भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने गगनयान मिशन से जुड़ी तैयारियों में एक और अहम सफलता हासिल की है। आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र में दूसरे इंटीग्रेटेड एयर ड्रॉप टेस्ट (IADT-02) को सफलतापूर्वक पूरा किया गया। इस उपलब्धि पर केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने भी सोशल मीडिया के माध्यम से वैज्ञानिकों को बधाई दी।
IADT-02 टेस्ट क्या है?
यह परीक्षण गगनयान मिशन की सुरक्षा व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि अंतरिक्ष से लौटते समय अंतरिक्ष यात्री जिस क्रू मॉड्यूल में होंगे, उसके पैराशूट सही समय और सही क्रम में खुलकर उसकी गति को सुरक्षित स्तर तक कम कर सकें। इस परीक्षण में लगभग 5 टन वजनी एक कृत्रिम क्रू मॉड्यूल को हेलिकॉप्टर की मदद से ऊँचाई पर ले जाकर नीचे गिराया जाता है। गिरने के दौरान उसमें लगे 10 पैराशूट एक निर्धारित क्रम में खुलते हैं, जिससे उसकी गति धीरे-धीरे कम हो जाती है और वह सुरक्षित रूप से समुद्र में उतर सकता है।
यह टेस्ट क्यों है जरूरी?
अंतरिक्ष से वापसी के दौरान कैप्सूल बेहद तेज गति से पृथ्वी की ओर आता है। यदि उसकी रफ्तार को नियंत्रित न किया जाए तो लैंडिंग के समय बड़ा नुकसान हो सकता है। पैराशूट सिस्टम इसी जोखिम को कम करने का काम करता है। IADT-02 ने यह साबित किया है कि पैराशूट प्रणाली सही तरीके से काम कर रही है और भविष्य में अंतरिक्ष यात्रियों की सुरक्षित वापसी सुनिश्चित की जा सकती है।
मानव मिशन की दिशा में बड़ा कदम
गगनयान भारत का पहला मानव अंतरिक्ष मिशन होगा, जिसके 2027 तक लॉन्च होने की उम्मीद है। इससे पहले इसरो कुछ बिना चालक वाले (अनमैन्ड) परीक्षण मिशन भी भेजेगा, जिनमें पहला मिशन जल्द ही लॉन्च किया जा सकता है।
इस मिशन के तहत तीन अंतरिक्ष यात्रियों को लगभग 400 किलोमीटर की पृथ्वी की कक्षा में तीन दिनों तक भेजा जाएगा, जिसके बाद उन्हें सुरक्षित रूप से समुद्र में वापस उतारा जाएगा।
चुनौतियों के बावजूद आगे बढ़ता मिशन
तकनीकी रूप से जटिल होने के कारण गगनयान परियोजना में कई बार देरी हुई है, लेकिन इसरो लगातार अपने परीक्षणों को सफलतापूर्वक आगे बढ़ा रहा है। सरकार ने इस परियोजना के लिए लगभग 10,000 करोड़ रुपये का बजट निर्धारित किया है।
अंतरिक्ष यात्रियों की ट्रेनिंग
इस मिशन के लिए चुने गए अंतरिक्ष यात्रियों को कठिन परिस्थितियों के लिए विशेष प्रशिक्षण दिया जा रहा है। हाल ही में लद्दाख के लेह क्षेत्र में कम ऑक्सीजन और अत्यधिक ठंड जैसे वातावरण में उनकी क्षमता और सहनशक्ति की जांच की गई।
पूरी तरह स्वदेशी तकनीक
गगनयान मिशन की खास बात यह है कि इसकी लगभग सभी तकनीकें भारत में ही विकसित की गई हैं। पैराशूट सिस्टम से लेकर जीवन समर्थन प्रणाली तक, सब कुछ देश में ही तैयार किया गया है।
भारत की बढ़ती अंतरिक्ष क्षमता
इस सफल परीक्षण के साथ भारत उन चुनिंदा देशों की सूची में और मजबूत हो गया है जिनके पास मानव अंतरिक्ष उड़ान की तकनीक है। यह उपलब्धि न केवल इसरो की वैज्ञानिक क्षमता को दर्शाती है, बल्कि भारत की आत्मनिर्भरता की दिशा में भी एक बड़ा कदम है।
Written By Toshi Shah