दुनिया के अलग-अलग देशों में युवा अब सिर्फ सोशल मीडिया पर अपनी नाराजगी जाहिर नहीं कर रहे, बल्कि सड़कों पर उतरकर सरकारों से जवाब मांग रहे हैं। कहीं बेरोजगारी और महंगाई युवाओं को परेशान कर रही है, तो कहीं भ्रष्टाचार, राजनीतिक परिवारवाद, लोकतांत्रिक अधिकारों पर पाबंदियां और पर्यावरण की बिगड़ती स्थिति उनके गुस्से की वजह बन रही है। नेपाल और बांग्लादेश से लेकर इंडोनेशिया तक युवाओं के आंदोलनों ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है, क्या दुनिया की नई पीढ़ी अपनी सरकारों और मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था से निराश हो चुकी है?
बता दें कि इंडोनेशिया में राष्ट्रपति प्राबोवो सुबियांतो की सरकार के खिलाफ उठ रही आवाजों को भी इसी व्यापक असंतोष से जोड़कर देखा जा सकता है। हालांकि, हर देश में आंदोलन की अपनी अलग वजहें हैं, लेकिन इन सबके बीच एक बात समान नजर आती है। युवा बेहतर भविष्य चाहते हैं और उन्हें लगता है कि उनकी समस्याओं को दूर करने के लिए सरकारें पर्याप्त कदम नहीं उठा रही हैं।
इंडोनेशिया में क्यों भड़का युवाओं का गुस्सा?
इंडोनेशिया में युवाओं का असंतोष किसी एक घटना का नतीजा नहीं है। आर्थिक परेशानियों, सरकारी नीतियों, भ्रष्टाचार के आरोपों और पर्यावरण से जुड़ी समस्याओं ने मिलकर इस नाराजगी को बढ़ाया है। युवाओं के लिए रोजगार पाना, अपनी कमाई से घर चलाना और अच्छी शिक्षा व स्वास्थ्य सेवाएं हासिल करना बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। महंगाई और रोजमर्रा की जरूरतों पर बढ़ते खर्च के बीच वे सरकार से राहत की उम्मीद कर रहे हैं।
इसके अलावा, सरकारी व्यवस्था में भ्रष्टाचार और राजनीतिक रसूख के इस्तेमाल को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं। प्रदर्शनकारी चाहते हैं कि सरकारी संस्थाएं पारदर्शी तरीके से काम करें और आम लोगों की समस्याओं को प्राथमिकता दें।
नागरिक स्वतंत्रता का मुद्दा भी इस असंतोष का अहम हिस्सा है। युवाओं का कहना है कि सरकार की नीतियों की आलोचना करना और शांतिपूर्ण विरोध दर्ज कराना उनका अधिकार है। ऐसे में जब उन्हें लगता है कि उनकी आवाज दबाई जा रही है, तो नाराजगी और बढ़ जाती है।
जंगलों की आग ने बढ़ाई मुश्किलें
इंडोनेशिया में पर्यावरण का मुद्दा भी राजनीतिक बहस के केंद्र में है। यहां जंगलों और पीट-भूमि में लगने वाली आग से बड़े पैमाने पर धुआं फैलने, लोगों के स्वास्थ्य पर असर पड़ने और पर्यावरण को नुकसान पहुंचने का खतरा रहता है।
लंबे समय तक सूखा, गर्म मौसम और जमीन साफ करने के लिए आग का इस्तेमाल जंगलों में आग फैलने की आशंका बढ़ा सकते हैं। कुछ क्षेत्रों में पाम ऑयल और दूसरे व्यावसायिक बागानों के विस्तार को लेकर भी पर्यावरणीय चिंताएं जताई जाती रही हैं।
युवाओं की मांग है कि जंगलों में आग लगने की घटनाओं को गंभीरता से लिया जाए, जिम्मेदार लोगों और कंपनियों के खिलाफ कार्रवाई हो और प्रभावित इलाकों में रहने वाले लोगों को सुरक्षा मिले, उनके लिए यह केवल पेड़-पौधों को बचाने का सवाल नहीं है। जंगलों की आग का सीधा असर हवा की गुणवत्ता, लोगों की सेहत, स्थानीय रोजगार और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य पर पड़ता है। इसलिए पर्यावरण संरक्षण की मांग अब आर्थिक और राजनीतिक जवाबदेही से भी जुड़ गई है।
दुनिया के दूसरे देशों में भी क्यों बढ़ रहा है Gen Z का गुस्सा?
