सावन का महीना आते ही बाजारों में घेवर की खुशबू और मिठास छा जाती है। जालीदार बनावट, कुरकुरे स्वाद और ऊपर से मलाई या रबड़ी की परत घेवर को खास बना देती है। राजस्थान से जुड़ी यह पारंपरिक मिठाई अब देशभर में लोगों की पसंद बन चुकी है।

सावन और घेवर का रिश्ता है बेहद खास
सावन में घेवर की मांग बढ़ जाती है। खासतौर पर तीज और रक्षाबंधन जैसे त्योहारों पर घरों में घेवर मंगाने और रिश्तेदारों को खिलाने की परंपरा रही है। कई जगह इसे त्योहारों की मिठास और खुशियों का हिस्सा माना जाता है।

कैसे बनता है जालीदार घेवर?
घेवर बनाने के लिए मुख्य रूप से मैदा, घी और चीनी की जरूरत होती है। घोल को गर्म घी में खास तरीके से डाला जाता है, जिससे इसकी पहचान वाली जालीदार बनावट तैयार होती है। इसके बाद इसे चाशनी में डुबोया जाता है और ऊपर से मलाई, रबड़ी, मेवे या केसर से सजाया जाता है।

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मलाई घेवर से लेकर सादा घेवर तक कई स्वाद
आज बाजार में घेवर की कई किस्में मिलती हैं। सादा घेवर सबसे पारंपरिक माना जाता है, जबकि मलाई घेवर और रबड़ी घेवर त्योहारों में खूब पसंद किए जाते हैं। कुछ दुकानों पर सूखे मेवों और केसर से सजाए गए खास घेवर भी मिलते हैं।

राजस्थान से देशभर में पहुंची इसकी मिठास
घेवर की पहचान भले ही राजस्थान से जुड़ी हो, लेकिन समय के साथ यह दिल्ली, हरियाणा, उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों में लोकप्रिय हो गया है। सावन और त्योहारों के मौसम में मिठाई की दुकानों पर इसकी अलग-अलग वैरायटी आसानी से देखने को मिल जाती हैं।

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खरीदते समय इन बातों का रखें ध्यान
घेवर खरीदते समय उसकी खुशबू, रंग और बनावट पर ध्यान देना चाहिए। बहुत ज्यादा चिपचिपा या बासी गंध वाला घेवर नहीं लेना चाहिए। अगर मलाई या रबड़ी वाला घेवर खरीद रहे हैं तो उसे ताजा ही खाना बेहतर रहता है।

 Written By: Shivani Gupta