
भारत के पूर्वोत्तर राज्य नागालैंड (Nagaland) के कुछ बाजार हाल के वर्षों में सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बने हुए हैं। खासतौर पर कोहिमा (Kohima) और (Dimapur) के कुछ स्थानीय बाजारों के वीडियो और तस्वीरें वायरल होने के बाद देशभर में बहस छिड़ गई। इन बाजारों में पारंपरिक खान-पान से जुड़े कई प्रकार के जानवरों और कीड़ा की बिक्री होने की बात कही जाती है, जिसे लेकर अलग-अलग राय सामने आ रही हैं।
सांस्कृतिक परंपराओं का हिस्सा है ये खान-पान
स्थानीय समुदायों के अनुसार, यह खान-पान उनकी पुरानी सांस्कृतिक परंपराओं का हिस्सा है। पहाड़ी इलाकों में रहने वाले कई लोग वर्षों से शिकार आधारित भोजन संस्कृति अपनाते आए हैं। कुछ लोग मानते हैं कि कुछ विशेष मांस शरीर को गर्म रखने और ताकत बढ़ाने में मदद करते हैं, इसलिए सर्दियों या चोट से उबरने के दौरान इन्हें खाया जाता है। वहीं कीड़े-मकौड़ों को प्रोटीन का सस्ता और पारंपरिक स्रोत माना जाता है।
अलग-अलग प्रकार के मिलते है मांस
बताया जाता है कि कुछ बाजारों में अलग-अलग प्रकार के मांस और पारंपरिक खाद्य पदार्थ खुले रूप में बेचे जाते हैं। कई विक्रेता इन्हीं दुकानों से अपनी आजीविका चलाते हैं। हालांकि, पूरे नागालैंड में सभी लोग इस तरह का भोजन नहीं करते। राज्य के कई परिवार सामान्य रूप से चिकन, मछली, पोर्क और अन्य पारंपरिक खाद्य पदार्थों तक ही सीमित रहते हैं।
नागालैंड सरकार ने वर्ष 2020 में कुत्ते के मांस पर लगाया था रोक
इस मुद्दे का कानूनी पहलू भी लगातार चर्चा में है। नागालैंड सरकार ने वर्ष 2020 में कुत्ते के मांस के आयात और बिक्री पर रोक लगाने का फैसला लिया था। बाद में अदालतों में इस फैसले को चुनौती दी गई और मामले पर सुनवाई जारी रही। पशु अधिकार संगठनों ने इस व्यापार पर प्रतिबंध की मांग करते हुए इसे पशु क्रूरता से जोड़ा है।
स्थानीय लोगों ने कही ये बात
दूसरी ओर, स्थानीय लोगों का तर्क है कि भोजन की पसंद सांस्कृतिक पहचान से जुड़ी होती है और अलग-अलग समुदायों की खान-पान परंपराएं अलग हो सकती हैं। उनका कहना है कि किसी भी संस्कृति को केवल बाहरी नजरिए से नहीं समझा जा सकता।
सोशल मीडिया पर वायरल हुए वीडियो
सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो के बाद यह मुद्दा केवल खान-पान तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सांस्कृतिक स्वतंत्रता, पशु अधिकार और कानून तीनों के बीच बहस का बड़ा विषय बन चुका है।
Written By Toshi Shah













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