इंदौर: माता-पिता अपनी जिंदगी में आगे बढ़ने के लिए तलाक ले लेते हैं। कोई दूसरी शादी कर लेता है, तो कोई लिव-इन रिलेशनशिप में रहने लगता है। लेकिन इन फैसलों के बीच उस बच्चे की दुनिया में क्या घटता है, जो माता-पिता के रिश्तों के टूटने और बदलने के बीच अकेला पड़ जाता है? उसके मन में उठते सवालों, भावनात्मक उथल-पुथल और भटकाव की जिम्मेदारी आखिर किसकी है? नाटक ‘अजीब दास्ताँ’ इसी संवेदनशील और गंभीर सवाल को दर्शकों के सामने रखता है।

शुक्रवार, 23 अक्टूबर को इंदौर के रवींद्र नाट्यगृह में संस्था सूत्रधार की ओर से दिल्ली के नाट्य दल ‘प्रासंगिक’ ने इस नाटक का मंचन किया। करीब 75 मिनट की इस प्रस्तुति में महानगरीय जीवन की आपाधापी, टूटते पारिवारिक रिश्तों और माता-पिता व बच्चों के बीच बढ़ती संवादहीनता को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया गया। नाटक की परिकल्पना, लेखन और निर्देशन आलोक शुक्ला का है। प्रस्तुति के दौरान कहानी की परतें धीरे-धीरे खुलती हैं और दर्शक पात्रों की परिस्थितियों से जुड़ते चले जाते हैं। अंत में उठने वाले सवाल उन्हें आत्ममंथन के लिए विवश करते हैं।

रिश्तों की उलझनों से खुलती कहानी

नाटक की कहानी दो दंपतियों और उनके पारिवारिक जीवन के इर्द-गिर्द घूमती है। इसकी शुरुआत नशे की गिरफ्त में फँसे एक बच्चे से होती है। उसके जीवन में यह स्थिति कैसे आई और वह इस मुकाम तक क्यों पहुँचा, नाटक इसी सवाल का जवाब तलाशता है। फ्लैशबैक के माध्यम से पात्रों के आपसी संबंधों और उनके जीवन की परिस्थितियों को सामने लाया जाता है। शुरुआत में रिश्तों के समीकरण समझने में दर्शकों को थोड़ी उलझन होती है, लेकिन कहानी आगे बढ़ने के साथ पात्रों के संबंधों की परतें खुलने लगती हैं।

नाटक का सबसे मार्मिक पक्ष उस बच्चे की पीड़ा है, जो माता-पिता के अपने-अपने फैसलों के बीच खुद को अकेला पाता है। माता-पिता अपनी जिंदगी में नई शुरुआत करने में व्यस्त हैं, लेकिन बच्चे के मन में चल रहे द्वंद्व को समझने और उससे संवाद करने की कोशिश नहीं कर पाते। किशोरावस्था में भावनात्मक सहारा, अपनापन और सही मार्गदर्शन बेहद जरूरी होते हैं। इनकी कमी बच्चे को किस तरह भटकाव की ओर ले जा सकती है, नाटक इस पहलू को गंभीरता से उठाता है।

नाटक के अंतिम हिस्से में बच्चे का सवाल पूरी कहानी का केंद्रीय भाव बनकर उभरता है। जब माता-पिता ने अपनी जिंदगी के फैसले खुद लिए, तलाक लिया और नए रिश्ते बनाए, तो उसकी जिंदगी की जिम्मेदारी कौन लेगा? उसकी बिगड़ी हुई हालत का जिम्मेदार कौन है? यह सवाल केवल एक परिवार तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उन तमाम परिवारों के सामने खड़ा हो जाता है, जहाँ बड़ों के आपसी फैसलों के बीच बच्चों की भावनाएँ और जरूरतें अनदेखी रह जाती हैं।

धारदार संवाद और भावपूर्ण गीत

लेखक-निर्देशक आलोक शुक्ला ने रिश्तों की जटिलता को जिस खूबसूरती से नाटक में पिरोया है, वह इसकी प्रमुख विशेषता है। नाटक के संवाद धारदार हैं और कई जगह भीतर तक चोट करते हैं। वे केवल पात्रों की मनःस्थिति को व्यक्त नहीं करते, बल्कि दर्शकों को अपने आसपास के रिश्तों और पारिवारिक जिम्मेदारियों पर विचार करने के लिए भी प्रेरित करते हैं।

