Prof Salim Engineer: जमाअत-ए-इस्लामी हिंद ने सरकार से अपील की है कि वह जनहित के मुद्दों पर टकराव के बजाय बातचीत का रास्ता अपनाए। संगठन ने इबादतगाहों को निरंतर निशाना बनाए जाने, मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) और शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक विरोध-प्रदर्शनों पर लगाई गई पाबंदियों को लेकर गंभीर चिंता जताई है।

मतदाता सूची पुनरीक्षण (SIR) में अनियमितता और चुनाव आयोग पर सवाल

जमाअत-ए-इस्लामी हिंद के मुख्यालय में आयोजित मासिक प्रेस कांफ्रेंस को सम्बोधित करते हुए जमाअत के उपाध्यक्ष प्रोफेसर सलीम इंजीनियर ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण के तरीके पर चिंता व्यक्त की और कहा, "लाखों मूल वोटर्स सहित लगभग 13 करोड़ नामों को हटाए जाने की खबर ने व्यापक चिंता पैदा कर दी है। मतदाता सूची प्रतिनिधि लोकतंत्र का आधार है। बड़े पैमाने पर इसमें बदलाव के लिए असाधारण पारदर्शिता, सावधानी और सुधार के लिए सुलभ व्यवस्था अनिवार्य है।

मुख्य चुनाव आयुक्त से अपील

चुनाव से जुड़े फैसलों, भारत के चुनाव आयोग की आज़ादी और उसके संवैधानिक कामकाज, और वोट देने के अधिकार पर असर डालने वाले मामलों में न्यायपालिका के रवैये को लेकर उठे सवालों ने जनता के भरोसे को और कमज़ोर कर दिया है। लोकतांत्रिक संस्थाओं में घटता भरोसा कानून-व्यवस्था और देश की स्थिरता के लिए बड़ी चिंता का कारण बन सकता है।जमात-ए-इस्लामी हिंद ने मुख्य चुनाव आयुक्त से अपील की है कि वे वोटर लिस्ट की प्रक्रिया से जुड़ी गंभीर चिंताओं के लिए नैतिक ज़िम्मेदारी लें और अगर आयोग जनता का भरोसा बनाए रखने में नाकाम रहता है, तो स्वेच्छा से पद छोड़ दें।

SIR प्रक्रिया को रोका जाना चाहिए

SIR प्रक्रिया को रोका जाना चाहिए, पुनरीक्षण से प्रभावित पात्र मतदाताओं की पहचान की जानी चाहिए और उनके नाम बहाल किए जाने चाहिए। अनियमितताओं की स्वतंत्र जांच होनी चाहिए और जहां भी गड़बड़ी साबित हो वहां जवाबदेही तय की जानी चाहिए। निष्पक्षता और तटस्थता सुनिश्चित करने के लिए चुनाव आयोग के गठन और नियुक्ति प्रक्रिया में सुधार किए जाने चाहिए, जिसमें सरकार, विपक्ष और न्यायपालिका की सार्थक भागीदारी हो।"

शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों पर पुलिसिया पाबंदी और लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन

प्रोफेसर सलीम इंजीनियर ने शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक विरोध को हतोत्साहित करने के लिए प्रशासनिक प्रक्रियाओं और पुलिस प्रतिबंधों के बढ़ते उपयोग का मुद्दा भी उठाया। हाल के विरोध प्रदर्शनों का ज़िक्र करते हुए - जिनमें ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और इंडियन मुस्लिम्स की मॉनिटरिंग कमिटी द्वारा बुलाए गए प्रदर्शन, और साथ ही 2 अक्टूबर को SIR और मुख्य चुनाव आयुक्त के ख़िलाफ़ हुआ सार्वजनिक विरोध प्रदर्शन शामिल हैं - उन्होंने कहा, "शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को अनुमति न देना और उन्हें हिरासत में लेना, लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति के लिए उपलब्ध जगह पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

