SIR Voter List Update: पहले मतदाता सूची से नाम कटने की चिंता और अब दोबारा नाम जुड़वाने के लिए कानूनी पचड़ा! फॉर्म-6 में 'पहली बार आवेदन' करने की घोषणा ने उन लोगों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं, जो पहले से मतदाता थे। महाराष्ट्र के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय ने इस समस्या को देखते हुए चुनाव आयोग से फॉर्म में बदलाव की मांग की है।
पहले वोटर लिस्ट से नाम कटा
लोकतंत्र में मतदान का अधिकार नागरिक की सबसे अहम लोकतांत्रिक भागीदारी में से एक है। लेकिन विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान मतदाता सूची से नाम हटने के बाद कुछ लोगों के सामने नई परेशानी खड़ी हो गई है। जिन लोगों का नाम पहले मतदाता सूची में दर्ज था, उन्हें दोबारा नाम जुड़वाने के लिए फॉर्म-6 भरने को कहा जा रहा है। परेशानी यह है कि इस फॉर्म में ऐसी घोषणा शामिल है, जो पुराने मतदाताओं के लिए असमंजस पैदा कर रही है।
यही वजह है कि अब सवाल केवल मतदाता सूची में नाम जोड़ने का नहीं, बल्कि उस प्रक्रिया का भी है, जिसके जरिए कोई व्यक्ति अपने मतदान के अधिकार को दोबारा हासिल कर सकता है।
आखिर फॉर्म-6 भरने से क्यों डर रहे हैं पुराने मतदाता?
फॉर्म-6 का इस्तेमाल नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए किया जाता है। इसमें आवेदक को यह घोषणा करनी होती है कि वह पहली बार मतदाता सूची में नाम दर्ज कराने के लिए आवेदन कर रहा है। अब उस व्यक्ति की स्थिति समझिए, जिसका नाम पहले मतदाता सूची में था, लेकिन SIR के दौरान कट गया। अगर वह दोबारा नाम जुड़वाने के लिए यही फॉर्म भरता है, तो उसके सामने घोषणा की भाषा को लेकर सवाल खड़ा हो सकता है।
वह पहले से मतदाता था, इसलिए खुद को पहली बार पंजीकरण कराने वाला बताने में उसे परेशानी हो सकती है। दूसरी तरफ, नाम दोबारा जुड़वाने के लिए आवेदन करना भी जरूरी है। इसी कानूनी असमंजस के चलते कुछ मतदाता और चुनाव अधिकारी इस प्रक्रिया को लेकर चिंतित हैं।
क्या गलत घोषणा करने पर जेल हो सकती है?
यही इस पूरे विवाद का सबसे संवेदनशील पहलू है। लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 31 के तहत मतदाता सूची से जुड़े किसी मामले में जानबूझकर झूठी लिखित घोषणा करने पर एक साल तक की कैद, जुर्माना या दोनों का प्रावधान है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि SIR में नाम कटने वाले हर व्यक्ति को फॉर्म-6 भरने पर जेल हो जाएगी। कानूनी प्रावधान झूठी घोषणा से संबंधित है।
किसी व्यक्ति की वास्तविक स्थिति, उसके द्वारा दी गई जानकारी और मामले के तथ्यों को देखे बिना यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि उसने अपराध किया है। यानी डर की वजह हर हाल में जेल जाना नहीं, बल्कि फॉर्म की मौजूदा भाषा और अपनी वास्तविक स्थिति के बीच पैदा हुआ कानूनी भ्रम है।
महाराष्ट्र ने चुनाव आयोग से क्या मांग की?
मतदाताओं और चुनाव अधिकारियों के सामने आ रही इन दिक्कतों को देखते हुए महाराष्ट्र के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) कार्यालय ने चुनाव आयोग (ECI) को फॉर्म-6 में बदलाव करने का प्रस्ताव भेजा है।
इसमें मुख्य रूप से तीन सुझाव दिए गए हैं
फॉर्म के शीर्षक में बदलाव: ‘नए मतदाताओं’ से जुड़ी भाषा हटाई जाए, ताकि पहले से पंजीकृत रहे मतदाता भी खुद को इस प्रक्रिया में सहज महसूस कर सकें।
अलग घोषणा का विकल्प: जिन लोगों का नाम पहले किसी विधानसभा क्षेत्र की मतदाता सूची में था, लेकिन अब किसी भी सूची में नहीं है, उनके लिए अलग घोषणा की व्यवस्था हो।
पुराना वोटर आईडी नंबर दर्ज करने की सुविधा: आवेदकों को अपना पुराना मतदाता पहचान पत्र नंबर यानी EPIC नंबर दर्ज करने की अनुमति दी जाए, जिससे उनकी पिछली पंजीकरण स्थिति स्पष्ट हो सके।
इन बदलावों का मकसद पुराने मतदाताओं की स्थिति को नए मतदाताओं से अलग पहचानना और आवेदन प्रक्रिया में भ्रम को कम करना है।
क्या चुनाव आयोग अपने स्तर पर बदल सकता है फॉर्म?
इस मामले में कानूनी प्रक्रिया भी एक बड़ी बाधा है। किसी वैधानिक फॉर्म में बदलाव करने के लिए मतदाता पंजीकरण नियम, 1960 में संशोधन की जरूरत पड़ सकती है। चुनाव आयुक्त विवेक जोशी और सुखबीर सिंह संधू भी नियमों में संशोधन के बिना फॉर्म-6 में बदलाव की वैधानिकता को लेकर स्थिति स्पष्ट कर चुके हैं। इसलिए महाराष्ट्र के प्रस्ताव पर आगे क्या कार्रवाई होती है, यह महत्वपूर्ण होगा। केवल फॉर्म की भाषा बदलने का सुझाव देना और उसे कानूनी रूप से लागू करना, दोनों अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं।
सुप्रीम कोर्ट में भी मामला, फैसले पर टिकी निगाहें
फॉर्म-6 के इस्तेमाल से जुड़ी भ्रम की स्थिति का मामला सुप्रीम कोर्ट के समक्ष भी विचाराधीन है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ दिल्ली और अन्य राज्यों में इस मुद्दे पर सुनवाई कर रही है। अदालत की आगे की कार्यवाही महत्वपूर्ण हो सकती है, क्योंकि इससे यह स्पष्ट करने में मदद मिल सकती है कि पुराने मतदाताओं को दोबारा पंजीकरण कराने के लिए किस तरह की प्रक्रिया अपनानी चाहिए। हालांकि, किसी संभावित आदेश को अंतिम फैसला मानने से पहले अदालत के आधिकारिक निर्देशों की पुष्टि जरूरी है।
जिनका नाम कट गया, वे क्या करें?
इस पूरे मामले में सबसे ज्यादा चिंता उन लोगों की है, जो पहले से मतदाता थे और अब सूची में अपना नाम नहीं देख पा रहे हैं। उनके लिए जरूरी है कि वे केवल जेल जाने के डर से आवेदन की प्रक्रिया छोड़ने के बजाय अपनी स्थिति की आधिकारिक जानकारी लें। उन्हें अपने पुराने EPIC नंबर, पहले के मतदाता पंजीकरण से जुड़े दस्तावेज और वर्तमान मतदाता सूची की स्थिति की जांच करनी चाहिए। साथ ही, संबंधित निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी (ERO) या निर्वाचन कार्यालय से यह स्पष्ट करना चाहिए कि उनकी स्थिति में कौन-सी प्रक्रिया लागू होती है।