इंडोनेशिया की घटनाओं को समझने के लिए नेपाल, बांग्लादेश और दुनिया के दूसरे देशों में युवाओं के आंदोलनों पर भी नजर डालना जरूरी है।
नेपाल: युवाओं के बीच भ्रष्टाचार, राजनीतिक नेतृत्व के प्रति नाराजगी और जवाबदेही की मांग लंबे समय से चर्चा में रही है। सितंबर 2025 में सोशल मीडिया पर प्रतिबंध के खिलाफ शुरू हुआ Gen Z आंदोलन व्यापक राजनीतिक असंतोष में बदल गया और इसके बाद देश की राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिला।
बांग्लादेश: 2024 में सरकारी नौकरियों में आरक्षण व्यवस्था के खिलाफ शुरू हुआ छात्र आंदोलन व्यापक सरकार-विरोधी आंदोलन बन गया। बेरोजगारी, अवसरों की कमी और शासन को लेकर असंतोष ने भी इसमें अहम भूमिका निभाई। इसके परिणामस्वरूप शेख हसीना की सरकार गिर गई।
दूसरे देशों में युवा आंदोलन: अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका के कई देशों में भी युवा रोजगार, महंगाई, भ्रष्टाचार, सरकारी खर्च और सार्वजनिक सेवाओं जैसे मुद्दों पर विरोध करते रहे हैं। हालांकि, हर प्रदर्शन को केवल Gen Z आंदोलन कहना सही नहीं होगा, क्योंकि इनमें अलग-अलग उम्र और सामाजिक वर्गों के लोग भी शामिल होते हैं।
इन घटनाओं से यह स्पष्ट होता है कि युवाओं की नाराजगी किसी एक देश या महाद्वीप तक सीमित नहीं है। फिर भी, इन आंदोलनों की वजहें, उनका स्वरूप और उनके राजनीतिक परिणाम एक-दूसरे से अलग हो सकते हैं।
भारत में भी सड़कों पर उतरी Gen Z
दुनिया के कई देशों में युवाओं का गुस्सा सरकारों के लिए चुनौती बन रहा है। इसी बीच अब भारत में भी Gen Z का आंदोलन चर्चा में है। बता दें कि ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) के नाम से जाना जा रहा है। इसकी शुरुआत सोशल मीडिया पर व्यंग्य और मीम्स के जरिए हुई थी, लेकिन धीरे-धीरे यह बेरोजगारी, परीक्षा में गड़बड़ियों और सरकारी व्यवस्था की जवाबदेही जैसे मुद्दों को उठाने वाला आंदोलन बन गया।
इस आंदोलन को समझना इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि यह दिखाता है कि आज के युवा अपनी नाराजगी जाहिर करने के लिए केवल पारंपरिक राजनीतिक दलों या छात्र संगठनों पर निर्भर नहीं हैं। वे सोशल मीडिया के जरिए लोगों को जोड़ रहे हैं और फिर अपनी मांगों को लेकर सड़कों पर उतर रहे हैं।
आखिर Gen Z सरकारों से इतनी क्यों है नाराज ?
