कुडनकुलम न्यूक्लियर प्लांट से जुड़े डेटा में कथित सेंध: 19 हजार संवेदनशील फाइलें लीक होने का दावा, सुरक्षा पर उठे सवाल

तमिलनाडु के कुडनकुलम न्यूक्लियर पावर प्लांट से जुड़े कथित संवेदनशील डेटा लीक होने की खबर ने देश की साइबर सुरक्षा और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे की सुरक्षा को लेकर नई चिंताएं पैदा कर दी हैं।

13 घंटे पहले

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तमिलनाडु के कुडनकुलम न्यूक्लियर पावर प्लांट से जुड़े कथित संवेदनशील डेटा लीक होने की खबर ने देश की साइबर सुरक्षा और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे की सुरक्षा को लेकर नई चिंताएं पैदा कर दी हैं। रिपोर्टों के अनुसार, 'वर्ल्ड लीक्स' नामक एक हैकर समूह ने दावा किया है कि उसने प्लांट से संबंधित लगभग 19,000 संवेदनशील दस्तावेज हासिल कर लिए हैं।

दस्तावेजों की स्वतंत्र पुष्टि अभी तक नहीं हुई है

इन दस्तावेजों में प्लांट के कुछ हिस्सों के ब्लूप्रिंट, सप्लायर्स की जानकारी, मीटिंग और इंस्पेक्शन रिकॉर्ड, उपकरणों के मूल्यांकन और इंश्योरेंस से जुड़े दस्तावेज शामिल बताए जा रहे हैं। हैकर समूह का दावा है कि यह डेटा रिलायंस ग्रुप से संबंधित है, जो कुडनकुलम परियोजना में एक कॉन्ट्रैक्टर के रूप में कार्य कर रहा है। हालांकि, लीक हुए सभी दस्तावेजों की स्वतंत्र पुष्टि अभी तक नहीं हुई है।

रिलायंस ग्रुप ने स्वीकार की आंशिक सेंधमारी

रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, अनिल अंबानी के रिलायंस ग्रुप ने स्वीकार किया है कि उसके डेटा में आंशिक सेंधमारी हुई है। कंपनी ने बताया कि संबंधित डेटा थर्ड-पार्टी डेटा सेंटर सेवा प्रदाता 'योट्टा' के सर्वर पर होस्ट किया गया था। कंपनी ने इस घटना की जानकारी भारत सरकार को दे दी है और मामले की जांच जारी है। हालांकि, रिलायंस ग्रुप ने यह स्पष्ट नहीं किया कि आखिर किस प्रकार का डेटा चोरी हुआ है और इससे परियोजना की सुरक्षा पर कितना प्रभाव पड़ सकता है।

2016 से 2025 तक के दस्तावेज होने का दावा

रिपोर्टों के अनुसार, कथित तौर पर लीक हुई फाइलें वर्ष 2016 से 2025 के बीच की हैं। हैकर समूह की वेबसाइट पर मौजूद लगभग 8.58 लाख फाइलों में से करीब 19,000 दस्तावेजों को सबसे संवेदनशील और गोपनीय बताया गया है। हालांकि, इन दस्तावेजों की प्रामाणिकता की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। इसलिए इन्हें लेकर किए जा रहे दावों को जांच पूरी होने तक सावधानी से देखा जाना चाहिए।

परमाणु सुरक्षा विशेषज्ञों ने जताई चिंता

परमाणु सुरक्षा मामलों पर काम करने वाले विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसी परमाणु परियोजना से जुड़े तकनीकी या संचालन संबंधी दस्तावेज गलत हाथों में पहुंच जाते हैं, तो इससे सुरक्षा व्यवस्था प्रभावित हो सकती है। न्यूक्लियर थ्रेट इनिशिएटिव के वरिष्ठ निदेशक निकोलस रोथ के अनुसार, इस तरह की घटनाएं महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे की साइबर सुरक्षा को और मजबूत करने की आवश्यकता को रेखांकित करती हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि आज के दौर में साइबर हमले केवल वित्तीय नुकसान तक सीमित नहीं हैं, बल्कि ऊर्जा, रक्षा और परमाणु जैसे रणनीतिक क्षेत्रों को भी निशाना बना रहे हैं।

कुडनकुलम परियोजना में रिलायंस की भूमिका

रिलायंस इंफ्रास्ट्रक्चर को वर्ष 2018 में कुडनकुलम न्यूक्लियर पावर प्लांट की यूनिट-3 और यूनिट-4 के डिजाइन और निर्माण का अनुबंध मिला था। दोनों इकाइयों का निर्माण कार्य जारी है और इनके वर्ष 2027 तक चालू होने की उम्मीद है। दोनों यूनिटों के शुरू होने के बाद लगभग 2,000 मेगावाट अतिरिक्त बिजली उत्पादन क्षमता जुड़ जाएगी, जिससे देश की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में मदद मिलेगी।

कौन है 'वर्ल्ड लीक्स' हैकर ग्रुप?

'वर्ल्ड लीक्स' एक कथित साइबर अपराधी समूह है, जो कंपनियों का डेटा चुराकर फिरौती मांगने के लिए जाना जाता है। यदि फिरौती नहीं दी जाती, तो यह कथित रूप से डेटा को सार्वजनिक या डार्क वेब पर जारी करने की धमकी देता है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, इस समूह ने पहले भी कई बड़ी कंपनियों को निशाना बनाया है। दावा किया गया है कि जून में इसने टाटा समूह से जुड़े डेटा को भी सार्वजनिक किया था, जिसमें वैश्विक ब्रांडों के गोपनीय डिजाइन दस्तावेज होने का आरोप लगाया गया था।

साइबर सुरक्षा को और मजबूत करने की जरूरत

यह घटना एक बार फिर यह संकेत देती है कि महत्वपूर्ण राष्ट्रीय परियोजनाओं और उनसे जुड़े ठेकेदारों के लिए मजबूत साइबर सुरक्षा ढांचा कितना आवश्यक है। फिलहाल जांच एजेंसियां पूरे मामले की पड़ताल कर रही हैं। जांच पूरी होने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि कथित रूप से लीक हुए डेटा की प्रकृति क्या थी, उसका दायरा कितना बड़ा था और राष्ट्रीय सुरक्षा पर उसका वास्तविक प्रभाव कितना पड़ सकता है।

Written By: Geeta Sharma 

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