बीजेपी का मिशन 2027: ‘सीट संकट’ के ‘चक्रव्यूह’ से कैसे निकलेगी बीजेपी? जानिये पूरा प्लान…

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 से पहले बीजेपी के सामने सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ विपक्ष नहीं, बल्कि एनडीए सहयोगियों के बीच सीटों का संतुलन बनाए रखना है। पार्टी सहयोगियों को संतुष्ट करने के लिए स्ट्राइक रेट और चुनाव चिन्ह के फॉर्मूले पर काम कर सकती है, ताकि गठबंधन मजबूत रहे और नेतृत्व भी बीजेपी के हाथ में बना रहे।

13 घंटे पहले

लखनऊ: यूपी में विधानसभा चुनाव की तारीखों का ऐलान भले ही अभी नहीं हुआ हो, लेकिन सियासत की हांडी अभी से चढ़ने लगी है।सबकी नजर सत्ताधारी दल बीजेपी पर टिकी हुई है। एक तरफ जहां-कांग्रेस और समाजवादी पार्टी में खटास की खबरें आ रही है,वहीं दूसरी तरफ एनडीए में भी सब कुछ ऑल इज वेल है,ऐसा नहीं कहा जा सकता। हर बार की तरह इस बार भी एनडीए में शामिल दलों की निगाहें ज्यादा से ज्यादा सीटों पर है।सहयोगी दलों की ये चाह बीजेपी को कहीं न कहीं परेशानी में डाल सकती है।

तीसरी बार सत्ता पर काबिज होने की तैयारी

सूबे के सिंहासन पर लगातार तीसरी बार सत्तारूढ़ होने के लिए भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने चुनावी बिसात बिछानी शुरू कर दी है। अपनी सत्ता को बचाने के लिए बीजेपी को केवल विपक्ष से ही लोहा नहीं लेना है,बल्कि अपने सहयोगी को एकजुट रखना भी उसके लिए किसी संकट से कम नहीं हैं।दरअसल चुनाव में ज्यादा सीट की लालसा सहयोगियों को बीजेपी से दूर कर सकती है।इसी मौके को लपकने के लिए विपक्ष तैयार बैठा है।लिहाजा इस संकट से पार पाना बीजेपी के लिए बड़ी जिम्मेदारी है।

सहयोगियों की दावेदारी मुसीबत न बन जाए

पिछले विधानसभा चुनाव यानि 2022 में एनडीए के केवल दो प्रमुख सहयोगी थे। एक पार्टी थी अपना दल(सोनेलाल)और दूसरी पार्टी थी संजय निषाद की निषाद पार्टी।उस वक्त भारतीय जनता पार्टी ने इन दलों को तकरीबन 33 सीटें दी थी।जिसमें 10 प्रत्याशी बीजेपी के चुनाव चिन्ह पर इलेक्शन लड़े थे।

बढ़ चुका है एनडीए का कुनबा

2027 के विधानसभा चुनाव में पहले वाली स्थिति नहीं है।2022 के मुकाबले 2027 में एनडीए का कुनबा बढ़ चुका है।इस वक्त बीजेपी के साथ चार दल हैं। हर दल की अपनी क्षेत्रीय और जातिगत पकड़ है।जिसके चलते बीजेपी किसी भी दल को नाराज नहीं करना चाहेगी।अगर बात करें अपना दल (सोनेलाल)की तो उसे 2022 में 17 सीटें मिली थीं। जबकि संजय निषाद की निषाद पार्टी के खाते में 16 सीटें गई थी।लेकिन इस बार बीजेपी के खाते में दो और सहयोगी जुट गए हैं।

पहली जयंत चौधरी की RLD यानि राष्ट्रीय लोकदल। जिसने 2022 के चुनाव में समाजवादी पार्टी के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था। तब सपा ने उन्हें 33 सीटें दी थी। दूसरी ओमप्रकाश राजभर की सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी(SBSP)।इसने भी समाजवादी पार्टी के साथ ही मिलकर चुनाव लड़ा था।सपा ने उन्हें 17 सीटें दी थी।ये दोनों ही पार्टियां अब एनडीए में शामिल हो चुकी हैं।लिहाजा विधानसभा चुनाव में सीटों को लेकर इनकी मांग 2022 की तरह या उससे ज्यादा हो सकती है।

अब सवाल उठता है कि, अगर बीजेपी पुराने सहयोगियों को इस बार भी उतनी ही सीट देती है,जितनी उसने पिछली बार दी थी।और नए सहयोगियों को उनकी मांग के मुताबिक सीटें देती है,तो उसे अपने कोटे की सीटें कम करनी होगी,जो आसान नहीं होगा।बता दें कि, 2022 में बीजेपी ने 370 सीटों पर चुनाव लड़ा था।लिहाजा अगर बीजेपी अपने कोटे से सीटें कम करती है,तो बहुत सारे नेताओं का टिकट उसे काटना होगा।जो पार्टी और कैडर दोनों के लिए आसान नहीं होगा।

सहयोगियों को कैसे साधेगी बीजेपी?

सियासी पंडितों और सूत्रों की माने तो बीजेपी सहयोगी दलों को संतुष्ट करने के लिए स्ट्राइक रेट और सिंबल के फॉर्मूले पर काम कर सकती है।सूत्रों की मानें तो इस बार बीजेपी सहयोगियों को 2022 के मुकाबले ज्यादा सीटें दे सकती है।लेकिन उन्हें मिलने वाली सीटों की संख्या कम हो जाएगी।RLD को 12 से 15 सीटें दी जा सकती हैं।जबकि अपना दल(एस) के खाते में 12 से 14 सीटें जा सकती हैं। वहीं बात करे निषाद पार्टी की तो उसे 7 से 8 सीटें दी जा सकती हैं। सुभासपा को भी 6 से 8 सीटें बीजेपी दे सकती है।

कुल मिलाकर कहा जाए तो 2027 विधानसभा चुनाव की जंग काफी दिलचस्प होने वाली है।क्योंकि कुल मिलाकर सहयोगियों के खाते में सीटें तो ज्यादा आएंगी,लेकिन कमान पूरी तरह बीजेपी के ही हाथ में होगी

 

 

Written By Toshi Shah  

 

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