
अमेरिका की नई टैरिफ नीति भारतीय दवा कंपनियों के लिए बड़ी चुनौती बन सकती है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने आयातित जेनेरिक दवाओं पर भारी शुल्क लगाने की योजना का ऐलान किया है। इस फैसले का उद्देश्य अमेरिका में दवा उत्पादन को बढ़ावा देना और विदेशी निर्भरता कम करना बताया गया है। भारत, जो अमेरिका को बड़ी मात्रा में जेनेरिक दवाओं की सप्लाई करता है, इस बदलाव से प्रभावित होने वाले प्रमुख देशों में शामिल हो सकता है।
जीरो टैरिफ से 200% शुल्क तक का प्लान
ट्रंप के अनुसार, यह टैरिफ व्यवस्था चरणबद्ध तरीके से लागू की जाएगी। शुरुआती दो वर्षों तक अमेरिका में आने वाली जेनेरिक दवाओं पर कोई अतिरिक्त शुल्क नहीं लगाया जाएगा। इसके बाद तीसरे वर्ष में आयात शुल्क को 100 प्रतिशत तक बढ़ाने और आगे चलकर इसे 200 प्रतिशत तक ले जाने की योजना बताई गई है।
घरेलू मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने की तैयारी
अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा कि इस नीति का लक्ष्य दवा निर्माण को फिर से अमेरिका में स्थापित करना है। उन्होंने यह भी कहा कि जो कंपनियां तय समय सीमा के भीतर अमेरिका में उत्पादन संयंत्र और जरूरी सुविधाएं विकसित नहीं करेंगी, उन्हें आर्थिक दंड का सामना करना पड़ सकता है।
भारत के लिए क्यों बढ़ सकती है चिंता?
भारत को दुनिया की फार्मेसी कहा जाता है, क्योंकि यहां बनने वाली किफायती जेनेरिक दवाएं कई देशों में इस्तेमाल की जाती हैं। अमेरिकी बाजार भारतीय फार्मा कंपनियों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। अमेरिका में उपलब्ध जेनेरिक दवाओं का एक बड़ा हिस्सा भारतीय कंपनियों से आता है। ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव के आंकड़ों के मुताबिक, वित्त वर्ष 2024-25 में भारत ने अमेरिका को करीब 9.7 अरब डॉलर मूल्य की दवाओं का निर्यात किया। यह भारत के कुल 25.8 अरब डॉलर के दवा निर्यात का लगभग 38 प्रतिशत हिस्सा था।
कंपनियों को बदलनी पड़ सकती है रणनीति
अगर नए टैरिफ लागू होते हैं तो भारतीय दवा कंपनियों की लागत बढ़ सकती है और उन्हें अमेरिका में उत्पादन इकाइयां स्थापित करने या अपनी सप्लाई चेन में बदलाव करने पर विचार करना पड़ सकता है। हालांकि, अभी यह स्पष्ट नहीं है कि अंतिम नीति किस रूप में लागू होगी और भारतीय कंपनियों पर इसका वास्तविक असर कितना पड़ेगा।
दवा कारोबार को लेकर दोनों देशों के बीच चर्चा की संभावना
भारत और अमेरिका के बीच व्यापारिक संबंधों को देखते हुए इस मुद्दे पर बातचीत की संभावना बनी हुई है। दोनों देशों के बीच पहले भी जेनेरिक दवाओं और व्यापार से जुड़े मामलों को आपसी चर्चा के जरिए सुलझाने पर जोर दिया गया है। फिलहाल भारतीय फार्मा उद्योग की नजर अमेरिका के अगले कदमों पर है, क्योंकि जेनेरिक दवाओं के सबसे बड़े बाजारों में से एक में होने वाला कोई भी बदलाव वैश्विक दवा कारोबार को प्रभावित कर सकता है।
Written By Toshi Shah

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