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आखिर क्यों कातिल बन रही हैं पत्नियां? एक्सपर्ट ने बताया हैरान करने वाला सच
पिछले कुछ समय में रिश्तों से जुड़ी कई ऐसी घटनाएं सामने आई हैं, जिन्होंने समाज को झकझोर कर रख दिया है। पति की हत्या, पार्टनर की हत्या या रिश्तों में तनाव के बाद आत्महत्या जैसे मामले लगातार सुर्खियों में हैं।
पिछले कुछ समय में रिश्तों से जुड़ी कई ऐसी घटनाएं सामने आई हैं, जिन्होंने समाज को झकझोर कर रख दिया है। पति की हत्या, पार्टनर की हत्या या रिश्तों में तनाव के बाद आत्महत्या जैसे मामले लगातार सुर्खियों में हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या वाकई पति-पत्नी या पार्टनर के बीच हिंसा के मामले बढ़ रहे हैं? अगर ऐसा है, तो इसके पीछे आखिर कौन सी वजहें जिम्मेदार हैं?
क्या यह सिर्फ पुरुषों के खिलाफ महिलाओं की हिंसा है?
सोशल मीडिया पर ऐसी घटनाओं के बाद अलग-अलग प्रतिक्रियाएं देखने को मिलती हैं। कुछ लोग इन्हें महिलाओं के बदलते सामाजिक स्वरूप से जोड़ते हैं, जबकि बड़ी संख्या में लोग ऐसी हिंसा की निंदा करते हैं। हालांकि, एक्सपर्ट्स की मानें तो इन घटनाओं को सिर्फ 'पुरुष बनाम महिला' के नजरिए से देखना सही नहीं होगा। क्योंकि
अपराध को जेंडर के बजाय,मानसिक-भावनात्मक समस्याओं के रूप में समझना जरूरी है। हर महिला जो अपने रिश्ते में हिंसा करती है, उसे सशक्त महिला का उदाहरण मानना भी गलत है और हर ऐसी घटना को महिला सशक्तिकरण से जोड़ना भी।
इमोशनल असंतुलन और कमजोर निर्णय क्षमता बड़ी वजह
वहीं पुराने मानसिक आघात, छोड़ दिए जाने का डर, भावनाओं पर नियंत्रण की कमी, कम भावनात्मक सहनशीलता और अवास्तविक उम्मीदें व्यक्ति को गंभीर परिस्थितियों में गलत फैसले लेने की ओर धकेल सकती हैं। जब इन समस्याओं के साथ विश्वासघात, अस्वीकृति, पारिवारिक दबाव या मनचाही जिंदगी न मिल पाने की निराशा जुड़ जाती है, तो कुछ मामलों में स्थिति हिंसक रूप ले सकती है। हालांकि, यह समझना जरूरी है कि मानसिक स्वास्थ्य समस्या होना अपने आप में हिंसा का कारण नहीं है। हिंसा के पीछे कई सामाजिक, व्यक्तिगत और परिस्थितिजन्य कारक एक साथ काम कर सकते हैं।
रिश्तों पर बढ़ रहा है दबाव
आज के दौर में कपल्स आर्थिक, सामाजिक और भावनात्मक दबावों से गुजर रहे हैं। करियर, परिवार, पैसों और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को लेकर मतभेद रिश्तों में तनाव बढ़ा सकते हैं। कई रिश्तों में धैर्य और संवाद की कमी भी समस्या को गंभीर बना देती है। इसके अलावा, कुछ लोगों में यह गलत धारणा भी विकसित हो सकती है कि वे अपने प्रभाव, पहचान या कानूनी जानकारी के कारण गंभीर परिणामों से बच जाएंगे।
सोशल मीडिया ने बढ़ाई अवास्तविक उम्मीदें
सोशल मीडिया ने रिश्तों को देखने का नजरिया भी बदला है। ऑनलाइन दिखाई देने वाले 'परफेक्ट कपल' और खुशहाल जिंदगी की तस्वीरें वास्तविक जीवन से अलग हो सकती हैं। लगातार दूसरों से तुलना करने की आदत रिश्ते को लेकर अवास्तविक उम्मीदें पैदा कर सकती है। बाहर से मजबूत दिखने वाले रिश्तों में भी अगर भावनात्मक जुड़ाव, भरोसा और संवाद कमजोर हो, तो तनाव धीरे-धीरे बढ़ सकता है।
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जेंडर नहीं, रिश्तों के संकट को समझना जरूरी
पति या पार्टनर की हत्या जैसी घटनाओं को किसी एक जेंडर के व्यवहार का प्रतिनिधि मानना सही नहीं है। ऐसे मामलों में अपराध की जिम्मेदारी तय होना जरूरी है, लेकिन साथ ही उन परिस्थितियों को समझना भी जरूरी है, जिनमें रिश्ता हिंसा तक पहुंचा। रिश्तों में बेहतर संवाद, भावनात्मक नियंत्रण, समय रहते मदद लेना और मानसिक स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता ऐसी परिस्थितियों को रोकने में अहम भूमिका निभा सकती है। सबसे जरूरी बात यह है कि हिंसा को किसी भी रूप में सही ठहराए बिना, उसके पीछे मौजूद व्यक्तिगत और सामाजिक कारणों को समझा जाए।
Written By: Geeta Sharma
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