
रामपुर स्थित मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी की 38 इमारतों को ध्वस्त किए जाने संबंधी आदेश पर जमीयत उलेमा-ए-हिन्द के अध्यक्ष मौलाना महमूद मदनी ने गहरी चिंता व्यक्त किया। उत्तर प्रदेश सरकार से इस निर्णय पर पुनर्विचार करने की मांग की है। उन्होंने कहा कि यह मामला केवल एक शैक्षणिक संस्थान तक सीमित नहीं है। बल्कि कानून के शासन, प्राकृतिक न्याय, संवैधानिक मूल्यों और हज़ारों छात्रों के भविष्य से सीधे जुड़ा हुआ है।
शैक्षिक भविष्य पर पड़ सकता है गंभीर प्रभाव
मौलाना मदनी ने कहा कि यदि ध्वस्तीकरण की कार्रवाई अमल में लाई जाती है। तो इसका सबसे बड़ा नुकसान उन हज़ारों छात्रों को होगा, जो इस विश्वविद्यालय में शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि किसी भी शैक्षणिक संस्थान के बुनियादी ढांचे को नष्ट करने का सीधा प्रभाव विद्यार्थियों की पढ़ाई, उनके मौलिक अधिकारों और देश की शैक्षिक एवं बौद्धिक पूंजी पर पड़ेगा। उन्होंने इसे जनहित और शिक्षा के व्यापक हितों के विपरीत बताया।
ध्वस्तीकरण ही एकमात्र कानूनी विकल्प नहीं
मौलाना मदनी ने स्पष्ट किया कि यदि किसी निर्माण में कानूनी उल्लंघन सिद्ध भी हो जाए, तब भी ध्वस्तीकरण हमेशा अनिवार्य या एकमात्र उपाय नहीं होता। उन्होंने उत्तर प्रदेश शहरी नियोजन एवं विकास अधिनियम, 1973 की धारा 27(1) का उल्लेख करते हुए कहा कि कानून स्वयं ऐसे मामलों में वैकल्पिक समाधान की अनुमति देता है।
उन्होंने कहा कि यदि किसी भवन का निर्माण मूल भूमि उपयोग (लैंड यूज़) अथवा मास्टर प्लान के प्रतिकूल नहीं है, तो विकास प्राधिकरण संशोधित मानचित्र की स्वीकृति, नियमितीकरण (रेग्युलराइजेशन), विकास शुल्क, कंपाउंडिंग तथा अन्य आर्थिक दंड के माध्यम से मामले का समाधान कर सकता है। देश के विभिन्न विकास प्राधिकरण वर्षों से ऐसे वैधानिक उपाय अपनाते रहे हैं।
न्यायिक मिसालों का भी दिया हवाला
मौलाना मदनी ने कहा कि अनेक न्यायिक निर्णय भी इस सिद्धांत का समर्थन करते हैं कि ध्वस्तीकरण अंतिम विकल्प होना चाहिए। उन्होंने कानपुर के रोमा इंडस्ट्रियल एरिया स्थित इंजीनियरिंग कॉलेज, वाराणसी विकास प्राधिकरण, झांसी विकास प्राधिकरण तथा इलाहाबाद विकास प्राधिकरण से जुड़े मामलों का उल्लेख करते हुए कहा कि न्यायालयों ने कई अवसरों पर कंपाउंडिंग, नियमितीकरण तथा अन्य वैधानिक उपायों को प्राथमिकता देने पर बल दिया है। उनका कहना था कि इन न्यायिक मिसालों से स्पष्ट होता है कि प्रशासनिक कार्रवाई करते समय संतुलित और न्यायसंगत दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है, विशेषकर तब जब मामला शिक्षा और सार्वजनिक हित से जुड़ा हो।
सरकार से पुनर्विचार और संतुलित समाधान की अपील
जमीयत उलेमा-ए-हिन्द के अध्यक्ष ने उत्तर प्रदेश सरकार से आग्रह किया कि वह इस संवेदनशील विषय में अपने संवैधानिक दायित्व और कानूनी विवेक का परिचय दे। उन्होंने कहा कि सरकार को ध्वस्तीकरण जैसी कठोर कार्रवाई से पहले सभी उपलब्ध वैधानिक विकल्पों पर गंभीरता से विचार करना चाहिए, ताकि कानून का पालन भी सुनिश्चित हो और शिक्षा व्यवस्था को भी नुकसान न पहुंचे। उन्होंने कहा कि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में कानून का उद्देश्य केवल दंड देना नहीं, बल्कि न्यायपूर्ण समाधान सुनिश्चित करना भी होता है। ऐसे में यदि नियमितीकरण, कंपाउंडिंग या अन्य कानूनी उपायों के माध्यम से समाधान संभव है, तो उन्हें प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
शिक्षा और न्याय के बीच संतुलन की आवश्यकता
मौलाना मदनी ने कहा कि मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी जैसे संस्थानों का भविष्य केवल एक प्रशासनिक निर्णय का विषय नहीं है, बल्कि यह हज़ारों छात्रों की शिक्षा, उनके करियर और समाज के बौद्धिक विकास से जुड़ा प्रश्न है। उन्होंने उम्मीद जताई कि सरकार कानून, न्याय और जनहित के बीच संतुलन स्थापित करते हुए ऐसा निर्णय लेगी, जिससे एक ओर विधि का सम्मान बना रहे और दूसरी ओर देश की महत्वपूर्ण शैक्षिक धरोहर तथा विद्यार्थियों का भविष्य सुरक्षित रह सके।
Written By: एम अतहर उद्दीन मुन्ने भारती

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