नई दिल्ली: भारतीय वायुसेना अब भविष्य की हवाई लड़ाइयों के लिए ड्रोन और ऑटोनॉमस सिस्टम की क्षमताओं को मजबूत करने पर जोर दे रही है। इसी दिशा में बुधवार को नई दिल्ली के विज्ञान भवन में एक वर्कशॉप आयोजित की गई, जिसमें वायुसेना के वरिष्ठ अधिकारियों, रक्षा मंत्रालय के प्रतिनिधियों और ड्रोन इंडस्ट्री से जुड़े 100 से ज्यादा विशेषज्ञों ने हिस्सा लिया। यह कार्यक्रम ड्रोन फेडरेशन इंडिया (DFI) के सहयोग से आयोजित किया गया।

वर्कशॉप का मुख्य उद्देश्य भारतीय वायुसेना के अनमैन्ड और ऑटोनॉमस सिस्टम रोडमैप को इंडस्ट्री, स्टार्टअप, शिक्षण संस्थानों और रिसर्च संगठनों तक पहुंचाना था, ताकि वे भविष्य की सैन्य जरूरतों को समझकर उसी के मुताबिक तकनीक विकसित कर सकें।

ड्रोन और स्वायत्त तकनीक पर वायुसेना का फोकस

आधुनिक हवाई अभियानों में ड्रोन, स्वायत्त सिस्टम और मानवयुक्त विमानों के साथ मिलकर काम करने वाली मानवरहित तकनीक की भूमिका लगातार बढ़ रही है। इसके अलावा, एक साथ बड़ी संख्या में ड्रोन संचालित करने वाली स्वार्म तकनीक को भी भविष्य के अभियानों के लिहाज से अहम माना जा रहा है। भारतीय वायुसेना ने इसी जरूरत को ध्यान में रखते हुए अपना अनमैन्ड एंड ऑटोनॉमस सिस्टम रोडमैप तैयार किया है। इसे पहले वायुसेना के ड्रोनाथॉन कार्यक्रम में पेश किया गया था। अब इस रोडमैप को रक्षा क्षेत्र से जुड़ी कंपनियों और अन्य तकनीकी संस्थानों के साथ साझा करने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा रही है।

16 तरह के प्लेटफॉर्म और चार श्रेणियों में तैयार रोडमैप

IAF के इस रोडमैप में 16 प्लेटफॉर्म परिवारों से जुड़ी भविष्य की जरूरतों को चार श्रेणियों में बांटा गया है। इनमें स्ट्रैटेजिक, ऑपरेशनल, टैक्टिकल और डिस्ट्रीब्यूटेड/अट्रिटेबल श्रेणियां शामिल हैं। इसका उद्देश्य रक्षा क्षेत्र में काम करने वाली कंपनियों और तकनीकी संस्थानों को यह समझने में मदद करना है कि आने वाले समय में वायुसेना को किस तरह की मानवरहित और स्वायत्त तकनीकों की जरूरत हो सकती है। इससे उद्योग जगत अपने शोध, डिजाइन और विकास की दिशा को वायुसेना की परिचालन संबंधी जरूरतों के अनुरूप तय कर सकेगा।

वायुसेना ने इंडस्ट्री को बताई भविष्य की जरूरतें

एयर हेडक्वार्टर में डायरेक्टर जनरल (वेपन सिस्टम्स) एयर मार्शल प्रेमकुमार कृष्णास्वामी ने कहा कि भारतीय वायुसेना देश में मानवरहित प्रणालियों को अपनाने के मामले में आगे रही है और भविष्य में भी इस क्षेत्र में अपनी भूमिका बनाए रखना चाहती है। उन्होंने कहा कि वायुसेना अपनी जरूरतों को स्पष्ट रूप से सामने रखकर तकनीक के विकास को दिशा देना चाहती है, ताकि जरूरी क्षमताओं को समय पर विकसित और शामिल किया जा सके। वहीं, एयर हेडक्वार्टर में असिस्टेंट चीफ ऑफ एयर स्टाफ (ऑपरेशंस-रिमोट) एयर वाइस मार्शल आशीष कुमार ने कहा कि मानवरहित और स्वायत्त सिस्टम अब हवाई अभियानों की योजना और संचालन में अहम होते जा रहे हैं। उनके मुताबिक, जब इंडस्ट्री को परिचालन संबंधी जरूरतों की जानकारी पहले से मिलती है, तो वह अधिक उपयोगी और भरोसेमंद सिस्टम विकसित कर सकती है।

भारतीय ड्रोन इंडस्ट्री और स्टार्टअप को मिलेगा मौका

ड्रोन फेडरेशन इंडिया के अध्यक्ष स्मित शाह ने कहा कि इस पहल से भारत का ड्रोन इकोसिस्टम भारतीय वायुसेना की जरूरतों के साथ बेहतर तालमेल बना सकेगा। उन्होंने कहा कि इससे कंपनियों, स्टार्टअप और शिक्षण संस्थानों को भविष्य की तकनीकी जरूरतों को समझने और उस दिशा में निवेश करने में मदद मिलेगी। इस पहल को रक्षा क्षेत्र में स्वदेशी तकनीक को बढ़ावा देने और भारत की तकनीकी क्षमता मजबूत करने की दिशा में अहम माना जा रहा है। वर्कशॉप में उद्योग जगत के प्रतिनिधियों को रोडमैप उपलब्ध कराने की प्रक्रिया भी तय की गई है।

गोपनीयता की प्रक्रिया के बाद साझा होगा रोडमैप

कार्यक्रम से जुड़ी जानकारी के मुताबिक, इंडस्ट्री के प्रतिभागियों को सत्यापन की निर्धारित प्रक्रिया पूरी होने के बाद रोडमैप की प्रति दी जाएगी। इसके लिए औपचारिक सहमति और नॉन-डिस्क्लोजर एग्रीमेंट (NDA) जैसी शर्तें पूरी करनी होंगी। इस पहल के जरिए भारतीय वायुसेना और देश के रक्षा तकनीकी इकोसिस्टम के बीच सहयोग बढ़ाने की कोशिश की जा रही है, ताकि भविष्य की सैन्य जरूरतों के लिए स्वदेशी ड्रोन और स्वायत्त प्रणालियों के विकास को गति मिल सके।

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