नई दिल्ली: लद्दाख को लोकतांत्रिक अधिकार और संवैधानिक सुरक्षा देने के मुद्दे पर केंद्र सरकार और स्थानीय प्रतिनिधियों के बीच मतभेद अब भी बरकरार हैं। सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने गृह मंत्रालय (MHA), लेह एपेक्स बॉडी (LAB) और कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस (KDA) के बीच हुई ताजा बातचीत के नतीजों को असंतोषजनक बताया है। उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था, विधानसभा और उसके अधिकारों की सुरक्षा जैसे प्रमुख मुद्दों पर दोनों पक्षों के बीच अब भी बड़ा अंतर है।

लेह में पत्रकारों से बातचीत करते हुए वांगचुक ने कहा कि केंद्र सरकार ने अगले दिन सुबह तक संशोधित प्रस्ताव का मसौदा देने की बात कही है। इसलिए फिलहाल बातचीत को पूरी तरह विफल नहीं माना जाएगा, बल्कि इसे आगे जारी प्रक्रिया के रूप में देखा जाएगा। हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि मौजूदा चर्चा से लद्दाख के लोगों को संतुष्टि नहीं मिली है।

विधानसभा और लोकतांत्रिक अधिकारों पर अटका मामला
वांगचुक के मुताबिक, स्थानीय प्रतिनिधियों को उम्मीद थी कि बातचीत में कुछ सीमित मुद्दों पर ही मतभेद सामने आएंगे, लेकिन दोनों पक्षों की अपेक्षाओं के बीच बड़ा अंतर दिखाई दिया। उन्होंने कहा कि चर्चा का मुख्य केंद्र लद्दाख में लोकतांत्रिक व्यवस्था स्थापित करने, विधानसभा के गठन और उसके अधिकारों को संवैधानिक सुरक्षा देने जैसे मुद्दे थे।

उन्होंने बताया कि इन विषयों पर बातचीत से कोई खास प्रगति नहीं हुई है। अब स्थानीय नेतृत्व केंद्र की ओर से आने वाले संशोधित प्रस्ताव की समीक्षा करेगा और देखेगा कि उसमें उनकी प्रमुख मांगों को कितनी जगह दी गई है।

22 अक्टूबर को दिल्ली में अगली बैठक की उम्मीद
वांगचुक ने कहा कि केंद्र सरकार के संशोधित मसौदे से उन्हें कुछ बदलावों की उम्मीद है। अगली बैठक 22 अक्टूबर को दिल्ली में प्रस्तावित है। स्थानीय प्रतिनिधियों को उम्मीद है कि इस बैठक से पहले सरकार की ओर से ऐसा प्रस्ताव आएगा, जिसमें लद्दाख की मांगों पर गंभीरता से विचार किया गया हो। उन्होंने कहा कि अगली बैठक का परिणाम सकारात्मक रहने की उम्मीद है, लेकिन इसके लिए संशोधित मसौदे में ठोस बदलाव जरूरी होंगे।

छठी अनुसूची और पूर्ण राज्य का दर्जा है प्रमुख मांग
लद्दाख के प्रतिनिधि लंबे समय से क्षेत्र को संविधान की छठी अनुसूची के तहत सुरक्षा देने और पूर्ण राज्य का दर्जा प्रदान करने की मांग कर रहे हैं। छठी अनुसूची में कुछ पूर्वोत्तर राज्यों के जनजातीय क्षेत्रों के प्रशासन के लिए विशेष संवैधानिक प्रावधान और स्वायत्त जिला परिषदों की व्यवस्था है। वहीं, केंद्र सरकार की ओर से अनुच्छेद 371 के तहत संवैधानिक सुरक्षा देने का विकल्प प्रस्तावित किए जाने की बात सामने आई है। दोनों व्यवस्थाओं के कानूनी प्रावधान और लागू होने का तरीका अलग है, इसलिए स्थानीय प्रतिनिधि अपनी मांगों के अनुरूप ठोस सुरक्षा चाहते हैं।

हाइब्रिड विधानसभा मॉडल से समाधान की कोशिश
वांगचुक के अनुसार, लद्दाख के सामने एक चुनौती यह भी है कि क्षेत्र के पास फिलहाल पूर्ण राज्य जैसी प्रशासनिक व्यवस्था चलाने और सरकारी कर्मचारियों के खर्च का बोझ उठाने के लिए पर्याप्त स्थानीय राजस्व नहीं है। इसी संदर्भ में स्थानीय प्रतिनिधियों की ओर से हाइब्रिड विधानसभा मॉडल का विकल्प सामने रखा गया है।

इस प्रस्ताव का उद्देश्य लद्दाख को स्थानीय स्तर पर कानून बनाने और लोकतांत्रिक जवाबदेही की व्यवस्था देना है, जबकि पूर्ण राज्य की व्यवस्था से जुड़ा बड़ा वित्तीय बोझ तत्काल न पड़े। प्रस्तावित मॉडल के तहत स्थानीय प्रशासन को निर्वाचित नेतृत्व के प्रति जवाबदेह बनाने की परिकल्पना है, न कि केवल केंद्र द्वारा नियुक्त उपराज्यपाल के अधीन रखने की।

हालांकि, इस मॉडल की अंतिम रूपरेखा और केंद्र सरकार की सहमति अभी स्पष्ट नहीं है। ऐसे में संशोधित मसौदा और 22 अक्टूबर को प्रस्तावित बैठक लद्दाख की संवैधानिक मांगों पर आगे की दिशा तय करने के लिहाज से अहम माने जा रहे हैं। 

और पढ़ें: 

CJP के ‘लहरा दो तिरंगा’ मार्च से पहले दिल्ली में सुरक्षा सख्त, पुलिस ने जारी की एडवाइजरी