‘Undekhi 4’ Review: दमदार किरदार...कमजोर राइटिंग और फीका रहा क्लाइमैक्स

अगर आप इस सीरीज के लंबे समय से फैन हैं, तो यह सीजन आपको देखने लायक लग सकता है, लेकिन अगर आप नई शुरुआत कर रहे हैं, तो यह आपको उतना प्रभावित नहीं करेगा।

6 घंटे पहले

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‘अनदेखी’(Undekhi) एक ऐसी वेब सीरीज रही है जिसने अपने दमदार कंटेंट के दम पर दर्शकों को जोड़ा, न कि किसी बड़े स्टार पावर या भारी-भरकम प्रमोशन के सहारे। जिन लोगों ने इसे कभी “ट्राई” किया, वे अक्सर एक ही बार में पूरे सीजन तक बिंज कर बैठे। अब इसका चौथा सीजन आया है, जिसे “द फाइनल बैटल” नाम दिया गया है। लेकिन देखने के बाद यह साफ नहीं लगता कि यह वाकई आखिरी पड़ाव है या कहानी अभी आगे भी खिंचेगी। इतना जरूर है कि यह सीजन अब तक का सबसे कमजोर हिस्सा माना जा सकता है। इस बार वह तीखापन और टेंशन, जो पहले सीजनों में लगातार महसूस होती थी, काफी हद तक गायब नजर आती है। एक्टिंग तो अब भी मजबूत है, लेकिन कहानी और स्क्रिप्ट का तालमेल बार-बार लड़खड़ाता दिखता है। कई जगह ऐसा लगता है जैसे कहानी को आगे बढ़ाने के लिए ही आगे बढ़ाया गया हो, न कि किसी ठोस विज़न के साथ।

क्या है कहानी

इस सीजन को समझने के लिए पिछली तीनों कड़ियों से परिचित होना जरूरी है, वरना घटनाएं कनेक्ट नहीं हो पातीं। पापाजी इस बार जेल में हैं, जबकि रिंकू को शक है कि उसी ने उसकी पत्नी की मौत के पीछे हाथ है। जो रिश्ता कभी भरोसे और वफादारी पर टिका था, वह अब दुश्मनी में बदल चुका है। नए किरदार और नई रंजिशें भी कहानी में जुड़ जाती हैं, जिससे टकराव और बढ़ता है। सवाल यही है कि यह लड़ाई आखिर कहां जाकर खत्म होगी।

कैसा रहा सीजन

अगर इसे अकेले देखा जाए तो यह सीजन औसत दर्जे का अनुभव देता है। लेकिन पिछले सीजनों के मुकाबले यह फीका लगता है। पहले जहां हर एपिसोड में एक अलग ऊर्जा और सस्पेंस होता था, वहीं इस बार कई हिस्से खिंचे हुए और दोहराव वाले महसूस होते हैं। कुछ मोड़ आते हैं, लेकिन वे उतना असर नहीं छोड़ते जितना पहले सीजनों में छोड़ा गया था। सीरीज में गाली-गलौज और हिंसा पहले की तरह मौजूद है, लेकिन इस बार कोई ऐसा बड़ा मोमेंट नहीं आता जो लंबे समय तक याद रह जाए। कई एपिसोड ऐसे लगते हैं जैसे कहानी सिर्फ समय पूरा करने के लिए आगे बढ़ रही हो। इमोशनल एंगल जोड़ने की कोशिश जरूर की गई है, लेकिन वह दर्शकों को गहराई से जोड़ नहीं पाती। करीब 8 एपिसोड, हर एक लगभग 45 मिनट का, कई बार लंबा और थोड़ा थका देने वाला अनुभव देते हैं। पुलिस की मौजूदगी भी इस बार कमजोर और अविश्वसनीय लगती है, जिससे कहानी की पकड़ और ढीली हो जाती है।

अभिनय के बारे 

सीरीज की सबसे बड़ी ताकत हमेशा से इसके कलाकार रहे हैं, और इस बार भी वही स्थिति है। हर्ष छाया ने पापाजी के किरदार में एक बार फिर दमदार परफॉर्मेंस दी है, खासकर इमोशनल दृश्यों में। हालांकि कमजोर लेखन उनके असर को थोड़ा कम कर देता है। सूर्या शर्मा ने रिंकू के रोल को पूरी ईमानदारी से निभाया है और वह इस किरदार के साथ पहले की तरह ही जुड़े हुए दिखते हैं। दिब्येंदु भट्टाचार्य प्रभावशाली हैं, लेकिन उनका पुलिस अधिकारी वाला रोल इस बार अच्छी तरह लिखा नहीं गया। वरुण बडोला और बाकी कलाकार भी अपने हिस्से का काम ठीक तरह से निभाते हैं।

लेखन और निर्देशन के बारे में

निर्देशन तकनीकी स्तर पर ठीक-ठाक है, लेकिन असली समस्या स्क्रिप्ट में नजर आती है। कहानी इस बार पहले जैसी धारदार नहीं है। ऐसा महसूस होता है कि इसे सिर्फ फ्रेंचाइजी जारी रखने के लिए आगे बढ़ाया गया है। यही वजह है कि पूरी सीरीज में वह मजबूती नहीं दिखती जो इसे खास बनाती थी।

Written By Toshi Shah

 

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