Explainer: देश की सबसे कठिन सिविल सेवा परीक्षा यूपीएससी की तैयारी के लिए लोगों को काफी संघर्षों का सामना करना पड़ता है। कुछ लोग महंगी कोचिंग भी लेते हैं। लेकिन कुछ लोग आर्थिक तंगी के कारण कोचिंग लेने में असमर्थ होते है। लेकिन कहते हैं ना कि आसमान में उड़ान भरनी हो तो पंख फैलाने ही पड़ते है। ऐसा ही कुछ गोविंद जायसवाल ने भी किया तो चलिए बताते हैं कैसे अपने सच को साकार कर गोविंद जायसवाल आज आईएएस बन चुकें हैं?

अपने पिता को देते हैं सफलता का श्रेय

परीक्षा को पास करने के लिए कोचिंग अनिवार्य नहीं है। IAS गोविंद जायसवाल ने सफलता की वो इबारत लिखी, जो आज लाखों युवाओं के लिए किसी प्रेरणा से कम नहीं है। अपनी सफलता का पूरा श्रेय वह अपने पिता को देते हैं,

जिनके संघर्षों ने अपने बेटे के सपनों को पंख दिए। गोविंद ने भी गरीबी और आर्थिक कमजोरी के बाद भी सफलता हासिल की, और रिक्शा चालक के बेटे से देश के प्रतिष्ठित प्रशासनिक पद तक पहुंचे।

अनुशासन में रहकर की पढ़ाई

जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने बीते दिनों प्रशासनिक फेरबदल हुआ। जिसमें साल 2007 बैच के AGMUT कैडर के IAS गोविंद जायसवाल को उपराज्यपाल का प्रधान सचिव के तौर पर तैनाती मिली।

इसके साथ ही उन्हें श्री अमरनाथजी श्राइन बोर्ड के CEO के अतिरिक्त प्रभार भी जिम्मेदारी सौंपीगई। जमीन से आसमान तक पहुंचने वाले गोविंद जायसवाल अपने पिता के त्याग और उनके खुद के अनुशासन को बताते हैं।

कैसे रिक्शा चालक का बेटा बना IAS

गोविंद जायसवाल यूपी के वाराणसी में अलईपुरा इलाके की तंग और छोटी सी कोठरी में रहते थे। जहां प्राथमिक पढ़ाई की और देश के सर्वोच्च प्रशासनिक पदों तक पहुंच गए।

गोविंद जायसवाल की कहानी फिल्मी कहानी से कम नहीं। वह रातों-रात सफल नहीं हुए। बल्कि त्याग और संघर्षपूर्ण लंबा इतिहास रहा है।

गरीबी से घिरा परिवार

गोविंद का जीवन शुरू में अच्छा था। पिता के पास 35 रिक्शे थे परिवार का गुजारा भी आराम से हो जाता था। लेकिन गोविंद की मां को ब्रेन हेमरेज हो गई। इलाज में एक-एक करके सारे रिक्शे बिक गई।

2005 में मां के निधन के बाद परिवार की हालात बदतर हो गई थी। कई बार सिर्फ सूखी रोटी खाकर ही सोना पढ़ता था। लेकिन पिता नारायण जायसवाल ने बच्चों की पढ़ाई को रूकने नहीं दिया।

पैरों में जख्म फिर भी पिता ने चलाया रिक्शा

यूपीएससी की तैयारी के लिए गोविंद जायसवाल दिल्ली आए। हर महीना पैसों की जरूरत होती थी। लेकिन पिता ने पैरों में सेप्टिक और जख्म होने पर भी रिक्शा चलाया।

वह खुद भूखे रहे और पैसे इक्ट्ठा कर दिल्ली में बेटे को भेजते। गोविंद ने भी पैसों की तंगी की वजह से महंगी कोचिंग नहीं ली बल्कि बच्चों को ट्यूशन पढ़ाकर एक वक्त का खाना खाते थे।

पहले ही प्रयास में मिली 48वीं रैंक

दर्शनशास्त्र-इतिहास जैसे विषयों पर मेहनत और मजबूत पकड़ के दम पर गोविंद जायसवाल साल 2006 की यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा को पास करने में सफल रहे।उनका पहला अटेंप्ट था। जिसमें 48वीं रैंक हासिल कर उन्होंने इतिहास रच दिया। क्योंकि उन्होंने हिंदी मीडियम से पढ़ाई की थी जिसकी वजह से भी देशभर में चर्चित हुए। IAS गोविंद जायसवाल की संघर्ष गाथा पर आधारित एक फिल्म भी बन चुकी है। जिसका नाम ‘अब है दिल्ली दूर नहीं’।

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