देश में स्वास्थ्य सेवाओं को ज्यादा पारदर्शी बनाने और अस्पतालों के बिल को लेकर होने वाले विवादों को कम करने के लिए केंद्र सरकार ने अहम कदम उठाया है। सरकार ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया है कि वे अपने यहां के अस्पतालों में इलाज और दूसरी स्वास्थ्य सेवाओं की फीस की सूची ऐसी जगह लगवाएं, जहां मरीज और उनके परिजन उसे आसानी से देख सकें।
इस पहल का मुख्य उद्देश्य मरीजों को इलाज पर होने वाले खर्च की जानकारी पहले से देना है। इससे अस्पताल में भर्ती होने के बाद बिल को लेकर होने वाली परेशानी और विवादों को कम करने में मदद मिल सकती है। हालांकि, अस्पतालों में इस व्यवस्था को पूरी तरह लागू करने और अलग-अलग इलाज की कीमतें तय करने को लेकर कुछ व्यावहारिक चुनौतियां भी सामने आई हैं।
क्लिनिकल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट के तहत देना होगा फीस का ब्योरा
केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव पुण्या सलिला श्रीवास्तव ने सभी राज्यों के मुख्य सचिवों को पत्र लिखकर अस्पतालों में रेट लिस्ट प्रदर्शित करने के नियम का सख्ती से पालन कराने को कहा है, उन्होंने निर्देश दिया है कि फीस की जानकारी अस्पताल में ऐसी जगह लगाई जाए, जहां मरीजों और उनके परिवार के सदस्यों की नजर आसानी से पहुंच सके।
यह निर्देश क्लिनिकल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट, 2010 के नियमों के तहत दिया गया है। इस कानून के अनुसार, संबंधित अस्पतालों को अपनी सेवाओं और इलाज की दरों की जानकारी अंग्रेजी और स्थानीय भाषा में प्रदर्शित करनी होती है।
कानून में यह भी व्यवस्था है कि केंद्र सरकार राज्यों से विचार-विमर्श करके अलग-अलग चिकित्सा सेवाओं और प्रक्रियाओं के लिए दरों की एक सीमा तय कर सकती है। इसका मकसद स्वास्थ्य सेवाओं की कीमतों में पारदर्शिता लाना और मरीजों को खर्च से जुड़ी जानकारी उपलब्ध कराना है।
अस्पतालों की फीस तय करने में क्या हैं चुनौतियां?
सरकार के निर्देश के बाद चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों ने इसके क्रियान्वयन को लेकर अपनी राय रखी है। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA) के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. दिलीप भानुशाली का कहना है कि अस्पतालों में फीस की सूची प्रदर्शित करने का नियम पहले से मौजूद है। ऐसे में सबसे जरूरी सवाल यह है कि सभी अस्पताल इस नियम का सही तरीके से पालन कर रहे हैं या नहीं।
उन्होंने यह भी बताया कि हर मरीज का अंतिम बिल एक जैसा नहीं हो सकता। इलाज का खर्च मरीज की बीमारी की गंभीरता, अस्पताल में रहने की अवधि, इस्तेमाल की गई दवाओं और कराई गई जांचों के आधार पर बढ़ या घट सकता है।
वहीं, एसोसिएशन ऑफ हेल्थकेयर प्रोवाइडर्स के महानिदेशक डॉ. गिरधर जे. ग्यानी के मुताबिक, अस्पताल फीस की जानकारी प्रदर्शित करने के नियम का पालन करते हैं, लेकिन अलग-अलग सेवाओं के लिए दरों की सीमा तय करने से जुड़ा प्रावधान अब तक पूरी तरह लागू नहीं हो पाया है। इसकी एक बड़ी वजह विभिन्न चिकित्सा सेवाओं की वास्तविक लागत का सटीक आकलन न हो पाना है।
हर साल लाखों लोग चिकित्सा संबंधी गलतियों से प्रभावित
स्वास्थ्य सेवाओं में पारदर्शिता के साथ मरीजों की सुरक्षा भी एक बड़ी चिंता बनी हुई है। स्वास्थ्य मंत्रालय के आधिकारिक संचार में दी गई जानकारी के अनुसार, देश में हर साल अनुमानित 52 लाख लोग चिकित्सा से जुड़ी गलतियों के कारण प्रभावित होते हैं।