दुनिया भर में युवाओं के विरोध प्रदर्शनों के पीछे कुछ ऐसी वजहें हैं, जो अलग-अलग देशों में अलग रूप में सामने आ रही हैं।
पढ़ाई के बाद भी नौकरी की चिंता
आज के युवा शिक्षा हासिल करने के बाद अच्छी नौकरी और आर्थिक स्थिरता चाहते हैं। लेकिन जब उन्हें अपनी योग्यता के मुताबिक रोजगार नहीं मिलता या उन्हें कम वेतन पर काम करना पड़ता है, तो व्यवस्था के प्रति निराशा बढ़ती है।
महंगाई और बेहतर जीवन का सपना
मकान का किराया, भोजन, शिक्षा, इलाज और परिवहन जैसी जरूरतें महंगी होने पर युवाओं के लिए स्वतंत्र जीवन शुरू करना मुश्किल हो जाता है। उन्हें लगता है कि मेहनत करने के बावजूद वे अपने माता-पिता की तुलना में बेहतर जीवन हासिल नहीं कर पा रहे हैं।
भ्रष्टाचार और परिवारवाद से नाराजगी
जब युवाओं को लगता है कि अवसर योग्यता के बजाय राजनीतिक संबंधों या पैसे के आधार पर मिल रहे हैं, तो सरकारी संस्थाओं पर उनका भरोसा कमजोर पड़ता है। वे चाहते हैं कि कानून सभी पर समान रूप से लागू हो और सत्ता में बैठे लोगों को भी जवाब देना पड़े।
सोशल मीडिया ने आवाज उठाना आसान बनाया
Gen Z इंटरनेट और सोशल मीडिया के दौर में बड़ी हुई पीढ़ी है। वह किसी घटना की जानकारी तेजी से हासिल कर सकती है, दूसरे देशों के आंदोलनों से सीख सकती है और कम समय में बड़ी संख्या में लोगों को एकजुट कर सकती है।
सोशल मीडिया आंदोलनों को गति देने में मदद करता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हर आंदोलन केवल ऑनलाइन गतिविधियों के कारण शुरू होता है। आमतौर पर उसके पीछे वास्तविक सामाजिक, आर्थिक या राजनीतिक समस्याएं भी होती हैं।
लोकतांत्रिक अधिकारों को लेकर बढ़ती जागरूकता
युवा केवल रोजगार और आर्थिक राहत नहीं चाहते। वे यह भी चाहते हैं कि सरकार उनके सवाल सुने, नीतियों पर चर्चा की गुंजाइश हो और असहमति जताने पर उन्हें डर का सामना न करना पड़े।
जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण की चिंता
जंगलों की आग, बाढ़, भीषण गर्मी और प्रदूषण जैसी समस्याएं युवाओं को यह सोचने पर मजबूर करती हैं कि आने वाले वर्षों में उनका जीवन कैसा होगा। वे चाहते हैं कि सरकारें पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाली गतिविधियों पर नियंत्रण रखें और विकास के नाम पर प्रकृति की अनदेखी न करें।
क्या Gen Z आंदोलन सरकारें बदलने की रखते हैं ताकत ?
नेपाल और बांग्लादेश की घटनाएं दिखाती हैं कि बड़े जन आंदोलनों के राजनीतिक परिणाम काफी दूर तक जा सकते हैं। लेकिन हर विरोध प्रदर्शन का नतीजा सरकार बदलना नहीं होता। किसी आंदोलन की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि उसकी मांगें कितनी स्पष्ट हैं, उसे समाज के दूसरे वर्गों का कितना समर्थन मिलता है, सरकार कैसी प्रतिक्रिया देती है और आंदोलन के बाद राजनीतिक विकल्प किस तरह सामने आते हैं।
कई बार विरोध प्रदर्शनों के बाद सरकारें नीतियों में बदलाव करती हैं या जांच की घोषणा करती हैं। कुछ मामलों में आंदोलन कमजोर पड़ जाते हैं, जबकि दूसरे मामलों में वे बड़े राजनीतिक बदलाव का रास्ता खोल देते हैं।
इसलिए केवल सड़कों पर भीड़ जुटने को आंदोलन की अंतिम सफलता नहीं माना जा सकता। असली सवाल यह है कि क्या प्रदर्शन के बाद युवाओं की समस्याओं का समाधान होता है और क्या शासन व्यवस्था पहले से ज्यादा जवाबदेह बनती है।
ये भी पढ़ें-ट्रंप के जिहादियों वाले बयान पर भड़के मैक्रों, कहा- कुछ विदेशी नेताओं ने...