नई दिल्ली: दुनिया के अलग-अलग देशों में लोग अपनी सरकारों के खिलाफ सड़कों पर उतर रहे हैं। कहीं महंगाई और महंगे किराये से लोग परेशान हैं, तो कहीं शिक्षा व्यवस्था, बेरोजगारी, सरकारी खर्च में कटौती और भ्रष्टाचार को लेकर नाराजगी है। फ्रांस, इटली, बेल्जियम, पुर्तगाल, स्पेन और अल्बानिया में हाल के दिनों में प्रदर्शन तेज हुए हैं। वहीं अमेरिका में भी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों के खिलाफ प्रदर्शन हुए हैं और आम लोगों के बीच बढ़ती महंगाई को लेकर चिंता सामने आ रही है।
फ्रांस में महंगाई से शुरू हुआ विरोध, शिक्षा भी बड़ा मुद्दा
17 अक्टूबर को फ्रांस के अलग-अलग शहरों में बड़े प्रदर्शन हुए। अधिकारियों के मुताबिक, प्रदर्शनकारियों की संख्या 5.5 लाख से ज्यादा थी। कुछ जगहों पर प्रदर्शन हिंसक हो गए। दुकानों में लूटपाट, आगजनी और पुलिस के साथ झड़पों की खबरें सामने आईं। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने हिंसा की निंदा की और जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की बात कही। हालांकि, शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों की आर्थिक और सामाजिक चिंताओं को दूर करना भी सरकार के सामने बड़ी चुनौती है।
इटली में महंगाई और युद्ध के खिलाफ सड़क पर उतरे लोग
इटली में सितंबर 2026 के दौरान महंगाई दर 4.1 प्रतिशत बताई गई। जब खाने-पीने की चीजों, ईंधन, किराये और दूसरी जरूरी सेवाओं पर खर्च बढ़ता है, तो आम परिवारों के बजट पर सीधा असर पड़ता है। लोगों की नाराजगी तब और बढ़ सकती है, जब उनकी आय उसी रफ्तार से नहीं बढ़ती। प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी ने हिंसा की आलोचना की, जबकि प्रदर्शनकारियों की मांगों में आर्थिक परेशानियों के साथ युद्धों को लेकर विरोध भी शामिल रहा।
बेल्जियम में शिक्षा और सरकारी नीतियों पर सवाल
बेल्जियम की राजधानी ब्रसेल्स में छात्रों और दूसरे समूहों ने शिक्षा व्यवस्था, फीस और सरकारी नीतियों को लेकर विरोध किया। देश में सरकारी खर्च में कटौती, पेंशन और बेरोजगारी लाभ से जुड़े बदलाव भी राजनीतिक बहस का विषय बने हुए हैं।
प्रदर्शनकारियों को आशंका है कि शिक्षा और सामाजिक सुरक्षा से जुड़े फैसलों का बोझ आम लोगों पर पड़ सकता है। 17 अक्टूबर को ब्रसेल्स में प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने आंसू गैस और वाटर कैनन का इस्तेमाल किया। इससे पहले 9 अक्टूबर को भी सरकारी सामाजिक-आर्थिक नीतियों के खिलाफ बड़ी संख्या में लोग सड़कों पर उतरे थे।
पुर्तगाल में कमाई से महंगे पड़ रहे घर
पुर्तगाल में 2017 के बाद घरों की कीमतें दोगुने से ज्यादा बढ़ने की खबरें सामने आई हैं। नए किराये के मकानों का किराया भी काफी बढ़ा है। इसका असर खास तौर पर युवाओं और उन परिवारों पर पड़ता है, जिनकी कमाई का बड़ा हिस्सा किराया चुकाने में चला जाता है।
नौकरी होने के बावजूद अगर कोई व्यक्ति घर का किराया, खाना, बिजली और परिवहन का खर्च निकालने के बाद बचत नहीं कर पा रहा है, तो उसके लिए आर्थिक स्थिरता हासिल करना मुश्किल हो जाता है। यही वजह है कि पुर्तगाल में आवास और वेतन के मुद्दे विरोध का अहम हिस्सा बने हुए हैं।
स्पेन में किराये का संकट, युवाओं का भविष्य चिंता में
स्पेन में भी महंगे मकानों और किराये को लेकर लोगों की नाराजगी बढ़ी है। बार्सिलोना और मैड्रिड जैसे शहरों में आवास का खर्च युवाओं के लिए बड़ी समस्या बन गया है। कई लोगों की शिकायत है कि नौकरी मिलने के बाद भी अपनी कमाई से घर लेना या लंबे समय तक किराया चुकाना मुश्किल है।
रिपोर्टों के मुताबिक, स्पेन में एक बुजुर्ग महिला को किराये से जुड़े विवाद के बाद घर से निकाले जाने और बाद में उनकी मौत की घटना ने आवास के मुद्दे पर विरोध को और तेज किया। इस मामले के बाद किराये पर नियंत्रण और बेदखली से जुड़े नियमों को लेकर मांगें उठीं।