शां तिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन

उन्होंने कहा कि शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन नागरिकों के लिए सरकार के फैसलों और संस्थागत कार्यों पर सवाल उठाने का एक वैध लोकतांत्रिक माध्यम है। हम सरकार और पुलिस अधिकारियों से शांतिपूर्ण सार्वजनिक अभिव्यक्ति के लिए पूर्व अनुमति को अनावश्यक बनाने का आग्रह करते हैं। सार्वजनिक सुरक्षा के लिए पूर्व सूचना और उचित व्यवस्था आम तौर पर पर्याप्त होती है। हम गैर-ज़रूरी हिरासत और बेबुनियाद FIR को खत्म करने, पुलिस के दुर्व्यवहार के आरोपों की निष्पक्ष जांच करने और दोषी पाए जाने वाले अधिकारियों की जवाबदेही तय करने की मांग करते हैं। सरकार को टकराव के बजाय बातचीत का रास्ता चुनना चाहिए, नागरिकों और संगठनों से सीधे जुड़ना चाहिए, और लोकतांत्रिक तरीके से बातचीत और संस्थागत संवाद के ज़रिए जायज़ शिकायतों का समाधान करना चाहिए।"

इबादतगाहों को निशाना बनाने और गैर-कानूनी तोड़-फोड़ पर चिंता

जमाअत-ए-इस्लामी हिंद के दूसरे उपाध्यक्ष मलिक मोतसिम खान ने मस्जिदों, चर्चों और इबादतगाहों को निरंतर निशाना बनाए जाने पर चिंता जताई और कहा, "इन तोड़-फोड़ की घटनाओं से धार्मिक अल्पसंख्यकों में बड़े पैमाने पर नाराज़गी, बेचैनी और निराशा पैदा हो रही है। इबादतगाहों का गहरा धार्मिक और भावनात्मक महत्व होता है। उनके खिलाफ किसी भी कार्रवाई के लिए निष्पक्षता, संवेदनशीलता और कानून का सख्ती से पालन ज़रूरी है। मुसलमानों और ईसाइयों के धार्मिक स्थलों के खिलाफ़ कानून का लक्षित इस्तेमाल प्रशासन की विश्वसनीयता को नुकसान पहुँचा है।

धार्मिक स्थलों से जुड़े विवाद

धार्मिक स्थलों से जुड़े बार-बार होने वाले विवाद सामाजिक तनाव पैदा कर रहे हैं और लोगों का ध्यान ज़रूरी आर्थिक और सामाजिक मुद्दों से हटा रहे हैं। अगर इस तरह निशाना बनाना जारी रहा तो विरोध प्रदर्शन फैल सकते हैं और एक बड़े जन-आंदोलन का रूप ले सकते हैं। हम अधिकारियों से अपील करते हैं कि वे इबादतगाहों से जुड़े मामलों में कानूनों के दुरुपयोग को तुरंत रोकें और कोई भी कार्रवाई करने से पहले सभी पक्षों के दावों और चिंताओं की सावधानीपूर्वक जांच की जाए।

सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में निष्पक्ष जांच

विवादों को, जहाँ तक संभव हो विवादों को नियमितीकरण, कानूनी समझौते या अन्य वैध तरीकों से सुलझाया जाना चाहिए और तोड़-फोड़ से बचना चाहिए। अपरिहार्य कारणों से जब किसी अंतिम न्यायिक या कानूनी फैसले के तहत तोड़-फोड़ करना हो तो यह प्रक्रिया न्यायिक निगरानी में होनी चाहिए। हम यह भी मांग करते हैं कि जिन मामलों में तोड़-फोड़ की वैधता पर सवाल उठे हैं उनकी सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में निष्पक्ष जांच हो और जहां भी गैर-कानूनी तोड़-फोड़ साबित हो वहां बहाली के लिए उचित कदम उठाए जाएं।"

Reported By: M. Atharuddin Munne Bharti