नई दिल्ली। जम्मू और कश्मीर से अनुच्छेद 370 को 5 अगस्त, 2019 को हटाया गया था। कल यानि 5 अगस्त, 2026 को अनुच्छेद 370 हटाने की सातवीं सालगिरह है। जम्मू-कश्मीर को अब जम्मू-कश्मीर और लद्दाख नाम के दो केंद्र शासित प्रदेशों में बांट दिया गया है। राज्य से धारा 370 को हटाने से समय से ही यह सवाल उठता रहा है कि आखिर इसे हटाने का क्या फायदा हुआ?

जम्मू-कश्मीर में लगातार आर्थिक प्रगति

जम्मू-कश्मीर और पाकिस्तान के कब्ज़े वाले जम्मू-कश्मीर (PoJK) की तुलना करने पर काफी चीजें स्पष्ट हो जाती है। दोनों क्षेत्रों में विकास की बिल्कुल अलग-अलग तस्वीरें दिखती हैं। भारत का यह केंद्र शासित प्रदेश आर्थिक विकास और बुनियादी ढांचे के विस्तार का गवाह बन रहा है, जबकि पाक अधिकृत कश्मीर आर्थिक तंगी, राजनीतिक अस्थिरता और बार-बार होने वाले विरोध-प्रदर्शनों से जूझ रहा है।

केंद्र शासित प्रदेश के वित्त पर 2024-25 की कैग (CAG) की रिपोर्ट के अनुसार, जम्मू-कश्मीर ने पिछले पाँच वर्षों में लगातार आर्थिक प्रगति की है।

केंद्र शासित प्रदेश का सकल राज्य घरेलू उत्पाद (GSDP) 2020-21 में 1.68 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 2024-25 में 2.62 लाख करोड़ रुपये हो गया, जबकि इसी अवधि में प्रति व्यक्ति आय 1.01 लाख रुपये से बढ़कर 1.55 लाख रुपये हो गई। रिपोर्ट विकास कार्यों पर होने वाले खर्च में भी उल्लेखनीय वृद्धि की ओर इशारा करती है। आर्थिक सेवाओं पर खर्च 2020-21 में 14,842 करोड़ रुपये से बढ़कर 2024-25 में 23,257 करोड़ रुपये हो गया, जबकि सामाजिक सेवाओं पर खर्च 21,964 करोड़ रुपये से बढ़कर 28,234 करोड़ रुपये हो गया।

सामाजिक और आर्थिक क्षेत्र के खर्च का संयुक्त हिस्सा 2024-25 में कुल खर्च का 62 प्रतिशत हो गया, जो विकासोन्मुख क्षेत्रों पर अधिक ज़ोर दिए जाने को दर्शाता है।

कैग ने यह भी बताया कि कुल खर्च और सकल राज्य घरेलू उत्पाद (GSDP) का अनुपात 2020-21 में 37.66 प्रतिशत से घटकर 2024-25 में 31.45 प्रतिशत हो गया। इससे पता चलता है कि जैसे-जैसे समग्र आर्थिक गतिविधियाँ बढ़ रही हैं, क्षेत्र की अर्थव्यवस्था सरकारी खर्च पर कम निर्भर होती जा रही है।

पाक अधिकृत कश्मीर में विरोध-प्रदर्शन

इसके विपरीत, पाकिस्तान के कब्ज़े वाला जम्मू-कश्मीर बढ़ती सामाजिक-आर्थिक चुनौतियों का सामना कर रहा है। इस क्षेत्र में आधिकारिक बेरोज़गारी दर 11 प्रतिशत है, जबकि युवाओं में बेरोज़गारी दर 27 प्रतिशत तक पहुँच गई है, जिसके कारण पढ़े-लिखे युवा अवसरों की तलाश में पलायन कर रहे हैं।

गरीबी भी एक बड़ी चिंता का विषय बनी हुई है। हालाँकि आधिकारिक गरीबी दर 12.65 प्रतिशत है, लेकिन लगातार आर्थिक दबावों के कारण ग्रामीण आबादी का लगभग 18.6 प्रतिशत हिस्सा गरीबी रेखा से नीचे जाने के जोखिम में है।

बिगड़ती आर्थिक स्थिति ने लोगों में व्यापक असंतोष पैदा किया है। निवासियों ने बिजली की बढ़ती दरों, खाने-पीने की चीज़ों की बढ़ती कीमतों और खराब शासन-व्यवस्था के खिलाफ़ बार-बार विरोध-प्रदर्शन किए हैं।

'जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी' (JAAC) के नेतृत्व में नागरिकों ने पूरे इलाके में शटडाउन, लंबी पदयात्राएँ और सविनय अवज्ञा अभियान आयोजित किए हैं। वे सब्सिडी वाले गेहूँ के आटे और इलाके के जल-विद्युत संसाधनों से पैदा होने वाली बिजली में उचित हिस्सेदारी की माँग कर रहे हैं।

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इस इलाके में मानवाधिकारों के उल्लंघन के बार-बार आरोप लगे हैं। साथ ही, राजनीतिक अशांति, लक्षित हत्याओं और राजनीतिक कार्यकर्ताओं के अपहरण की घटनाएँ भी हुई हैं, जिससे शासन और स्थिरता को लेकर चिंताएँ बढ़ गई हैं। 2019 में हुए संवैधानिक बदलावों के सात साल बाद, दोनों इलाकों की स्थिति बिल्कुल अलग-अलग है—एक तरफ़ बुनियादी ढांचे का विस्तार, विकास पर बढ़ता खर्च और आर्थिक प्रगति दिखाई देती है, जबकि दूसरी तरफ़ यह इलाका लगातार आर्थिक तंगी, राजनीतिक अशांति और जन-विरोध का सामना कर रहा है।

Written By: Pradeep Singh