अल्बानिया में भ्रष्टाचार और सरकार से इस्तीफे की मांग
अल्बानिया में विरोध की वजह दूसरे यूरोपीय देशों से कुछ अलग है। यहां छात्रों और प्रदर्शनकारियों ने भ्रष्टाचार के आरोपों, रोजगार की कमी, शिक्षा व्यवस्था और विवादित विकास परियोजनाओं को लेकर सरकार के खिलाफ आवाज उठाई है।
प्रधानमंत्री एडी रामा की सरकार के खिलाफ प्रदर्शनकारियों ने इस्तीफे की मांग भी की है। एक विवादित विकास परियोजना को लेकर उठे सवालों ने व्यापक राजनीतिक असंतोष को बढ़ाने में भूमिका निभाई। प्रदर्शनकारियों की नाराजगी में यह भावना भी शामिल है कि भ्रष्टाचार और राजनीतिक फैसलों का असर देश के भविष्य पर पड़ रहा है।
अमेरिका में ट्रंप की नीतियों के खिलाफ विरोध
अमेरिका में भी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों को लेकर विरोध देखने को मिला है। 17 अक्टूबर को ‘नो किंग्स’ नाम से हुए प्रदर्शनों में लोगों ने ट्रंप प्रशासन की नीतियों और सत्ता के इस्तेमाल के तरीके के खिलाफ आवाज उठाई। इन प्रदर्शनों का मुख्य मुद्दा केवल महंगाई नहीं था, बल्कि राजनीतिक नेतृत्व और प्रशासनिक फैसलों को लेकर असहमति भी थी।
इसके साथ ही अमेरिका में आम लोगों की आर्थिक चिंताएं भी बढ़ी हैं। प्यू रिसर्च सेंटर के 8 अक्टूबर को जारी विश्लेषण के मुताबिक, सितंबर के अंत से अक्टूबर की शुरुआत के बीच किए गए सर्वे में 73 प्रतिशत अमेरिकी वयस्कों ने खाने-पीने और उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतों, 69 प्रतिशत ने स्वास्थ्य सेवाओं के खर्च और 66 प्रतिशत ने आवास की लागत को लेकर गंभीर चिंता जताई। 74 प्रतिशत लोगों ने पेट्रोल और ऊर्जा की कीमतों को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की।
आखिर अलग-अलग देशों में एक जैसी बेचैनी क्यों?
इन सभी देशों की परिस्थितियां अलग हैं, फिर भी कुछ समस्याएं बार-बार सामने आ रही हैं।
पहली समस्या है कमाई और खर्च के बीच बढ़ता अंतर। अगर वेतन सीमित गति से बढ़े और किराया, ईंधन, खाना तथा स्वास्थ्य सेवाएं महंगी होती जाएं, तो परिवारों के लिए रोजमर्रा के खर्च संभालना मुश्किल हो जाता है।
दूसरी समस्या है युवाओं के भविष्य को लेकर असुरक्षा। पढ़ाई पूरी करने के बाद नौकरी, उचित वेतन और अपना घर पाने की उम्मीद हर जगह पूरी नहीं हो रही। युवाओं को लगता है कि मेहनत करने के बावजूद उनके लिए आगे बढ़ने के रास्ते सीमित हैं।
तीसरी समस्या है सरकारी नीतियों पर भरोसा। लोग चाहते हैं कि सरकारें महंगाई कम करने, रोजगार बढ़ाने और सार्वजनिक सेवाओं को बेहतर बनाने के लिए प्रभावी कदम उठाएं। जब उन्हें लगता है कि उनकी समस्याओं पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जा रहा, तो नाराजगी प्रदर्शन का रूप ले सकती है।
चौथी समस्या है राजनीतिक जवाबदेही। अल्बानिया में भ्रष्टाचार के आरोप, बेल्जियम में सरकारी कटौती और अमेरिका में प्रशासन की नीतियों को लेकर विरोध बताते हैं कि जनता सिर्फ आर्थिक राहत नहीं, बल्कि फैसले लेने के तरीके पर भी सवाल उठा रही है।
क्या ये प्रदर्शन सरकारों के खिलाफ बड़े बदलाव का संकेत हैं?
इन प्रदर्शनों से यह जरूर पता चलता है कि कई देशों में आर्थिक और सामाजिक मुद्दों को लेकर असंतोष बढ़ा है। लेकिन यह कहना जल्दबाजी होगी कि सभी सरकारों के खिलाफ जनता का भरोसा पूरी तरह खत्म हो गया है या इन आंदोलनों से हर जगह सत्ता बदल जाएगी।
प्रदर्शनों का असर इस बात पर निर्भर करेगा कि सरकारें लोगों की मांगों पर क्या कदम उठाती हैं, विपक्ष और सामाजिक संगठन कितने प्रभावी रहते हैं और जनता का समर्थन कितने समय तक बना रहता है। शांतिपूर्ण प्रदर्शन लोकतंत्र में अपनी बात रखने का अधिकार हैं, जबकि हिंसा और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान अलग मुद्दे हैं।