
जब भी ऊंट का नाम लिया जाता है, तो लोगों के मन में रेगिस्तान, लंबी यात्राएं और उसका पौष्टिक दूध याद आता है। लेकिन इन दिनों ऊंट एक नई वजह से चर्चा में है। इस बार वजह उसका दूध नहीं, बल्कि उसके आंसू हैं। हाल ही में हुई एक वैज्ञानिक रिसर्च में दावा किया गया है कि ऊंट के आंसुओं में ऐसे खास तत्व मौजूद हो सकते हैं, जो भविष्य में सांप के जहर के इलाज में उपयोगी साबित हों। यह बात सुनने में भले ही अनोखी लगे, लेकिन वैज्ञानिक इसे गंभीरता से जांच रहे हैं। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि अभी यह रिसर्च शुरुआती चरण में है और इसे अंतिम सत्य मानना जल्दबाजी होगी।
ऊंट के आंसुओं में क्या खास मिला?
दुबई की Central Veterinary Research Laboratory और भारत के National Research Centre on Camel के वैज्ञानिकों ने ऊंट की रोग प्रतिरोधक क्षमता पर अध्ययन किया। इस दौरान शोधकर्ताओं का ध्यान ऊंट के शरीर में बनने वाली एक खास एंटीबॉडी पर गया, जिसे “नैनोबॉडी” कहा जाता है। ये नैनोबॉडी सामान्य एंटीबॉडी की तुलना में आकार में काफी छोटी होती हैं। छोटे आकार के कारण वे शरीर में तेजी से फैल सकती हैं और जहरीले टॉक्सिन तक आसानी से पहुंच सकती हैं। वैज्ञानिकों ने पाया कि ऊंट के शरीर में बनने वाली ये नैनोबॉडी कुछ जहरीले सांपों के विष के असर को कम करने की क्षमता रख सकती हैं। सबसे दिलचस्प बात यह रही कि ऐसे तत्व सिर्फ खून में ही नहीं, बल्कि आंसुओं में भी पाए जाने की संभावना सामने आई।
कैसे किया गया अध्ययन?
रिसर्च के दौरान वैज्ञानिकों ने नियंत्रित मात्रा में सांप का जहर ऊंटों के शरीर में देकर उनकी प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया का अध्ययन किया। इसके बाद ऊंटों के शरीर से अलग-अलग नमूने लिए गए। जांच में पता चला कि उनका शरीर जहर से लड़ने वाले विशेष तत्व बना रहा था। इसी प्रक्रिया में वैज्ञानिकों ने आंसुओं में मौजूद नैनोबॉडी पर भी ध्यान दिया।
क्या कोबरा और करैत के जहर पर असर हो सकता है?
शुरुआती अध्ययनों में संकेत मिले हैं कि ये नैनोबॉडी कई खतरनाक सांपों के जहर के खिलाफ असर दिखा सकती हैं। इनमें कोबरा, करैत और वाइपर जैसे जहरीले सांप शामिल बताए जा रहे हैं। कुछ रिपोर्टों में यह दावा भी किया गया कि ये तत्व अलग-अलग प्रकार के जहर पर प्रभावी हो सकते हैं। हालांकि वैज्ञानिक अभी सतर्क हैं। उनका कहना है कि रिसर्च के सभी आंकड़े अभी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं हैं और इस विषय पर व्यापक वैज्ञानिक सहमति बनना बाकी है। इसलिए फिलहाल इसे संभावित खोज के रूप में ही देखा जा रहा है।
भारत के लिए क्यों अहम है यह रिसर्च?
भारत उन देशों में शामिल है, जहां हर साल बड़ी संख्या में लोग सांप के काटने का शिकार होते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में समय पर इलाज और एंटीवेनम न मिलने के कारण हजारों लोगों की जान चली जाती है। ऐसे में यदि कम लागत और आसानी से इस्तेमाल होने वाली नई एंटीवेनम तकनीक विकसित होती है, तो यह स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए बड़ी उपलब्धि हो सकती है।
मौजूदा एंटीवेनम की चुनौतियां
वर्तमान में इस्तेमाल होने वाले अधिकांश एंटीवेनम घोड़ों या अन्य जानवरों की मदद से तैयार किए जाते हैं। इन दवाओं को सुरक्षित तापमान में रखना पड़ता है और कई बार इनके कारण एलर्जी जैसी समस्याएं भी हो सकती हैं। दूरदराज इलाकों में इन्हें पहुंचाना और सुरक्षित रखना बड़ी चुनौती बन जाता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि ऊंट की नैनोबॉडी आधारित तकनीक सफल होती है, तो भविष्य में ज्यादा स्थिर, सुरक्षित और प्रभावी एंटीवेनम तैयार किए जा सकते हैं।
सोशल मीडिया पर फैल रही गलतफहमियां
इस रिसर्च की खबर वायरल होने के बाद सोशल मीडिया पर कई तरह के दावे किए जाने लगे। कुछ लोगों ने इसे चमत्कारी इलाज तक बता दिया। लेकिन विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया है कि सीधे ऊंट के आंसुओं का उपयोग इलाज के रूप में नहीं किया जा सकता। यदि भविष्य में कोई दवा विकसित होती है, तो उसके लिए वैज्ञानिक तरीके से आंसुओं या शरीर से विशेष नैनोबॉडी निकालकर प्रयोगशाला में प्रक्रिया करनी होगी। यानी केवल ऊंट के आंसू इस्तेमाल करने से सांप के जहर का इलाज संभव नहीं है।
Written By Toshi Sha










.jpg)



.jpg)
