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चिड़ियाघरों में लगातार हो रही वन्यजीवों की मौतें संरक्षण व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करती हैं। यह घटनाएं आपको यह सोचने पर मजबूर करती हैं कि क्या हम सच में वन्यजीवों को बचा पा रहे हैं या फिर केवल उन्हें जीवित रहने का भ्रम दे रहे हैं। लोहे की सलाखों के पीछे कैद जीवन, सीमित दायरा और प्रकृति से कटे हालात—राष्ट्रीय प्राणी उद्यान में वन्यजीवों की यह खामोश पीड़ा अब मौतों के आंकड़ों में तब्दील होने लगी है। खुले जंगलों के लिए बने ये जीव जब कैद और एकाकी जीवन में सिमट जाते हैं, तो केवल उनका शरीर ही नहीं बल्कि उनका मन भी टूटने लगता है। मानसिक तनाव, अकेलापन और बीमारियां धीरे-धीरे उनकी सांसें छीनती जा रही हैं।
कैद मे मासूम सांसे
केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण की रिपोर्ट के मुताबिक, 1 अप्रैल 2024 से 31 मार्च 2025 के बीच कुल 127 वन्यजीवों की मौत हो रही है। इनमें चिंकारा, काला हिरण, बारहसिंगा, नीलगाय, भारतीय हॉग हिरण और चीतल जैसी प्रजातियां शामिल हैं। चिड़ियाघरों में वन्यजीवों की मौत का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। काले हिरण और अन्य शाकाहारी जानवर बेहद संवेदनशील होते हैं। छोटी-सी आवाज, अचानक हलचल या डर भी उनमें तीव्र शारीरिक प्रतिक्रिया पैदा कर सकता है, जो कई बार जानलेवा साबित होती है। कैप्चर मायोपैथी, आपसी संघर्ष और पर्यावरणीय बदलाव को वन्यजीवों की मौत के प्रमुख कारणों में गिना जा रहा है।
तनाव में दम तोड़ते वन्यजीव
रिपोर्ट के अनुसार, बड़ी संख्या में जानवर सदमे और मानसिक-शारीरिक तनाव के कारण दम तोड़ रहे हैं। केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण की रिपोर्ट बताती है कि 2024-25 के दौरान 35 जानवरों की मौत सदमे (शॉक) से हुई, जबकि 25 जानवर मानसिक या शारीरिक तनाव की वजह से मरे। इससे पहले 2023-24 में 148 जानवरों की मौत दर्ज की गई थी, जिनमें 37 की मौत सदमे और 32 की शॉक के कारण हुई थी चिड़ियाघर की रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2017 से 2025 के बीच 1,000 से अधिक वन्यजीवों की मौत हो चुकी है, जिनमें सदमा सबसे बड़ा कारण रहा है।
आखिर इनकी मौत का कारण क्या है?
शाकाहारी जानवरों और कुत्ते जैसी प्रजातियों में कैप्चर मायोपैथी और दर्दनाक सदमे से मौत के मामले ज्यादा सामने आए हैं। ‘मर्सी फॉर एनिमल’ की सदस्य शिवांगी का कहना है कि जानवरों की मौत के पीछे कई कारण हो सकते हैं, जैसे अत्यधिक गर्मी या सर्दी, ट्रैफिक का शोर, दर्शकों की छेड़छाड़ और कैद में बिताया गया जीवन। उनका कहना है कि कोई भी जानवर कैद में रहना नहीं चाहता और चिड़ियाघरों पर खर्च होने वाली राशि को प्राकृतिक आवास की सुरक्षा और जंगल में रहने वाले जानवरों की मदद पर खर्च किया जाना चाहिए।
विशेषज्ञ के अनुसार जानवरों का घर जंगल
डॉक्टरो के अनुसार, जानवरों का असली घर जंगल है। चिड़ियाघरों का बनावटी माहौल उनकी मानसिक स्थिति पर नकारात्मक असर डालता है, जिससे उदासी और तनाव बढ़ता है। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यदि चिड़ियाघरों में रहने की परिस्थितियों में सुधार नहीं किया गया, तो आने वाले समय में वन्यजीवों की मौत का आंकड़ा और बढ़ सकता है। वन्यजीव विशेषज्ञों का कहना है कि जंगल से अलग होकर चिड़ियाघरों में कैद रहना जानवरों के लिए गंभीर मानसिक और शारीरिक तनाव का कारण बनता है।
Written by: Falak Abdeen







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