कहते हैं कि अगर इंसान कुछ करने की ठान ले, तो मुश्किल रास्ते भी आसान हो सकते हैं। जम्मू-कश्मीर की शीतल देवी ने अपनी मेहनत और हुनर से इस बात को सच कर दिखाया है, उनके जन्म से दोनों हाथ नहीं हैं, लेकिन वह अपने पैरों और कंधे की मदद से तीरंदाजी करती हैं। आज शीतल देवी भारत की मशहूर पैरा तीरंदाजों में (Para-Archer) शामिल हैं, उन्होंने एशियन पैरा गेम्स से लेकर पैरालंपिक और विश्व चैंपियनशिप तक में अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया है। आइए, जानते हैं शीतल देवी की कहानी और उनकी बड़ी उपलब्धियों के बारे में।
कौन हैं शीतल देवी?
शीतल देवी का जन्म 10 जनवरी 2007 को जम्मू-कश्मीर के किश्तवाड़ जिले के लोइधर गांव में हुआ था। बचपन से ही उनके दोनों हाथ नहीं थे। इसके बावजूद उन्होंने अपनी जिंदगी में आगे बढ़ने का रास्ता चुना।
शीतल को तीरंदाजी में दिलचस्पी हुई और उन्होंने इस खेल को सीखना शुरू किया। शुरुआत में यह आसान नहीं था, क्योंकि तीरंदाजी में धनुष पकड़ने और तीर चलाने के लिए हाथों का इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन शीतल ने अपनी शारीरिक स्थिति के हिसाब से अलग तरीका अपनाया और लगातार अभ्यास किया।
धीरे-धीरे उनकी मेहनत रंग लाने लगी, उन्होंने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में हिस्सा लिया और अपनी पहचान बनानी शुरू कर दी। आज उनकी गिनती भारत की बेहतरीन पैरा तीरंदाजों में होती है।
बिना हाथों के कैसे चलाती हैं तीर?
शीतल देवी को देखकर सबसे ज्यादा लोगों के मन में यही सवाल आता है कि वह बिना हाथों के तीरंदाजी कैसे करती हैं। दरअसल, शीतल अपने पैरों, कंधे और मुंह की मदद से धनुष चलाती हैं। वह अपने पैर से तीर को सही जगह पर लगाती हैं और शरीर के दूसरे हिस्सों की मदद से धनुष की डोरी खींचती हैं। इसके बाद निशाना लगाकर तीर छोड़ती हैं।
यह काम सुनने में जितना मुश्किल लगता है, इसे सही तरीके से करने के लिए उतने ही ज्यादा अभ्यास की जरूरत होती है। तीरंदाजी में जरा-सी गलती होने पर निशाना चूक सकता है। इसलिए खिलाड़ी को अपने शरीर का संतुलन बनाए रखना होता है और पूरा ध्यान लक्ष्य पर लगाना पड़ता है। शीतल ने अपनी मेहनत से इस तकनीक में महारत हासिल की है। यही वजह है कि वह बड़े-बड़े अंतरराष्ट्रीय मुकाबलों में दूसरे खिलाड़ियों को कड़ी टक्कर देती हैं।
क्या है फोकोमेलिया बीमारी?
शीतल देवी जन्म से ही दोनों हाथों के बिना हैं। उनकी शारीरिक स्थिति को फोकोमेलिया नाम के दुर्लभ जन्मजात विकार से जोड़ा जाता है। इस विकार में शरीर के हाथ-पैरों का विकास प्रभावित हो सकता है, लेकिन शीतल की पहचान सिर्फ उनकी शारीरिक स्थिति तक सीमित नहीं है। उन्होंने तीरंदाजी में अपनी मेहनत से जो मुकाम हासिल किया है, वह उन्हें खास बनाता है।
उनकी कहानी यह भी बताती है कि किसी खिलाड़ी की प्रतिभा को केवल उसकी शारीरिक बनावट से नहीं आंकना चाहिए। सही प्रशिक्षण, लगातार अभ्यास और खुद पर भरोसा हो, तो खिलाड़ी बड़ी उपलब्धियां हासिल कर सकते हैं।
एशियन पैरा गेम्स 2023 में जीते दो गोल्ड मेडल
शीतल देवी के करियर में साल 2023 काफी खास रहा। चीन के हांगझोऊ में हुए एशियन पैरा गेम्स में उन्होंने शानदार प्रदर्शन किया और दो स्वर्ण पदक अपने नाम किए।
इस प्रतियोगिता में मिली सफलता ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई। कम उम्र में दो गोल्ड मेडल जीतना उनके लिए बड़ी उपलब्धि थी। इसी साल उन्होंने पैरा विश्व तीरंदाजी चैंपियनशिप में भी रजत पदक जीता। लगातार अच्छे प्रदर्शन के कारण वह भारतीय खेल जगत में चर्चा का विषय बन गईं।
इन उपलब्धियों ने साबित किया कि शीतल सिर्फ अपनी कहानी की वजह से नहीं, बल्कि अपने खेल के दम पर भी दुनिया में पहचान बना रही हैं।
पेरिस पैरालंपिक 2024 में जीता कांस्य पदक
