
Amroha Three Sisters Marriage Case: उत्तर प्रदेश के अमरोहा जिले के हसनपुर क्षेत्र में तीन सगी बहनों और एक ही युवक विकास (कैमरामैन) की शादी का मामला इन दिनों चर्चा में है। एक तरफ जहां यह मामला सामाजिक और पारिवारिक दृष्टि से लोगों का ध्यान खींच रहा है, वहीं दूसरी ओर इसके कानूनी पहलुओं को लेकर कई सवाल उठ रहे हैं।
बाल कल्याण समिति कर रही जांच
बाल कल्याण समिति (CWC) इस मामले में बहनों की उम्र और अन्य परिस्थितियों की जांच कर रही है। वहीं, कानून विशेषज्ञों का कहना है कि यदि सभी पक्षों की सहमति भी हो, तब भी हिंदू विवाह कानून के तहत इस तरह का विवाह वैध नहीं माना जाएगा।
हिंदू विवाह अधिनियम में एक समय में एक ही विवाह की अनुमति
भारत में हिंदू समुदाय के विवाह को नियंत्रित करने वाला प्रमुख कानून हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 है। इस कानून के अनुसार, किसी व्यक्ति का एक समय में केवल एक ही वैध जीवनसाथी हो सकता है। यदि कोई पुरुष अपनी पहली पत्नी के जीवित रहते हुए और बिना कानूनी तलाक लिए दूसरी शादी करता है, तो वह विवाह कानून की नजर में अमान्य माना जाता है। इसी तरह तीसरी शादी भी वैधानिक मान्यता प्राप्त नहीं कर सकती।
इस मामले पर कानूनी विशेषज्ञों का बयान
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, भले ही सभी महिलाएं अपनी इच्छा से इस रिश्ते में रहने के लिए तैयार हों और किसी को कोई आपत्ति न हो, लेकिन कानून विवाह की वैधता को व्यक्तिगत सहमति के आधार पर नहीं, बल्कि निर्धारित कानूनी प्रावधानों के आधार पर तय करता है।
दूसरी और तीसरी महिला को क्यों नहीं मिलेगा पत्नी का दर्जा?
ऐसे मामलों में सबसे बड़ा सवाल यह होता है कि अगर महिलाएं खुद इस रिश्ते के लिए तैयार हैं तो उन्हें पत्नी का अधिकार क्यों नहीं मिलेगा। कानून के अनुसार, पहली शादी के रहते हुए की गई दूसरी या तीसरी शादी वैध विवाह नहीं मानी जाती। इसका अर्थ यह है कि ऐसी शादी से दूसरी या तीसरी महिला को कानूनी पत्नी का दर्जा नहीं मिलता।
उन्हें संपत्ति में पत्नी के रूप में अधिकार, वैवाहिक उत्तराधिकार और अन्य वैवाहिक सुविधाएं प्राप्त करने में कानूनी कठिनाइयां आ सकती हैं। हालांकि, किसी भी विवाद की स्थिति में अदालत मामले के तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर अलग-अलग पहलुओं पर विचार कर सकती है।
BNS की धारा 82 में द्विविवाह पर सजा का प्रावधान
भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 82 में द्विविवाह यानी पहले पति या पत्नी के जीवित रहते दूसरी शादी करने को अपराध माना गया है। यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर ऐसी शादी करता है, तो उसे सजा और जुर्माने का सामना करना पड़ सकता है। सामान्य स्थिति में इसमें सात साल तक की कैद और जुर्माने का प्रावधान है। वहीं, यदि व्यक्ति अपनी पहली शादी की जानकारी छिपाकर दूसरी शादी करता है, तो सजा दस साल तक बढ़ सकती है।
हालांकि, कानून में कुछ अपवाद भी हैं। जैसे यदि पहली शादी को अदालत ने कानूनी रूप से अमान्य घोषित कर दिया हो या जीवनसाथी लंबे समय से लापता हो और कानून की निर्धारित शर्तें पूरी होती हों।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले से भी स्थिति स्पष्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कई मामलों में यह स्पष्ट किया है कि शादीशुदा व्यक्ति के साथ किसी अन्य महिला का संबंध अपने आप वैध वैवाहिक संबंध नहीं बन जाता। ‘इंद्रा शर्मा बनाम वी.के.वी. शर्मा’ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि यदि कोई पुरुष पहले से कानूनी रूप से विवाहित है, तो दूसरी महिला के साथ उसका संबंध हर स्थिति में “विवाह की प्रकृति का संबंध” नहीं माना जा सकता।
हालांकि, ऐसे मामलों में घरेलू हिंसा कानून के तहत राहत का सवाल पूरी तरह परिस्थितियों पर निर्भर करता है। अदालत रिश्ते की प्रकृति, महिला की स्थिति और अन्य तथ्यों को ध्यान में रखकर निर्णय ले सकती है।
क्या बिना शिकायत के भी हो सकती है कार्रवाई?
आम तौर पर द्विविवाह के मामलों में शिकायतकर्ता की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। व्यवहार में ऐसे मामले अक्सर पहली पत्नी या प्रभावित पक्ष की शिकायत के बाद सामने आते हैं। लेकिन यदि प्रशासन या पुलिस को किसी मामले में अपराध या कानून उल्लंघन की जानकारी मिलती है, तो वह जांच प्रक्रिया शुरू कर सकती है। खासकर जब मामला नाबालिगों, जबरन विवाह या अन्य आपराधिक पहलुओं से जुड़ा हो, तो सरकारी एजेंसियां अपनी जिम्मेदारी के तहत कार्रवाई कर सकती हैं।
सहमति के बावजूद कानून क्यों नहीं बदलता?
इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही है कि सभी पक्षों की सहमति होने के बावजूद कानून विवाह की वैधता को अलग नजरिए से देखता है। व्यक्तिगत इच्छा और कानूनी मान्यता दो अलग-अलग बातें हैं। भारत में विवाह केवल सामाजिक समझौता नहीं, बल्कि कानून द्वारा नियंत्रित संस्था भी है। इसलिए किसी रिश्ते को वैध विवाह का दर्जा तभी मिलता है जब वह संबंधित कानूनों की सभी शर्तों को पूरा करता हो।
अमरोहा का यह मामला आने वाले दिनों में जांच और कानूनी प्रक्रिया के आधार पर और स्पष्ट होगा, लेकिन मौजूदा कानूनी प्रावधानों के अनुसार एक व्यक्ति का एक ही समय में एक से अधिक वैध विवाह करना हिंदू कानून के तहत स्वीकार्य नहीं है।
Written By: Geeta Sharma






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