अगर नींद की है कमी तो संभल जाइए, दिमाग पर पड़ सकता है खतरनाक असर!

आज की तेज़ रफ्तार जिंदगी और खराब लाइफस्टाइल ने लोगों की नींद पर गहरा असर डाला है। देर रात तक मोबाइल चलाना, काम का तनाव और अनियमित दिनचर्या के कारण ज्यादातर लोग पर्याप्त नींद नहीं ले पा रहे हैं।

3 घंटे पहले

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आज की तेज़ रफ्तार जिंदगी और खराब लाइफस्टाइल ने लोगों की नींद पर गहरा असर डाला है। देर रात तक मोबाइल चलाना, काम का तनाव और अनियमित दिनचर्या के कारण ज्यादातर लोग पर्याप्त नींद नहीं ले पा रहे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार एक स्वस्थ व्यक्ति के लिए रोजाना कम से कम 7 से 8 घंटे की नींद बेहद जरूरी होती है। नींद हमारे शरीर के लिए किसी 'रीसेट बटन' की तरह काम करती है। जब हम सोते हैं तो शरीर और दिमाग दोनों खुद को रिपेयर करते हैं और अगली सुबह के लिए नई ऊर्जा तैयार करते हैं। लेकिन अगर कोई व्यक्ति लगातार 8 घंटे से कम नींद लेता है तो इसका सीधा असर उसके दिमाग पर पड़ता है। इससे याददाश्त कमजोर होने से लेकर भावनात्मक अस्थिरता तक कई समस्याएं पैदा हो सकती हैं।

याददाश्त और सीखने की क्षमता पर असर

नींद के दौरान दिमाग दिनभर की यादों और जानकारियों को व्यवस्थित करता है, जिसे मेमोरी कंसॉलिडेशन कहा जाता है। पर्याप्त नींद न लेने पर नई जानकारी को याद रखना मुश्किल हो जाता है। दरअसल दिमाग का हिप्पोकैम्पस हिस्सा, जो यादों को बनाने और सुरक्षित रखने का काम करता है, कम नींद की वजह से ठीक तरह से काम नहीं कर पाता। इसका असर पढ़ाई, काम और रोजमर्रा के कामों पर भी दिखाई देने लगता है।

एकाग्रता और निर्णय लेने में कठिनाई

नींद की कमी का प्रभाव दिमाग के उस हिस्से पर भी पड़ता है जो तर्क, योजना और फैसले लेने की क्षमता को नियंत्रित करता है। जब व्यक्ति पूरी नींद नहीं लेता तो उसका ध्यान बार-बार भटकता है और छोटे-छोटे फैसले लेने में भी परेशानी होती है। कई शोध बताते हैं कि 24 घंटे तक न सोना शरीर में 0.10 प्रतिशत अल्कोहल होने जैसी स्थिति पैदा कर सकता है, यानी व्यक्ति बिना शराब पिए भी नशे जैसी अवस्था में महसूस कर सकता है।

भावनात्मक अस्थिरता बढ़ती है

कम नींद लेने वाले लोग अक्सर जल्दी गुस्सा हो जाते हैं या छोटी-छोटी बातों पर तनाव महसूस करते हैं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि दिमाग का इमोशनल सेंटर, जिसे एमिग्डाला कहा जाता है, नींद की कमी के दौरान अधिक सक्रिय हो जाता है। इससे चिड़चिड़ापन, चिंता और उदासी की भावनाएं बढ़ सकती हैं।

अल्जाइमर का बढ़ सकता है खतरा

गहरी नींद के दौरान दिमाग का ग्लिम्फैटिक सिस्टम सक्रिय होता है, जो दिमाग से हानिकारक पदार्थों को बाहर निकालने में मदद करता है। लगातार नींद की कमी होने पर बीटा-एमाइलॉयड जैसे जहरीले प्रोटीन दिमाग में जमा होने लगते हैं। लंबे समय में यही स्थिति अल्जाइमर और डिमेंशिया जैसी गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ा सकती है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि अच्छी सेहत और तेज दिमाग के लिए रोजाना पर्याप्त नींद लेना उतना ही जरूरी है जितना संतुलित आहार और नियमित व्यायाम।

Writen By: Geeta Sharma 

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