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मध्य प्रदेश के ग्वालियर में स्थित राजमाता विजयाराजे सिंधिया कृषि विश्वविद्यालय ने खेती की दुनिया में एक बड़ी खोज करके दिखाया है। किसान अब बिना मिट्टी के भी हवा में आलू उगा सकेंगे। विश्वविद्यालय ने इसके लिए एरोपोनिक्स तकनीक का इस्तेमाल किया है, जिसमें पौधों को हवा में लटकाया जाता है और उनकी जड़ों पर सीधे पोषक तत्व दिए जाते हैं। इस तकनीक से खासकर 'लेडी रोसेटा' किस्म के आलू के बीज तैयार किए जा रहे हैं, जो अगले 2–3 साल में एमपी के किसानों के लिए उपलब्ध होंगे।
साइंस का कमाल हवा में उग रहे आलू
इस नई खोज ने पारंपरिक खेती के तरीके पूरी तरह बदल दिया है। एरोपोनिक्स एक ऐसी तकनीक है जिसमें पौधों को मिट्टी के बजाय हवा में लटकाया जाता है। वैज्ञानिकों ने इसके लिए खास थर्माकोल शीट का इस्तेमाल किया है, जिसमें छोटे-छोटे छेद कर आलू के पौधों को इस तरह लगाया जाता है कि उनकी पत्तियां ऊपर धूप की ओर रहें और जड़ें नीचे एक अंधेरे बॉक्स में लटकती रहें। इन लटकती जड़ों पर हर कुछ मिनट में कंप्यूटर नियंत्रित मशीनों से पानी और जरूरी पोषक तत्वों छिड़की जाती है। इससे पौधों को सीधा पोषण मिलता है,और मिट्टी न होने के कारण फंगल इंफेक्शन या मिट्टी से होने वाले रोगों का खतरा लगभग शून्य हो जाता है।
#WATCH | ग्वालियर, मध्य प्रदेश: राजमाता विजयाराजे सिंधिया एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी ने एरोपोनिक्स इकाई का इस्तेमाल करके हवा में आलू उगाने की तकनीक विकसित की है। (05.02) pic.twitter.com/u6IaMpzzei
— ANI_HindiNews (@AHindinews) February 6, 2026
कम लागत मे ज्यादा पैदावारी
यूनिवर्सिटी के कुलपति प्रो. अरविंद कुमार शुक्ला ने बताया कि यह तकनीक किसानों के लिए बेहद लाभकारी साबित होगी। सामान्य पद्धति से एक एकड़ में आलू की खेती के लिए लगभग 8 से 10 क्विंटल बीज की जरूरत होती है, जिससे करीब 100 क्विंटल पैदावार होती है। वहीं, एरोपोनिक्स तकनीक से तैयार बीज की गुणवत्ता इतनी बेहतरीन होती है कि केवल 1.20 क्विंटल बीज ही एक एकड़ के लिए पर्याप्त होता है। इसके बावजूद पैदावार सामान्य खेती की तुलना में दोगुनी से भी ज्यादा,यानी करीब 238 क्विंटल तक हो सकती है। यह किसानों के लिए कम संसाधन में अधिक उत्पादन का आदर्श मॉडल साबित होता है।
आलू की रानी ‘लेडी रोसेटा’, चिप्स वाले भी लाइन में
विश्वविद्यालय में इस तकनीक से मुख्य रूप से 'लेडी रोसेटा' प्रजाति के आलू के बीज तैयार कर रहा है। यह आलू दिखने में लाल और पूरी तरह गोल होता है| जो मशीनों से प्रोसेसिंग के लिए सबसे उपयुक्त माना जाता है। इसकी सबसे बड़ी खासियत इसमें मौजूद 'लो-शुगर' है। सामान्य आलू के चिप्स अक्सर तलते समय लाल या काले पड़ जाते हैं, जिससे उनकी क्वालिटी खराब लगती है, लेकिन लेडी रोसेटा आलू के चिप्स सुनहरे और क्रिस्पी बनते हैं। यही कारण है कि बड़ी चिप्स बनाने वाली कंपनियां सीधे किसानों के पास पहुंच रही हैं। अब तक मध्य प्रदेश के किसान इस लाभ से दूर थे, लेकिन अब वे भी गुजरात, बिहार और पंजाब के किसानों की तरह अपनी फसल सीधे बड़ी कंपनियों को बेच सकेंगे।
#WATCH | ग्वालियर, मध्य प्रदेश: जैव प्रौद्योगिकी विभाग में वैज्ञानिक डॉ. सुषमा तिवारी ने बताया, "हमने यहां पर टिशू कल्चर के जरिए लेडी रोसेटा का पौधा तैयार किया था। एरोपोनिक्स इकाई सीधे पौधे को ही रोपा जाता है... उसमें करीब 50 से 55 दिनों में ट्यूबराइजेशन शुरू हो गया। इसकी खासियत… https://t.co/C8Mofwx1Ji pic.twitter.com/AhuraWlpaL
— ANI_HindiNews (@AHindinews) February 6, 2026
टिश्यू कल्चर से तैयार हुआ सुपर आलू बीज
आलू को तैयार करने की प्रक्रिया लैब से शुरू होती है। सबसे पहले टिश्यू कल्चर और बायो-टेक्नोलॉजी की मदद से नर्सरी में पौधे तैयार किए जाते हैं। जब इन पौधों में जड़ें और पत्तियां पूरी तरह विकसित हो जाती हैं, तब उन्हें एरोपोनिक्स यूनिट में शिफ्ट किया जाता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि इस तकनीक से तैयार आलू न केवल रोग-मुक्त होते हैं, बल्कि उनके कंद भी एक समान आकार के होते हैं। इस विधि में पानी की बचत भी होती हैं, क्योंकि इसमें इस्तेमाल किया गया पानी दोबारा री-साइकिल होकर उपयोग में लाया जा सकता है। भविष्य में यह तकनीक उन इलाकों के लिए बेहद उपयोगी साबित होगी, जहां खेती योग्य जमीन कम है या मिट्टी की गुणवत्ता खराब हो चुकी है।
written by-Falak Abdeen







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