले मथुरा से जयपुर पहुंचे थे।
दशहरा कमेटी ने इन कारीगरों के काम को सम्मान देने का फैसला किया है। विजयादशमी के दिन उन्हें मंच पर सम्मानित किया जाएगा, ताकि समाज में एकता और आपसी सद्भाव का संदेश दिया जा सके।
पांच पीढ़ियों से चली आ रही है पुतला बनाने की परंपरा
रावण का पुतला बनाने का काम इन कलाकारों के परिवार में कई पीढ़ियों से चला आ रहा है। मुख्य कारीगर चांद बाबू के पूर्वजों ने करीब पांच पीढ़ी पहले इस काम की शुरुआत की थी। बताया जाता है कि लगभग 65 साल पहले यहां 20 फीट ऊंचा रावण का पुतला महज 250 रुपये में तैयार किया गया था। आज भले ही परिवार के कई लोग दूसरे कामों से जुड़ गए हों, लेकिन वे अपने पूर्वजों की इस परंपरा को अब भी निभा रहे हैं, उनके लिए यह काम केवल रोजी-रोटी का जरिया नहीं, बल्कि परिवार की विरासत और आपसी सम्मान से भी जुड़ा हुआ है।
कलाकार का कोई धर्म नहीं होता
आदर्श नगर दशहरा कमेटी के उपाध्यक्ष राजीव मनचंदा का कहना है कि कलाकारों को धर्म के आधार पर नहीं बांटना चाहिए। कलाकार की पहचान उसके हुनर और मेहनत से होती है, न कि उसके धर्म से, उन्होंने बताया कि मुस्लिम कारीगर पूरी लगन और जिम्मेदारी के साथ रावण का पुतला तैयार करते हैं। कमेटी उनके काम की कद्र करती है और इसी वजह से हर साल उनकी मेहनत को सम्मान दिया जाता है।
आदर्श नगर में जुटते हैं हजारों लोग
जयपुर के आदर्श नगर में दशहरे पर बड़े स्तर पर रावण दहन का आयोजन किया जाता है। यहां 105 फीट ऊंचे रावण के पुतले को जलाया जाता है। इससे पहले शानदार आतिशबाजी भी होती है। इस आयोजन को देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं। खबर के मुताबिक, कार्यक्रम में करीब एक लाख लोगों के शामिल होने की उम्मीद रहती है।
पूर्वजों की परंपरा से आज भी जुड़े हैं कारीगर
पुतला बनाने वाले कारीगरों का कहना है कि उनके परिवार के लोग कई साल पहले इस पेशे से दूर हो गए थे, लेकिन इसके बावजूद वे पूर्वजों की परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं, उनका मानना है कि यहां उन्हें जो प्यार और सम्मान मिलता है, वह पैसों से कहीं ज्यादा कीमती है। चांद बाबू के छोटे भाई के परिवार से जुड़ा एक प्रसंग भी इस परंपरा के प्रति उनकी आस्था को दर्शाता है। परिवार के मुताबिक, साल 2011 में रावण का पुतला बनाने के दौरान उनके घर बेटे का जन्म हुआ था। परिवार इसे भगवान राम की कृपा मानता है।
ये भी पढ़ें- अभिजीत दीपके की हिरासत पर शशि थरूर ने पुलिस से मांगा जवाब, कहा-तिरंगा लेकर चलना अपराध...
मुस्लिम कारीगरों के रहने-खाने का भी इंतजाम
जयपुर का यह आयोजन धार्मिक सौहार्द और गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल पेश करता है। मथुरा से आने वाले मुस्लिम कारीगरों के ठहरने और खाने-पीने की व्यवस्था भी आयोजन समिति की ओर से की जाती है। जानकारी के अनुसार, उनके रहने का इंतजाम प्रभु राम के मंदिर परिसर में किया जाता है। दशहरा कमेटी का कहना है कि इस पहल के जरिए देशभर में भाईचारे और एकता का संदेश देना उनका उद्देश्य है। अलग-अलग धर्मों के लोग जब मिलकर किसी परंपरा को आगे बढ़ाते हैं, तो यह दिखाता है कि इंसानियत, कला और आपसी सम्मान किसी एक धर्म तक सीमित नहीं हैं।