Stay on Caste Census: बिहार में जाति जनगणना पर हाईकोर्ट की रोक, पटना हाईकोर्ट में 3 जुलाई को होगी सुनवाई

पटना हाईकोर्ट ने जातीय जनगणना पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दिया है. इस मामले में अगली सुनवाई 3 जुलाई को होगी. पटना हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस वी चन्द्रन की बेंच ने ये फैसला सुनाया है.

04 May 2023

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नीतू पाण्डेय, नई दिल्ली: बिहार की नीतीश सरकार को बड़ा झटका लगा है. पटना हाईकोर्ट ने जातीय जनगणना पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दिया है. इस मामले में अगली सुनवाई 3 जुलाई को होगी. पटना हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस वी चन्द्रन की बेंच ने ये फैसला सुनाया है. जातीय जनगणना पर रोक को लेकर हाईकोर्ट में बुधवार को सुनवाई पूरी कर ली गई थी. सुनवाई पूरी होने के साथ ही आज यानी गुरुवार अंतरिम आदेश देने का समय निर्धारित किया गया था. अदालत ने जातीय जनगणना पर रोक लगाने के साथ ही अब तक जनगणना के दौरान एकत्रित डाटा को सुरक्षित रखने का आदेश दिया है.

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बता दें कि नीतीश सरकार लंबे समय से जातिगत जनगणना कराने के पक्ष में रही है. नीतीश सरकार ने 18 फरवरी 2019 और फिर 27 फरवरी 2020 को जातीय जनगणना का प्रस्ताव बिहार विधानसभा और विधान परिषद में पास करा चुकी है. लेकिन केंद्र इसके खिलाफ रही है. केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दायर कर साफ कर दिया था कि जातिगत जनगणना नहीं कराई जाएगी. केंद्र का कहना था कि ओबीसी जातियों की गिनती करना लंबा और कठिन काम है. बिहार सरकार ने पिछले साल जातिगत जनगणना कराने का फैसला किया था. इसका काम जनवरी 2023 से शुरु हुआ था. इसे मई तक पूरा किया जाना था.लेकिन अब हाईकोर्ट ने 3 जुलाई तक रोक लगा दी है.

हाईकोर्ट ने इस मामले को लेकर 2 दिन सुनवाई हुई थी. इसके बाद अदालत ने फैसला सुरक्षित रख लिया था. नीतीश सरकार के जातिगत जनगणना कराने के फैसले के खिलाफ पटना हाईकोर्ट में 6 याचिकाएं दाखिल की गई थीं. इन याचिकाओं में जातिगत जनगणना पर रोक लगाने की मांग की गई थी. लेकिन बुधवार को इस पर फैसला सुरक्षित रख लिया था.

सरकार ने नगर निकायों एवं पंचायत चुनावों में पिछड़ी जातियों को कोई आरक्षण नहीं देने का हवाला देते हुए कहा कि ओबीसी को 20 प्रतिशत, एससी को 16 फीसदी और एसटी को एक फीसदी आरक्षण दिया जा रहा है. अभी भी सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मुताबिक 50 फीसदी आरक्षण दिया जा सकता है. राज्य सरकार नगर निकाय और पंचायत चुनाव में 13 प्रतिशत और आरक्षण दे सकती है. सरकार ने कोर्ट में तर्क दिया कि इसलिए भी जातीय गणना जरूरी है.

1951 से एससी और एसटी जातियों का डेटा पब्लिश होता है. लेकिन ओबीसी और दूसरी जातियों का डेटा नहीं आता है. इससे ओबीसी का अनुमान लगाना मुश्किल होता है. 1990 में केंद्र की तब वीपी सिंह की सरकार ने दूसरा पिछड़ा वर्ग आयोग की सिफारिश को लागू किया. इसे मंडल आयोग के नाम से जानते है. इसने 1931 की जनगणना के आधार के आधार पर देश में ओबीसी की 52% आबादी होने का अनुमान लगाया था. मंडल आयोग के सिफारिश के आधार पर ही ओबीसी को 27%  आरक्षण दिया जाता है.

केंद्र सरकार जातिगत जनगणना के समर्थन में नहीं है. पिछली साल फरवरी में लोकसभा में जातिगत जनगणना को लेकर सवाल किया गया था. इसके जवाब में गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने बताया था कि संविधान के अनुसार, सिर्फ अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की ही जनगणना हो सकती है.  

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