Punjab News: त्योहार या खास अवसर पर बच्चों को देवी का वेश, श्री राम का व अन्य देवी देवताओं के वेश में देखा होगा। लेकिन क्या आपने बच्चों को लंगूर के वेश में देखा वो भी एक मंदिर के अंदर कभी देखा है। नहीं ना तो खबर आपके लिए जिसमें आज हम आपके देश के एक ऐसे मंदिर के बारे में बताने वाले हैं। जहां 9 दिन के खास मेले में मामा अपनी बहन के बच्चों को लंगूर का वेश बनाकर दर्शन कराने ले जाते हैं। जी हां सही सुना आपने हम बात कर रहे हैं, पंजाब के अमृतसर में स्थित बड़े हनुमान मंदिर की जहां 9 दिन का लंगूर मेला खत्म हो चुका है लेकिन। कुछ लोगों के सवाल अभी भी इस मंदिर और इसकी प्रथा को लेकर है? तो चलिए आपके तमाम सवालों के जवाब देते हुए इस मेले की खासियत के बारे में बताते हैं।

बच्चों के मामला बनाते हैं लंगूर

अमृतसर शहर के दुर्गियाना तीर्थ धाम में मौजूद बड़े हनुमान मंदिर में नवरात्रि में इस 9 दिन के मेले का आयोजन होता है, जो आज पूरी तरह समाप्त हो चुका है, लेकिन मंदिर में भक्तों की संख्या अभी भी इस अनोखे और आध्यात्मिक मेले को किसी त्योहार से कम नहीं मानती है। श्रद्धा और जोश के साथ 9 दिन तक चलने वाले पारंपरिक मेले की खासियत है सैकड़ों भक्तों का लंगूर वेश धारण करना।

आपके बता दें कि यह एक सिंबॉलिक रस्म है, जिसमें भक्त अपनी मन्नत मांगते हैं और मनोकामना पूरी होने के बाद अपने बच्चे को लंगूर का वेश धारण कराते है। इसमें सबसे ज्यादा खास बात यह है कि बच्चों के मामा उन्हें सिंबॉलिक रूप धारण कराते है। जो भगवान हनुमान जी का एक सिंबॉलिक स्वरूप है। दरअसल इसके पीछे एक धार्मिक मान्यता है कि निसंतान दंपती यहां भगवान हनुमान से संतान प्राप्ति की मन्नत मांगते हैं। मन्नत पूरी होने पर, माता-पिता अपने बच्चे को 'लंगूर' का विशेष रूप धारण कराकर मंदिर में धन्यवाद देते हैं।

मेला की खासियत

मेले की शुरुआत खास रस्म से होती है, जिसमें शामिल होने वाले लोग, बच्चे, मंदिर के पास बने पवित्र तालाब में दही लगाकर उसमें स्नान करते हैं। इसे भक्त पवित्रता और भक्ति का प्रतीक मानते है। इस रस्म के बाद दिव्य यात्रा निकाली जाती है। जिसमें बच्चों को चमकीले चांदी के रंग के पारंपरिक कपड़े, सिर पर टोपी और गहने पहनाए जाते हैं। भगवान हनुमान के छोटे अवतार जैसे दिखने वाले इन बच्चों को लंगूर कहा जाता है।

जो यात्रा में शामिल होते हैं। भक्त हनुमान के चरणों में सिर झुकाकर प्रार्थना करते हैं। फूल और मिठाई चढ़ाते हैं और भगवान का आशीर्वाद मांगते हैं। नवरात्रि के बाद तक चलने वाला खास मेला यूं तो 9 दिन का ही रहता है। लेकिन मेला इसके बाद भी कई दिन तक चलता है। कई माता-पिता बीमारी से ठीक होने, नौकरी में सफलता या बच्चे के जन्म जैसी इच्छाएं पूरी होने पर अपने बच्चों को लंगूर के रूप में चढ़ाने के किए वादे को पूरा करते हैं।

विदेशी नागरिक भी आते हैं मेला देखने

लंगूर मेला सिर्फ़ एक धार्मिक मेला नहीं है, यह एक जीवंत सांस्कृतिक नज़ारा है। मंदिर परिसर और आस-पास के इलाके भक्ति गीतों, ढोल की थाप और "जय बजरंग बली!" के जयकारे चारों तरफ उठते हैं। माहौल आस्था और जश्न का प्रतीक केवल देश में ही विदेशों में भी काफी ज्यादा प्रसिद्ध है। मेले के दौरान हज़ारों विदेशी विज़िटर्स यहां पहुंचते हैं जो मेला खत्म होने के कई दिन बाद तक वह मंदिर के इतिहास और खासियत के बारे में जानते हैं।

ऑर्गनाइज़र और मंदिर के अधिकारी भीड़ को मैनेज करने, पानी, खाने और सिक्योरिटी के खास इंतज़ाम करके मेले को मैनेज करते हैं। टूरिज़्म और धार्मिक विरासत दोनों के लिए इसकी काफी ज्यादा अहमियत है। हनुमान जी के भक्त हर वर्ष इस मेले का बेसब्री से इंतजार करते हैं।

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