
भारत में ट्रेन सिर्फ एक यातायात का साधन नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की जिंदगी का अहम हिस्सा है। हर दिन लाखों लोग रेल से सफर करते हैं। किसी के लिए यह रोज़मर्रा की जरूरत है, तो किसी के लिए यादों से भरा अनुभव। आपने भी कभी न कभी ट्रेन में सफर जरूर किया होगा। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि ट्रेन चलाने वाले व्यक्ति को ‘ड्राइवर’ नहीं, बल्कि ‘लोको पायलट’ क्यों कहा जाता है?
जानें लोको पायलट कहने के पीछे की वजह
आमतौर पर बस, कार या टैक्सी चलाने वाले व्यक्ति को ड्राइवर कहा जाता है। लेकिन ट्रेन के मामले में यह शब्द इस्तेमाल नहीं किया जाता, क्योंकि ट्रेन को संचालित करना कहीं अधिक जिम्मेदारी और तकनीकी समझ का काम होता है। यही वजह है कि इसके लिए एक अलग और खास पदनाम तय किया गया है। दरअसल, ट्रेन का इंजन ‘लोकोमोटिव’ कहलाता है। इसी से ‘लोको’ शब्द लिया गया है। वहीं ‘पायलट’ उस व्यक्ति को कहा जाता है, जो किसी भारी और जटिल मशीन को सुरक्षित तरीके से नियंत्रित करते हुए सही दिशा में आगे बढ़ाता है। जब इन दोनों शब्दों को मिलाया गया, तो बना ‘लोको पायलट’।
इंजन को नियंत्रित करते हुए सैकड़ों यात्रियों रखता है सुरक्षित
यानी लोको पायलट वह व्यक्ति होता है, जो लोकोमोटिव इंजन को नियंत्रित करते हुए सैकड़ों यात्रियों से भरी ट्रेन को सुरक्षित रूप से उनकी मंजिल तक पहुंचाने की जिम्मेदारी निभाता है। इस काम में सिर्फ ट्रेन चलाना ही शामिल नहीं होता, बल्कि सिग्नल पर नजर रखना, ट्रैक की स्थिति समझना, गति को नियंत्रित करना और यात्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित करना भी शामिल है। यही कारण है कि लोको पायलट को केवल ड्राइवर नहीं माना जाता, बल्कि एक प्रशिक्षित और जिम्मेदार ऑपरेटर के रूप में देखा जाता है।
Written By Toshi Shah










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