‘फिजूलखर्ची नहीं, समझदारी जरूरी’, पीएम मोदी की अपील पर देशभर में बहस

सरकार ने साफ किया कि यह किसी तरह की औपचारिक पाबंदी या आर्थिक नियंत्रण लागू करने का प्रयास नहीं था। सरकार के अनुसार प्रधानमंत्री का संदेश जिम्मेदार और विवेकपूर्ण खर्च को बढ़ावा देने से जुड़ा था।

7 घंटे पहले

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से देशवासियों से ईंधन की खपत कम करने, सोने की खरीद घटाने और विदेश यात्राएं टालने जैसी अपीलों ने देशभर में नई बहस को जन्म दिया है। आमतौर पर भारत की अर्थव्यवस्था उपभोग आधारित मानी जाती है, जहां सरकारें लोगों को ज्यादा खर्च करने और बाजार में मांग बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित करती हैं। ऐसे में प्रधानमंत्री की यह अपील कई लोगों को असामान्य लगी और इसे आर्थिक सख्ती यानी ऑस्टेरिटी की ओर संकेत के रूप में देखा जाने लगा।

केंद्र सरकार ने कही ये बात

हालांकि केंद्र सरकार ने साफ किया कि यह किसी तरह की औपचारिक पाबंदी या आर्थिक नियंत्रण लागू करने का प्रयास नहीं था। सरकार के अनुसार प्रधानमंत्री का संदेश जिम्मेदार और विवेकपूर्ण खर्च को बढ़ावा देने से जुड़ा था। यह पूरी तरह स्वैच्छिक अपील थी, जिसे नागरिक अपनी सुविधा और समझ के अनुसार अपनाने के लिए स्वतंत्र हैं।

ईरान युद्ध की स्थिति माना जा रहा बड़ा कारण

इन अपीलों के पीछे पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और ईरान युद्ध की स्थिति को बड़ा कारण माना जा रहा है। खास तौर पर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर चिंता बढ़ी है, जो दुनिया में तेल आपूर्ति का सबसे अहम समुद्री मार्ग माना जाता है। यदि यह रास्ता लंबे समय तक बाधित रहता है, तो वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में तेज वृद्धि हो सकती है, जिसका सीधा असर भारत जैसे आयात-निर्भर देशों पर पड़ेगा।

पीएम मोदी ने “आर्थिक देशभक्ति” का दिया नाम

प्रधानमंत्री मोदी की अपील का मूल उद्देश्य लोगों को खर्च कम करने के लिए मजबूर करना नहीं, बल्कि सोच-समझकर खर्च करने के लिए प्रेरित करना था। उन्होंने इसे “आर्थिक देशभक्ति” से जोड़ा। इसी सोच के तहत विदेशों में डेस्टिनेशन वेडिंग से बचने, सोने की खरीद सीमित करने और ईंधन की बचत करने की बात कही गई। साथ ही वर्क फ्रॉम होम, कार पूलिंग और सार्वजनिक परिवहन के अधिक इस्तेमाल पर भी जोर दिया गया। लोगों से स्थानीय उत्पादों को प्राथमिकता देने और कृषि क्षेत्र में आयातित उर्वरकों पर निर्भरता घटाने की अपील भी की गई।

आयात पर निर्भर है भारत

दरअसल भारत की सबसे बड़ी आर्थिक चुनौतियों में से एक उसकी आयात पर निर्भरता है। देश अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चे तेल, सोना, खाद्य तेल और उर्वरकों के रूप में विदेशों से खरीदता है। जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें बढ़ती हैं, तो इन सभी वस्तुओं का आयात महंगा हो जाता है। इससे विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बढ़ता है और व्यापार घाटा भी प्रभावित होता है। ऐसे समय में सीमित और जिम्मेदार उपभोग को आर्थिक स्थिरता बनाए रखने के उपाय के रूप में देखा जाता है।

Written By Toshi Shah

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