नाटक में शामिल पाँच मधुर गीत इसकी भावनात्मक अभिव्यक्ति को और प्रभावशाली बनाते हैं। इन गीतों को आलोक शुक्ला ने लिखा है, जबकि अभ्युदय मिश्रा ने पूरी तन्मयता के साथ गाया है। गीत कथानक के भावों को विस्तार देते हैं और नाटक के वातावरण को संवेदनशील बनाते हैं। ध्वनि प्रभावों का संचालन विनय शर्मा ने सधे हुए ढंग से किया।

मंच सज्जा में प्रयोग, प्रकाश व्यवस्था में सुधार की गुंजाइश

टेकचंद की मंच सज्जा नाटक की प्रस्तुति का एक उल्लेखनीय पक्ष रही। दो घरों के सेट और रिहैबिलिटेशन सेंटर के दृश्यों में दीवारों की जगह पर्दों का इस्तेमाल मंच पर एक अलग दृश्यात्मक प्रभाव पैदा करता है। सीमित साधनों के बीच स्थान परिवर्तन और अलग-अलग परिवेश को दर्शाने का यह प्रयोग नाटक को दृश्यात्मक विविधता प्रदान करता है।

प्रकाश व्यवस्था में दोनों घरों और रिहैबिलिटेशन सेंटर के दृश्यों को कभी एक साथ, तो कभी अलग-अलग रोशनी में उभारने का प्रयास सराहनीय रहा। हालांकि, कुछ दृश्यों में प्रकाश परिवर्तन के दौरान हुई थोड़ी-सी देरी के कारण मंच पर अनावश्यक अँधेरा छा गया। समयबद्धता और तकनीकी समन्वय पर थोड़ा और ध्यान दिया जाए, तो प्रस्तुति का प्रभाव और बेहतर हो सकता है।

कलाकारों का अभिनय और दर्शकों से संवाद

नाटक में निखिल कुमार, मृदुल कुमार, कविता, पलक, आलोक शुक्ला, टेकचंद, अंजली, प्रताप सिंह, विजय लक्ष्मी और विनय शर्मा ने विभिन्न भूमिकाएँ निभाईं। कलाकारों ने पारिवारिक तनाव, रिश्तों की उलझन और भावनात्मक संघर्ष को मंच पर साकार करने का प्रयास किया। कहानी आगे बढ़ने के साथ दर्शकों की दिलचस्पी भी बढ़ती गई।

मंचन के बाद आयोजित ‘निर्देशक से संवाद’ सत्र ने प्रस्तुति को दर्शकों के साथ विचार-विमर्श का अवसर भी दिया। इस सत्र के माध्यम से नाटक में उठाए गए सवालों और उसके सामाजिक संदर्भों पर चर्चा का रास्ता खुला।

टूटते रिश्तों के बीच छूटते बचपन की दास्ताँ

कुल मिलाकर, ‘अजीब दास्ताँ’ केवल टूटते रिश्तों की कहानी नहीं है, बल्कि उन रिश्तों के बीच छूटते बचपन की दास्ताँ भी है। नाटक यह याद दिलाता है कि माता-पिता के जीवन में बदलाव चाहे जितने जरूरी हों, बच्चों की भावनात्मक दुनिया और उनके प्रति जिम्मेदारियाँ कभी गौण नहीं हो सकतीं।

बच्चों को केवल भौतिक सुविधाएँ ही नहीं, बल्कि भावनात्मक सुरक्षा, संवाद, अपनापन और मार्गदर्शन भी चाहिए। नाटक का मूल सवाल यही है कि बड़ों के फैसलों के बीच बच्चों की दुनिया को बिखरने से बचाने की जिम्मेदारी कौन निभाएगा? यही सवाल इस प्रस्तुति को एक पारिवारिक कहानी से आगे ले जाकर गंभीर सामाजिक विमर्श में बदल देता है।

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