
अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने घोषणा की है कि ईरान के भीतर चलाया जा रहा अमेरिका का सैन्य अभियान अब समाप्त हो चुका है, उन्होंने बताया कि "ऑपरेशन एपिक फ्यूरी" ने अपने निर्धारित उद्देश्यों को हासिल कर लिया है, जिसके बाद लगातार किए जा रहे सैन्य हमलों को रोक दिया गया है। बुधवार को अमेरिकी सांसदों को संबोधित करते हुए रुबियो ने कहा कि वॉशिंगटन अब ईरान की सैन्य क्षमता को कमजोर करने के लिए नियमित हमले नहीं कर रहा है। उनके अनुसार, इस अभियान के दौरान ईरान के रक्षा उद्योग ढांचे को गंभीर नुकसान पहुंचाया गया और उसके मिसाइल लॉन्चर तथा ड्रोन भंडार को काफी हद तक नष्ट कर दिया गया।
युद्धविराम के बीच बढ़ी नई चिंताएं
रुबियो का यह बयान ऐसे समय आया है जब अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष विराम लागू है, हालांकि क्षेत्र में छिटपुट हिंसक घटनाएं अभी भी सामने आ रही हैं। हाल ही में एक ईरानी ड्रोन हमले ने कुवैत अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे को निशाना बनाया, जिसमें एक यात्री टर्मिनल को नुकसान पहुंचा। इस घटना में एक भारतीय नागरिक की मौत हो गई, जबकि कई अन्य लोग घायल हुए। हमले के बाद कुछ समय के लिए हवाई अड्डे का संचालन रोकना पड़ा। इस घटना ने खाड़ी देशों की सुरक्षा को लेकर नई चिंताएं पैदा कर दी हैं, खासकर उन देशों में जो अब तक खुद को इस संघर्ष से अपेक्षाकृत सुरक्षित मानते थे।
ऊर्जा बाजारों पर भी दिख रहा असर
लगभग चार महीने से जारी अमेरिका-ईरान तनाव का प्रभाव वैश्विक ऊर्जा बाजारों पर भी पड़ रहा है। ईरान अब भी होर्मुज जलडमरूमध्य पर प्रभाव बनाए हुए है, जो दुनिया के तेल और गैस व्यापार के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग माना जाता है। दूसरी ओर, अमेरिका ने ईरानी बंदरगाहों पर विभिन्न प्रकार के प्रतिबंध लागू कर रखे हैं।
सहयोगियों के साथ काम कर रहा अमेरिका
अमेरिकी प्रतिनिधि सभा के अध्यक्ष माइक जॉनसन ने कहा कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप क्षेत्र में समुद्री यातायात को सामान्य बनाने के लिए सहयोगी देशों के साथ मिलकर प्रयास कर रहे हैं। उनके मुताबिक, यह कदम क्षेत्र में स्थिरता बहाल करने के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। रुबियो ने यह भी संकेत दिया कि तेहरान के साथ कूटनीतिक बातचीत के रास्ते अभी खुले हुए हैं और संवाद की प्रक्रिया जारी है।
परमाणु समझौते पर सख्त रुख
पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा के कार्यकाल में हुए 2015 के परमाणु समझौते का उल्लेख करते हुए रुबियो ने कहा कि भविष्य में यदि कोई नया समझौता होता है तो उसकी शर्तें पहले की तुलना में कहीं अधिक कड़ी होंगी। उन्होंने स्पष्ट किया कि अमेरिका केवल ऐसे समझौते को स्वीकार करेगा जो उसके सुरक्षा हितों के अनुरूप हो, अन्यथा कोई समझौता नहीं किया जाएगा।
Written By Toshi Shah















