मुंबई: मुंबई में मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ लोग सड़कों पर आ चुके हैं जहां लोग ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की बात कर रहे हैं तो वही अब प्रदर्शन करना कई लोगों के लिए मुश्किल बन गया हैं। प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लेने, पुलिस पर ज्यादती करने और कुछ लोगों को उनके घरों से उठाने के आरोप के मामले अब बॉम्बे हाईकोर्ट तक पहुंच गए हैं। वही मामले की गंभीरता को देखते हुए अदालत ने महाराष्ट्र सरकार से जवाब मांगा है। हालांकि, इस बीच महाराष्ट्र सरकार ने अदालत में अवैध हिरासत के आरोपों से साफ़ इनकार कर दिया है।

प्रदर्शन में शामिल लोगों को हिरासत में रखने का आरोप

बता दें कि 10 और 11 अक्टूबर को मुंबई में CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रदर्शन हुए थे। ये प्रदर्शन दिल्ली में चल रहे विरोध प्रदर्शनों के समर्थन में भी किए गए थे। इसी मामले में याचिका दाखिल कर आरोप लगाया गया कि पुलिस ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वाले लोगों को हिरासत में लिया।

सुनवाई के दौरान वकील गायत्री सिंह ने चार लोगों की ओर से अदालत में पक्ष रखा। उन्होंने आरोप लगाया कि इन लोगों को पूरे दिन हिरासत में रखा गया, फिर घर जाने दिया गया और बाद में उन्हें घर में ही नजरबंद कर दिया गया। वहीं, वरिष्ठ अधिवक्ता मिहिर देसाई ने दो अन्य लोगों के हलफनामे पेश किए, जिनमें दावा किया गया कि पुलिस उन्हें उनके घरों से उठाकर ले गई थी। इन आरोपों की अभी न्यायिक पुष्टि नहीं हुई है।

पुलिस की कार्रवाई पर उठे सवाल, सरकार से जवाब तलब

मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश महेश चंद्र त्रिपाठी और न्यायमूर्ति अद्वैत सेठना की पीठ ने की। अदालत ने महाराष्ट्र सरकार को याचिकाओं पर जवाब देने का निर्देश दिया। याचिका में पुलिस की कथित ज्यादती और प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लेने की कार्रवाई को चुनौती दी गई है।

हालांकि, महाराष्ट्र के महाधिवक्ता मिलिंद साठे ने अदालत में कहा कि अगस्त क्रांति मैदान पर किसी को अवैध रूप से हिरासत में नहीं लिया गया था। उनके मुताबिक, बिना अनुमति के प्रदर्शन और सड़क पर भीड़ जमा होने के कारण पुलिस ने लोगों को वहां से हटाया था। अदालत ने इस मामले में वरिष्ठ अधिकारी के माध्यम से हलफनामा दाखिल करने को कहा है।

हाईकोर्ट ने प्रदर्शनकारियों के रिकॉर्ड पर भी उठाया सवाल

अदालत ने कहा कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना मौलिक अधिकार है, लेकिन प्रदर्शन में शामिल लोगों की पृष्ठभूमि और आम जनता को होने वाली परेशानी को भी ध्यान में रखना होगा। कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि प्रदर्शनकारियों का आपराधिक रिकॉर्ड नहीं होना चाहिए और निर्दोष नागरिकों की आड़ में अपराधियों को शामिल नहीं होना चाहिए।

अदालत ने फिलहाल पुलिस की कार्रवाई पर पूर्ण रोक लगाने का आदेश नहीं दिया है। मामले की अगली सुनवाई 19 नवंबर को होगी। अब इस सुनवाई में कथित अवैध हिरासत के आरोपों और प्रदर्शन के दौरान आम लोगों को हुई परेशानी से जुड़े मुद्दों पर आगे विचार किया जाएगा।

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