शीतल देवी के करियर की सबसे बड़ी उपलब्धियों में पेरिस पैरालंपिक 2024 का कांस्य पदक (Bronze medal) भी शामिल है।
उन्होंने भारतीय तीरंदाज राकेश कुमार के साथ कंपाउंड मिश्रित टीम स्पर्धा में हिस्सा लिया। दोनों ने शानदार खेल दिखाया और कांस्य पदक के मुकाबले में इटली की जोड़ी को हराकर भारत के लिए पदक जीता।
उस समय शीतल की उम्र सिर्फ 17 साल थी। इस उपलब्धि के साथ वह भारत की सबसे कम उम्र की पैरालंपिक पदक विजेता बनीं।
हालांकि, पैरालंपिक में उनका सफर आसान नहीं था। व्यक्तिगत स्पर्धा में उन्हें निराशा का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। मिश्रित टीम स्पर्धा में वापसी करते हुए उन्होंने कांस्य पदक जीत लिया।
यह जीत बताती है कि खेल में हर मुकाबला नया मौका लेकर आता है। एक मुकाबले में हार मिलने के बाद भी खिलाड़ी अगले मुकाबले में अच्छा प्रदर्शन कर सकता है।
2025 में बनीं विश्व चैंपियन
शीतल देवी ने सितंबर 2025 में एक और बड़ी उपलब्धि हासिल की। दक्षिण कोरिया के ग्वांगजू में आयोजित विश्व पैरा तीरंदाजी चैंपियनशिप में उन्होंने महिला कंपाउंड व्यक्तिगत स्पर्धा का स्वर्ण पदक जीता।
फाइनल मुकाबले में उन्होंने तुर्किये की खिलाड़ी ओजनूर क्युरे गिरदी को 146-143 से हराया। यह जीत इसलिए भी खास थी, क्योंकि उनके सामने एक मजबूत और अनुभवी खिलाड़ी थी।
विश्व चैंपियन बनने के बाद शीतल ने यह साबित कर दिया कि वह दुनिया की बेहतरीन तीरंदाजों में शामिल हैं। एशियन पैरा गेम्स में गोल्ड मेडल जीतने और पैरालंपिक में कांस्य पदक हासिल करने के बाद विश्व चैंपियन बनना उनके करियर का बड़ा पड़ाव रहा।
2026 में रिकॉर्ड बनाने की चर्चा
शीतल देवी के नाम तीरंदाजी में कई बड़ी उपलब्धियां हैं। अक्टूबर 2026 में एशियन पैरा गेम्स की महिला कंपाउंड क्वालिफिकेशन स्पर्धा में उनके 720 में से 704 अंक हासिल करने की खबर भी सामने आई। बताई गई जानकारी के मुताबिक, इस स्कोर के साथ उन्होंने विश्व रिकॉर्ड की बराबरी की और एशियाई रिकॉर्ड बनाया।
तीरंदाजी में क्वालिफिकेशन राउंड के दौरान खिलाड़ी तय संख्या में तीर चलाते हैं और उनके कुल अंकों के आधार पर आगे की प्रतियोगिता के लिए स्थान तय होता है। 720 में से 704 अंक हासिल करना बेहद शानदार प्रदर्शन माना जाता है।
हालांकि, इस रिकॉर्ड से जुड़ी जानकारी को प्रकाशित करने से पहले आधिकारिक प्रतियोगिता रिकॉर्ड से इसकी पुष्टि करना जरूरी है। क्वालिफिकेशन राउंड में अच्छा स्कोर करना और प्रतियोगिता में पदक जीतना दो अलग-अलग उपलब्धियां हैं।
शीतल देवी को मिला अर्जुन पुरस्कार
शीतल देवी की उपलब्धियों को भारत सरकार ने भी सम्मान दिया है। उन्हें साल 2023 में अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। अर्जुन पुरस्कार देश के प्रमुख खेल सम्मानों में से एक है। यह पुरस्कार उन खिलाड़ियों को दिया जाता है, जिन्होंने अपने प्रदर्शन से खेल के क्षेत्र में खास योगदान दिया हो।
इतनी कम उम्र में यह सम्मान हासिल करना शीतल के लिए बड़ी बात थी। इससे उनकी मेहनत और खेल में हासिल की गई उपलब्धियों को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली।
क्यों खास है शीतल देवी की कहानी?
शीतल देवी की कहानी इसलिए खास है, क्योंकि उन्होंने अपनी शारीरिक स्थिति को अपने सपनों के रास्ते की रुकावट नहीं बनने दिया, उन्होंने मेहनत की, तीरंदाजी सीखी और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का नाम रोशन किया।
उनकी सफलता से यह भी पता चलता है कि खिलाड़ियों को आगे बढ़ने के लिए सही प्रशिक्षण, अच्छे प्रशिक्षकों और मौके की जरूरत होती है। प्रतिभा के साथ मेहनत और लगातार सीखते रहने की आदत भी बहुत जरूरी है। आज शीतल देवी लाखों लोगों के लिए प्रेरणा हैं, उनकी कहानी हमें सिखाती है कि मुश्किल हालात में भी अपने लक्ष्य की तरफ कदम बढ़ाते रहना चाहिए।
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