यूपी में चरम पर महिला अपराध, फिर भी महिला सशक्तिकरण का दावा! कब तक अपनी पीठ थपथपाएगी CM योगी सरकार?
uttar pradesh : यूपी में महिला सुरक्षा के दावे हवा हवाई होते कई ऐसे मामले सामने आए हैं जिन्होंने कानून की भी धज्जियां उड़ा दी। जमनी स्तर पर सीएम योगी आदित्यनाथ महिला सशक्तिकरण, विकास और कानून व्यवस्था पर जोर देने की बानगी करते नहीं थकते लेकिन अपराधी भी इस समय बेलगाम हैं और यह हम नहीं कह रहे बल्कि NCRB की रिपोर्ट भी बयां करती हैं।
सीएम ने की काम की तारीफ
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने X पर एक पोस्ट में महिला सशक्तिकरण, आर्थिक विकास, रोजगार सृजन और अवसंरचना विकास में राज्य की प्रगति पर प्रकाश डाला और दावा किया कि भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार के तहत 2017 से राज्य में महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए हैं।
लेकिन यूपी में महिलाओं और छोटी बच्चियों के साथ होने वाले जघन्य अपराधों के आंकड़ों की हकीकत कुछ और ही हालात बयां करती है। सरकार प्रदेश में महिला सशक्तिकरण को लेकर सरकार लगातार अपनी उपलब्धियां गिनाती है। महिलाओं और छोटी बच्चियों के खिलाफ होने वाले अपराधों के आंकड़े गंभीर सवाल खड़ा करते हैं। महिला सुरक्षा के दावों और जमीनी
हकीकत के बीच कितना अंतर है?
क्या केवल योजनाओं और उपलब्धियों का प्रचार करने से महिलाओं को सुरक्षित माहौल मिल सकता है, या फिर अपराधों पर प्रभावी रोकथाम और दोषियों को त्वरित सजा दिलाने के लिए और ठोस कदम उठाने की जरूरत है? इन सवालों के बीच सरकार की जवाबदेही और महिला सुरक्षा के लिए उठाए जा रहे कदमों की पड़ताल जरूरी हो जाती है।
सीएम के दावों में कितनी सच्चाई?
नवरात्रि के दौरान मां सिद्धिदात्री का आशीर्वाद प्राप्त करने के अवसर पर सीएम ने कहा कि महिलाएं अपनी क्षमताओं, दृढ़ संकल्प और आत्मविश्वास के माध्यम से राज्य के विकास में निर्णायक भूमिका निभाती हैं। उन्होंने यह भी कहा कि, सभी उपलब्धियों, समृद्धि और इच्छाओं को पूरा करने वाली मां सिद्धिदात्री के आशीर्वाद से प्रदेश की महिलाएं अपनी क्षमता, संकल्प और आत्मविश्वास के बल पर राज्य की प्रगति और समृद्धि में निर्णायक भूमिका निभा रही हैं। लेकिन सीएम योगी की इन बातों में कितनी सच्चाई है?
महिलाओं का सम्मान जरूरी
संस्कृत श्लोक "यत्र नरयस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः" का हवाला देते हुए उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि सुख, समृद्धि और कल्याण के लिए महिलाओं का सम्मान करना आवश्यक है।
सीएम ने 2017 से पहले की राज्य की स्थिति की तुलना वर्तमान सरकार के तहत हुए बदलावों से करते हुए आरोप लगाया कि पहले दंगे, अराजकता और आपराधिक गतिविधियों ने सार्वजनिक जीवन और महिलाओं की सुरक्षा को प्रभावित किया था।
2017 के बादली यूपी की तस्वीर
सीएम का कहना है कि साल 2017 के बाद माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के मार्गदर्शन में राज्य की दो इंजन वाली सरकार ने कानून के शासन के साथ-साथ अपराध और अपराधियों के प्रति शून्य-सहिष्णुता नीति स्थापित की है, जिससे राज्य अशांति से ग्रस्त राज्य से उत्सवों के राज्य में बदल गया है।
सीएम के इन दावों की पोल उस समय खुल जाती है जब प्रदेश के पुलिस महकमे में ही तैनात कुछ वर्दीधारी ही महिलाओं की असमत को दागदार करते हैं? इस परिस्थिति में जनता का सीएम से सीधा एक ही सवाल होता है जब रक्षक ही भक्षक बन जाए तो आम जनता सुरक्षा के लिए किसके पास जाए?
