Mojtaba Khamenei: ईरान के सर्वोच्च नेता मोजतबा खामेनेई की सेहत और उनकी सार्वजनिक गैर-मौजूदगी को लेकर एक बार फिर अटकलें तेज हो गई हैं। विभिन्न मीडिया रिपोर्टों में उनकी स्थिति बेहद नाजुक होने का दावा किया गया है, हालांकि ईरानी सरकार की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है। मार्च 2026 में अपने पिता अयातुल्ला अली खामेनेई के निधन के बाद सर्वोच्च पद संभालने वाले मोजतबा सार्वजनिक मंचों से लगभग गायब रहे हैं, जिससे सत्ता के संभावित हस्तांतरण की चर्चाओं को बल मिला है।

अनुच्छेद 111 के तहत अंतरिम व्यवस्था
यदि मोजतबा खामेनेई अपने दायित्वों का निर्वहन करने में असमर्थ होते हैं या उनका निधन होता है, तो ईरान के संविधान के अनुच्छेद 111 के अनुसार निम्नलिखित कानूनी प्रक्रिया अपनाई जाएगी।
राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन, न्यायपालिका प्रमुख गुलाम-हुसैन मोहसेनी-एजेई और गार्जियन काउंसिल के एक प्रतिनिधि की सदस्यता वाली परिषद अस्थायी रूप से सर्वोच्च नेता की शक्तियां संभालेगी। 88 सदस्यीय 'विशेषज्ञों की सभा' जल्द से जल्द नए परमानेंट सुप्रीम लीडर का चुनाव करेगी। इसी निकाय ने मार्च 2026 में भी नेतृत्व चयन में मुख्य भूमिका निभाई थी।

उत्तराधिकार की दौड़ में शामिल प्रमुख चेहरे
धार्मिक और राजनीतिक हलकों में कई वरिष्ठ नामों को इस पद का प्रमुख दावेदार माना जा रहा है।
अयातुल्ला अलीरेजा अराफी: वरिष्ठ धर्मगुरु और धार्मिक शिक्षण संस्थानों के प्रमुख। पूर्व में अंतरिम नेतृत्व परिषद का हिस्सा रहने के कारण इन्हें सबसे आगे माना जा रहा है।
हाशेम हुसैनी बुशेहरी: कुम (Qom) के धार्मिक प्रतिष्ठान और विशेषज्ञों की सभा में गहरा प्रभाव रखने वाले वरिष्ठ नेता।
गुलाम-हुसैन मोहसेनी-एजेई: वर्तमान न्यायपालिका प्रमुख, जिन्हें सुरक्षा तंत्र और कट्टरपंथी सत्ता प्रतिष्ठान का मजबूत समर्थन हासिल है।
हसन खुमैनी: इस्लामिक गणराज्य के संस्थापक अयातुल्ला रुहोल्लाह खुमैनी के पोते। यद्यपि इनका नाम चर्चा में है, परंतु इनका विचार कट्टरपंथी गुटों से अलग माना जाता है।

IRGC का प्रभाव और सामूहिक नेतृत्व का विकल्प
संवैधानिक प्रक्रिया के अलावा, ईरान की शक्तिशाली इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) की भूमिका इस संक्रमण काल में अत्यंत महत्वपूर्ण होगी। सुरक्षा और अर्थव्यवस्था पर मजबूत पकड़ रखने वाली IRGC ऐसे किसी भी उत्तराधिकारी के पक्ष में खड़ी होगी जो सुरक्षा प्रतिष्ठान के अनुकूल हो। विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि यदि किसी एक नाम पर सहमति नहीं बनती है, तो ईरान अपनी पारंपरिक व्यवस्था में बदलाव करते हुए एक व्यक्ति के स्थान पर सामूहिक नेतृत्व का विकल्प भी चुन सकता है।

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Written by Shailesh Yadav