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हिंदू पंचांग के अनुसार 30 मार्च से चैत्र नवरात्रि की शुरुआत हो चुकी है। नवरात्रि का चौथा दिन मां कूष्मांडा को समर्पित है। कहते है जब सृष्टि का अस्तित्व नहीं था, तब माँ कुष्मांडा ने अपनी मंद मुस्कान से ब्रह्मांड की रचना की थी। माँ के मुखमंडल पर जो तेज है, वही सूर्य को प्रकाशवान बनाता है. इसलिए इस देवी को सृष्टि की आदिशक्ति कहा जाता है। माता की सवारी सिंह है, जो शक्ति और साहस को दर्शाती है। इस देवी की आठ भुजाएँ है। इनके साथ हाथों में कमंडल, धनुष, बाण, कमल-पुष्प,अमृतपूर्ण कलश,चक्र और गदा है।
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वहीं माता के आठवें हाथ में सिद्दियों और निधियों को देने वाली जप की माला है। धार्मिक मान्यता हैं की, मां कुष्मांडा की पूजा करने से सभी काम पूरे होते हैं और जिन काम में रुकावट आती है, वे भी बिना किसी बाधा के पूरे हो जाते हैं। मां कुष्मांडा की पूजा करने से भक्तों को सुख और सौभाग्य मिलता है। देवी पुराण में बताया गया है कि विद्यार्थियों को नवरात्रि में मां कुष्मांडा की पूजा जरूर करनी चाहिए। क्यूंकि मां दुर्गा उनकी बुद्धि का विकास करने में सहायक होती हैं। देवी कूष्माण्डा सूर्य ग्रह को भी नियंत्रित करती हैं। इसीलिए इनकी पूजा करते समय भक्तों को सूर्य भगवान का भी आशीर्वाद प्राप्त होता है।
मां कूष्मांडा की कथा
पूरणों के अनुसार एक समय ऐसा था, जब इस ब्रह्मांड का कोई अस्तित्व नहीं था और चारों ओर अंधकार फैला हुआ था। तब माँ आदिशक्ति से देवी का एक रूप उत्पन्न हुआ। माँ का यह स्वरूप सूर्य के समान प्रकाशवान था। उस समय उस स्वरूप के मुखमण्डल पर एक मधुर मुस्कान प्रकट हुई और इससे ब्रह्मांड की उत्पति हुई। जिसके बाद माँ के इस स्वरूप को कूष्माण्डा के नाम से पुकारा जाने लगा। पूरे ब्रह्मांड में केवल माँ कूष्माण्डा ही इतनी शक्तिवान हैं, कि वे सूर्य के केंद्र में निवास करती हैं। माँ कूष्माण्डा सूर्य के केंद्र में रहकर इसे प्रकाश और ऊष्मा प्रदान करती हैं, और सौरमंडल का संचालन करती हैं।
कूष्मांडा देवी मंत्र
नवरात्रि के चौथे दिन नारंगी रंग का वस्त्र पहनकर देवी की सर्वभतेषु मां कूष्मांडा रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।। मंत्र का जप करना शुभ माना जाता है।