आज भी कई जिलों में डरती हैं महिलाएं
प्रदेश में आज भी कई ऐसे जिले हैं जहां की गलियों, चौक-चौराहो तक पर निकलते समय। महिलाएं 10 बार सोचती हैं। आखिरकार, महिला सुरक्षा किसी सरकार की छवि का नहीं, बल्कि समाज के हर नागरिक के अधिकार और सम्मान का सवाल है। सरकार के दावों की असली परीक्षा यही है कि वे जमीन पर महिलाओं और बच्चियों की जिंदगी में कितनी वास्तविक सुरक्षा और भरोसा पैदा कर पाते हैं।
क्या कहती है NCRB की रिपोर्ट
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की Crime in India 2023 रिपोर्ट में महिलाओं और बच्चों के खिलाफ दर्ज अपराधों का राज्यवार और अपराध की श्रेणी के अनुसार विवरण शामिल है। दिसंबर 2025 में संसद में दिए गए गृह मंत्रालय के जवाब के अनुसार, NCRB की उस समय तक प्रकाशित नवीनतम रिपोर्ट वर्ष 2023 की थी।
इन आंकड़ों के आधार पर महिला सुरक्षा, बाल संरक्षण और अपराधों की रोकथाम के लिए उठाए जा रहे कदमों की समीक्षा जरूरी है। हालांकि, दर्ज मामलों की संख्या को सीधे अपराधों की वास्तविक कुल संख्या नहीं माना जा सकता।
कई घटनाएं रिपोर्ट नहीं होतीं, जबकि जागरूकता बढ़ने और शिकायत दर्ज कराने की प्रक्रिया आसान होने से भी दर्ज मामलों में इजाफा हो सकता है। इसलिए अपराधों की संख्या के साथ अपराध दर, जांच की स्थिति, आरोपपत्र दाखिल होने और दोषसिद्धि जैसे पहलुओं को देखना भी जरूरी है।
बच्चियों से होने वाले अपराध बने सिर का दर्द
उत्तर प्रदेश में बच्चियों से यौन अपराध, अपहरण और शोषण जैसी घटनाएं यूपी सरकार और पुलिस प्रशासन दोनों के आगे गंभीर चुनौती बनीं हुई हैं। ऐसे मामलों में केवल प्राथमिकी दर्ज करना ही पर्याप्त नहीं है। पीड़ित बच्ची को सुरक्षित माहौल, संवेदनशील पुलिस जांच, चिकित्सकीय सहायता, कानूनी सहयोग और समय पर न्याय मिलना भी उतना ही जरूरी है।
बच्चियों के लिए हो बेहतर सुरक्षा
POCSO कानून बच्चों को यौन अपराधों से सुरक्षा देने के लिए बनाया गया है। इसके लागू करने के लिए पुलिस, बाल कल्याण समितियों, अभियोजन पक्ष और अदालतों के बीच बेहतर समन्वय की जरूरत है। साथ ही, स्कूलों और परिवारों में बच्चों को सुरक्षित-असुरक्षित व्यवहार की पहचान और मदद मांगने के तरीकों के बारे में जागरूक करना भी महत्वपूर्ण है।
आखिर कब महिला सुरक्षा पर होगा काम?
सीएम सरकार की विकास के प्रति प्रतिबद्धता को दोहराते हुए कहते हैं, प्रशासन सशक्त महिलाएं, समृद्ध उत्तर प्रदेश और एक विकसित भारत के साथ-साथ एक विकसित उत्तर प्रदेश के दृष्टिकोण की दिशा में काम कर रहा है। ऐसे में सवाल यही है कि सरकार महिलाओं की सुरक्षा के लिए कुछ कार्य करेगी भी या महज हवा में ही तीर छोड़े जाएंगे?
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