
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 की तैयारियां अभी से तेज हो गई हैं। सभी प्रमुख राजनीतिक दल अपनी-अपनी रणनीति के साथ मैदान में उतर चुके हैं। हालांकि चुनावी मुद्दे अलग-अलग हैं, लेकिन एक बात सभी दलों में समान दिखाई दे रही है,दलित वोट बैंक पर विशेष फोकस।
प्रदेश की लगभग 21 प्रतिशत आबादी दलित समुदाय से आती है और 403 विधानसभा सीटों में 84 सीटें अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हैं। यही वजह है कि भाजपा, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, कांग्रेस, आजाद समाज पार्टी और लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) सभी दलित मतदाताओं को अपने पक्ष में करने की कोशिश कर रहे हैं।
भाजपा की विकास और सामाजिक न्याय की रणनीति
2024 के लोकसभा चुनाव में दलित वोटों में आई कमी के बाद भाजपा ने इस वर्ग को दोबारा अपने साथ जोड़ने के प्रयास तेज कर दिए हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ हाल के दिनों में दलित अत्याचार से जुड़े मामलों में सक्रिय नजर आए हैं। मेरठ में दलित किशोरी हत्या मामले में उन्होंने पीड़ित परिवार से मुलाकात कर सख्त कार्रवाई का भरोसा दिया, साथ ही आर्थिक सहायता और पक्का मकान देने की घोषणा की।
सरकार ने इससे पहले 403 करोड़ रुपये की डॉ. भीमराव आंबेडकर मूर्ति विकास योजना शुरू की, जिसके तहत प्रदेश की सभी विधानसभा सीटों पर आंबेडकर की प्रतिमाओं का संरक्षण और सौंदर्यीकरण किया जा रहा है। भाजपा विकास कार्यों के साथ सामाजिक न्याय और दलित सम्मान को भी अपने अभियान का हिस्सा बना रही है।
PDA फॉर्मूले को मजबूत कर रही समाजवादी पार्टी
समाजवादी पार्टी 2027 में भी अपने PDA (पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक) फॉर्मूले पर भरोसा जता रही है। पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने कांशीराम जयंती को राज्यभर में बड़े स्तर पर मनाकर दलित समाज को संदेश देने की कोशिश की। मेरठ में आयोजित "संविधान बचाओ, लोकतंत्र बचाओ" रैली भी इसी रणनीति का हिस्सा रही। सूत्रों के अनुसार, सपा आरक्षित सीटों के अलावा कई सामान्य सीटों पर भी दलित उम्मीदवार उतारने की तैयारी कर रही है, ताकि दलित समुदाय में अपनी पकड़ और मजबूत की जा सके।
खोया जनाधार वापस पाने की कोशिश में बसपा
2022 विधानसभा और 2024 लोकसभा चुनाव में कमजोर प्रदर्शन के बाद बसपा एक बार फिर अपने पारंपरिक दलित वोट बैंक को मजबूत करने में जुटी है। मायावती ने दलित, मुस्लिम और ओबीसी समुदायों के बीच भाईचारा समितियों को सक्रिय किया है और सामाजिक गठबंधन को पुनर्जीवित करने की कोशिश शुरू की है।
हालांकि मेरठ की घटना पर उनके रुख को लेकर आजाद समाज पार्टी प्रमुख चंद्रशेखर आजाद ने उन्हें निशाने पर लिया। इससे दलित राजनीति में बसपा और आजाद समाज पार्टी के बीच प्रतिस्पर्धा और तेज होती दिख रही है।
नए विकल्प तलाश रहे चंद्रशेखर, कांग्रेस और चिराग
नगीना सांसद चंद्रशेखर आजाद दलित उत्पीड़न के मामलों में लगातार सक्रिय रहकर खुद को दलित समाज की नई आवाज के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं। उनकी पार्टी 2027 चुनाव से पहले उम्मीदवारों की पहचान और जनसंपर्क अभियान चला रही है। कांग्रेस ने भी दलित-ओबीसी राजनीति पर नया फोकस किया है। पार्टी ने बहुजन विचार अभियान शुरू किया है और कांशीराम की विरासत को सम्मान देने की रणनीति अपनाई है।
वहीं केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) भी उत्तर प्रदेश में अपनी राजनीतिक जमीन तलाश रही है। पार्टी दलित चौपाल, पीड़ित परिवारों से मुलाकात और पासी-पासवान समुदाय के बीच संगठन विस्तार के जरिए 2027 में प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर रही है।
क्यों निर्णायक है 'D फैक्टर'
उत्तर प्रदेश की राजनीति में दलित वोट हमेशा निर्णायक रहा है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश, बुंदेलखंड और पूर्वांचल के कई क्षेत्रों में यह चुनावी परिणाम बदलने की क्षमता रखता है। 2022 में भाजपा गठबंधन ने अधिकांश आरक्षित सीटों पर जीत दर्ज की थी, जबकि 2024 के लोकसभा चुनाव में दलित वोटों का एक हिस्सा विपक्ष की ओर जाता दिखाई दिया।
यही कारण है कि 2027 की लड़ाई में दलित समुदाय केवल वोट बैंक नहीं, बल्कि सत्ता की चाबी बनकर उभर रहा है। आने वाले महीनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि किस दल की रणनीति दलित मतदाताओं का सबसे अधिक भरोसा जीतने में सफल रहती है।
Written By: Geeta Sharma











