विजयादशमी यानी दशहरे के दिन मां दुर्गा के साथ देवी अपराजिता की पूजा का भी विशेष महत्व माना जाता है। मान्यता है कि मां अपराजिता की आराधना करने से व्यक्ति को जीवन के संघर्षों में जीत हासिल करने की शक्ति मिलती है। इसी दिन शमी के पेड़ की पूजा करने और शस्त्र पूजन की भी परंपरा है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, देवी अपराजिता को शक्ति का ऐसा स्वरूप माना जाता है, जिसे कोई पराजित नहीं कर सकता। इसी वजह से उनका नाम अपराजिता पड़ा, कहा जाता है कि उनकी कृपा से भगवान श्रीराम को रावण के खिलाफ युद्ध में विजय प्राप्त करने की शक्ति मिली थी।
मां अपराजिता की पूजा की कैसे हुई शुरुआत?
पौराणिक कथाओं के मुताबिक, प्राचीन समय में देवताओं और असुरों के बीच भयंकर युद्ध हुआ था। इस युद्ध में देवी दुर्गा ने दानवों का संहार किया। इसके बाद मां दुर्गा अपनी मूल शक्ति यानी देवी अपराजिता की आराधना के लिए शमी की पत्तियां लेकर हिमालय की ओर चली गईं। इसी कथा के आधार पर विजयादशमी पर शमी के वृक्ष की पूजा का महत्व बताया जाता है।
पहले विजयादशमी को देवताओं की असुरों पर जीत के प्रतीक के रूप में मनाया जाता था। बाद में त्रेतायुग में भगवान श्रीराम की रावण पर विजय को भी इस पर्व से जोड़ दिया गया, तभी से दशहरे को बुराई पर अच्छाई की जीत के त्योहार के रूप में मनाने की परंपरा प्रचलित हुई।
भगवान श्रीराम को कैसे मिला विजय का आशीर्वाद?
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब भगवान श्रीराम और रावण के बीच युद्ध चल रहा था, तब लंबे समय तक किसी की जीत तय नहीं हो पा रही थी। रावण अपनी सेना के साथ लगातार मुकाबला कर रहा था। ऐसे में श्रीराम ने विजय की कामना से देवी अपराजिता की आराधना की।
कहा जाता है कि श्रीराम की भक्ति से प्रसन्न होकर देवी प्रकट हुईं और उन्हें जीत का आशीर्वाद दिया। इसके बाद श्रीराम ने रावण का वध किया और लंका पर विजय प्राप्त की। इसी वजह से देवी अपराजिता की पूजा को विजय और शक्ति से जोड़कर देखा जाता है।
देवी अपराजिता और वैष्णवी का क्या है संबंध?
वराह पुराण से जुड़ी मान्यता के अनुसार, देवी अपराजिता का प्राकट्य देवी वैष्णवी के तप से हुआ था। वैष्णवी को भगवान विष्णु की शक्ति का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक परंपराओं में देवी अपराजिता को शक्ति के प्रचंड स्वरूप के रूप में पूजा जाता है।
ऐसी मान्यता भी है कि शारदीय नवरात्र की दशमी तिथि पर देवी अपराजिता की पूजा करने से साधना का पूरा फल मिलता है। उनकी आराधना में अपराजिता के फूलों का विशेष महत्व बताया गया है। इस पूजा का उद्देश्य जीवन में आने वाली बाधाओं पर विजय पाना और साहस व आत्मविश्वास प्राप्त करना है।
विजयादशमी 2026: पूजा का शुभ मुहूर्त
- देवी अपराजिता पूजन: दोपहर 1:14 बजे से 3:30 बजे तक
- शस्त्र पूजा: दोपहर 1:59 बजे से 2:45 बजे तक
- रावण दहन: शाम 5:47 बजे से रात 8:21 बजे तक
देवी अपराजिता की पूजा आमतौर पर दोपहर के बाद और शाम होने से पहले की जाती है। शस्त्र पूजा से पहले देवी की आराधना करने की भी परंपरा है। हालांकि, पूजा और रावण दहन का सही समय स्थानीय पंचांग और आयोजन के अनुसार अलग हो सकता है।
इस तरह विजयादशमी पर मां अपराजिता की पूजा केवल धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि साहस, शक्ति और हर चुनौती का सामना करने के संकल्प का प्रतीक भी मानी जाती है।
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(डिस्क्लेमर: यह लेख धार्मिक मान्यताओं और पौराणिक कथाओं पर आधारित है। इसकी पुष्टि TNP News नहीं करता है)