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डोनाल्ड ट्रम्प के दो आर्थिक सलाहकार, केविन हैसेट और पीटर नवारो, ने भारत को रूसी तेल के निरंतर आयात और अमेरिकी वस्तुओं के लिए अपने बाजार को खोलने में नीति पर कड़ी चेतावनी जारी की है। अलग-अलग इंटरव्यूज में दी गई उनकी टिप्पणियां ट्रम्प प्रशासन की नई नीति का संकेत देती हैं, जो व्यापार नीति को भू-राजनीति से जोडती है।
"भारत न झुके, तो राष्ट्रपति भी नहीं झुकेंगे"
राष्ट्रीय आर्थिक परिषद के निदेशक हैसेट ने भारतीय आयातों पर वाशिंगटन द्वारा लगाए गए नए भारी शुल्कों को सीधे तौर पर रूस के प्रति नई दिल्ली के रुख से जोड़ा। उन्होंने कहा कि यदि भारत अपने रुख में न झुके, तो राष्ट्रपति ट्रंप भी झुकेंगे नहीं। हैसेट ने भारतीय बाज़ार खोलने में "पॉलिसी" की आलोचना की और भारत के साथ व्यापार वार्ता को "मुश्किल" बताया।
यूक्रेन युद्ध को लंबा खींचने के आरोप
ट्रंप प्रशासन ने भारतीय इम्पपोर्रट्स पर टैरिफ दोगुना करके रिकॉर्ड 50% कर दिया है, जो किसी देश पर लगाए गए टैरिफ की तुलना में सबसे अधिक है। आधे हिस्से का संबंध भारत द्वारा रूसी कच्चे तेल की खरीद से जुड़ा है। अमेरिकी अधिकारियों का दावा है कि यह कदम वेस्टर्न सैंक्शन को मज़बूत करने और यूक्रेन युद्ध को लंबा खींचने के प्रयास का हिस्सा है।
व्हाइट हाउस के व्यापार सलाहकार पीटर नवारो ने कहा..
हैसेट ने साफ कहा कि ये सिर्फ़ व्यापार का मामला नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य रूस पर शांति समझौता करने का दबाव डालना और लाखों लोगों की जान बचाना भी है। वहीं, व्हाइट हाउस के व्यापार सलाहकार पीटर नवारो ने भारत पर रूसी "युद्ध प्रयास" को बढ़ावा देने का आरोप लगाया।
"मोदी का युद्ध"
एक इंटरव्यू में नवारो ने इसे "मोदी का युद्ध" कहा और आरोप लगाया कि भारत के रियायती तेल आयात से यूक्रेन संघर्ष लंबा खिंच रहा है। उन्होंने कहा कि भारत द्वारा ऊंचे टैरिफ के कारण अमेरिका में उपभोक्ता, व्यवसाय और करदाता प्रभावित हो रहे हैं।
वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट का बयान
इस आक्रामक बयानबाज़ी ने अमेरिका-भारत संबंधों में बढ़ते तनाव को उजागर किया है। वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने भी भारत पर व्यापार वार्ता में ढिलाई बरतने का आरोप लगाया, जबकि हैसेट ने संकेत दिया कि प्रशासन अभी भी लॉन्ग टर्म संभावनाओं के द्वार खुले रखता है।
विदेश मंत्री का करारा जवाब
भारत ने इस बढ़े हुए टैरिफ पर कड़ा विरोध जताया है। विदेश मंत्रालय ने इसे "बेहद दुर्भाग्यपूर्ण" बताया और कहा कि उसके ऊर्जा संबंधी फैसले बाज़ार की जरूरतों पर आधारित हैं, न कि राजनीतिक दबाव पर। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने दोहरे मानदंडों की ओर इशारा करते हुए कहा कि भारत रूसी तेल का सबसे बड़ा खरीदार नहीं है, बल्कि चीन है, और यूरोपीय संघ एलएनजी का सबसे बड़ा उपभोक्ता है। उन्होंने कहा कि भारत को वैश्विक ऊर्जा बाजार स्थिर करने के लिए प्रोत्साहित किया गया था, और अब इसका इस्तेमाल उसके खिलाफ किया जा रहा है।
Posted By-Tulsi Tiwari