इन गलतियों में मरीज को गलत दवा देना, दवा की गलत खुराक देना, अस्पताल में संक्रमण फैलना और लंबे समय तक बिस्तर पर रहने के कारण शरीर पर घाव हो जाना जैसी समस्याएं शामिल हैं।
ऐसी घटनाओं को समय रहते पहचानकर और अस्पतालों में इलाज की प्रक्रियाओं को बेहतर बनाकर काफी हद तक रोका जा सकता है। इसके लिए स्वास्थ्यकर्मियों की सतर्कता, सही प्रबंधन और सुरक्षा नियमों का पालन बेहद जरूरी है।
मेडिकल कॉलेजों में नियुक्त होंगे पेशेंट सेफ्टी ऑफिसर
मरीजों की सुरक्षा को मजबूत करने के लिए नेशनल मेडिकल कमीशन (NMC) ने देश के मेडिकल कॉलेजों और चिकित्सा संस्थानों को पेशेंट सेफ्टी ऑफिसर नियुक्त करने से जुड़ा निर्देश जारी किया है।
इस व्यवस्था के तहत संस्थानों में मरीजों की सुरक्षा के लिए एक अधिकारी के साथ विशेष कमेटी भी बनाई जाएगी। यह कमेटी अस्पताल में इलाज के दौरान होने वाली गलतियों पर नजर रखेगी। किसी भी तरह की लापरवाही या गड़बड़ी सामने आने पर उसके कारणों की जांच की जाएगी और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए सुधारात्मक कदम उठाए जाएंगे।
इसका उद्देश्य केवल गलती होने के बाद कार्रवाई करना नहीं, बल्कि अस्पताल की व्यवस्था को इस तरह बेहतर बनाना भी है कि मरीजों को इलाज के दौरान कम से कम जोखिम का सामना करना पड़े।
मरीजों की सुरक्षा के लिए 11 अहम क्षेत्रों पर होगा काम
नई पेशेंट सेफ्टी कमेटियां अस्पतालों में सुरक्षा से जुड़े 11 प्रमुख क्षेत्रों पर ध्यान देंगी। इनमें शामिल हैं:
- सर्जरी के दौरान सुरक्षा: ऑपरेशन से पहले, उसके दौरान और बाद में जरूरी सावधानियां बरतना।
- दवाओं का सही इस्तेमाल: मरीज को सही दवा और उचित खुराक देना।
- ब्लड ट्रांसफ्यूजन: मरीज को खून चढ़ाते समय सुरक्षा नियमों का पालन करना।
- चिकित्सा उपकरणों की सुरक्षा: मशीनों और दूसरे उपकरणों की सही कार्यक्षमता सुनिश्चित करना।
- लैब और डायग्नोस्टिक जांच: जांच के नतीजों की सटीकता बनाए रखना।
- अस्पताल में संक्रमण की रोकथाम: साफ-सफाई और संक्रमण नियंत्रण के नियमों का पालन करना।
- एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस: दवाओं, खासकर एंटीबायोटिक के असर को कम करने वाली समस्या से निपटना।
- वैक्सीन की सुरक्षा: टीकों के सही भंडारण और इस्तेमाल का ध्यान रखना।
- इंजेक्शन की सुरक्षा: इंजेक्शन लगाने की प्रक्रिया में संक्रमण और दूसरी गलतियों से बचना।
- अस्पताल परिसर की सुरक्षा: मरीजों, उनके परिजनों और कर्मचारियों के लिए सुरक्षित माहौल बनाए रखना।
- इलाज से जुड़े जोखिमों की निगरानी: गलतियों की पहचान करना, उनकी समीक्षा करना और भविष्य में उन्हें रोकने के उपाय अपनाना।
मरीजों को क्या होगा फायदा?
अस्पतालों में फीस की जानकारी स्पष्ट रूप से उपलब्ध होने से मरीज और उनके परिजन इलाज से जुड़े खर्च को बेहतर ढंग से समझ सकेंगे। वहीं, पेशेंट सेफ्टी ऑफिसर और विशेष कमेटियों की व्यवस्था से इलाज के दौरान होने वाली गलतियों की पहचान और रोकथाम में मदद मिल सकती है।
हालांकि, इन पहलों का वास्तविक फायदा इस बात पर निर्भर करेगा कि अस्पताल और संबंधित प्रशासन नियमों को कितनी गंभीरता से लागू करते हैं। फीस की जानकारी को नियमित रूप से अपडेट करना, शिकायतों पर कार्रवाई करना और मरीजों की सुरक्षा के नियमों का पालन सुनिश्चित करना इस दिशा में महत्वपूर्ण होगा।