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यूपी में हर तीसरा विधायक दलबदलू! 2027 से पहले टिकट कटने का डर, किस पार्टी में कितने नेताओं ने बदला पाला?

Shailesh Yadav · 20 अक्टूबर 2026
यूपी में हर तीसरा विधायक दलबदलू!

UP Politics 2027: उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर सियासी सरगर्मी तेज होने लगी है। टिकट की दावेदारी से लेकर राजनीतिक समीकरण साधने तक, नेताओं ने अपनी रणनीति बनानी शुरू कर दी है। चुनाव से पहले एक बार फिर दल-बदल की राजनीति चर्चा में है। किसी को टिकट कटने का डर है, तो कोई सत्ता की संभावनाओं को देखते हुए नए राजनीतिक ठिकाने की तलाश कर सकता है। ऐसे में मौजूदा विधायकों के राजनीतिक सफर पर नजर डालें, तो कई चौंकाने वाले आंकड़े सामने आते हैं।

दिए गए आंकड़ों के मुताबिक, उत्तर प्रदेश विधानसभा के 399 मौजूदा विधायकों में से 122 विधायक अपने राजनीतिक करियर में कम से कम एक बार पार्टी बदल चुके हैं। यानी करीब हर तीसरा विधायक दलबदल की राजनीति से गुजर चुका है। हालांकि, यह आंकड़ा विधायकों के पूरे राजनीतिक करियर से जुड़ा है, न कि केवल मौजूदा विधानसभा में पार्टी बदलने वालों की संख्या से।

किस पार्टी में कितने दलबदलू विधायक?
उत्तर प्रदेश की राजनीति में भारतीय जनता पार्टी और समाजवादी पार्टी समेत कई दलों ने दूसरी पार्टियों से आए नेताओं को जगह दी है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, भाजपा में दूसरे दलों से आए विधायकों की संख्या सबसे ज्यादा बताई गई है।

भारतीय जनता पार्टी (BJP): 78 विधायक दूसरे दलों से आ चुके हैं।
समाजवादी पार्टी (SP): 29 विधायक पहले किसी अन्य दल से जुड़े रहे हैं।
निषाद पार्टी: करीब 80 फीसदी विधायकों की राजनीतिक पृष्ठभूमि दूसरे दलों से जुड़ी बताई गई है।
सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (SBSP): लगभग 50 फीसदी विधायक दलबदल की राजनीति से जुड़े हैं।
राष्ट्रीय लोकदल (RLD): करीब 33 फीसदी विधायक दूसरी पार्टियों से आए हैं।
अपना दल (सोनेलाल): लगभग 31 फीसदी विधायकों ने अपने राजनीतिक सफर में दल बदला है।

इन आंकड़ों को समझते समय यह ध्यान रखना जरूरी है कि किसी नेता का पहले दूसरी पार्टी में होना और मौजूदा विधानसभा में दलबदल करना दो अलग बातें हैं। आंकड़ों की आधिकारिक पुष्टि और उनकी गणना का आधार भी महत्वपूर्ण है।

टिकट कटने का डर या सत्ता की चाहत, क्यों बदलते हैं नेता पार्टी?
चुनाव से पहले टिकट को लेकर राजनीतिक दलों में खींचतान आम है। जिन विधायकों को अपनी पार्टी से दोबारा टिकट मिलने की उम्मीद कम होती है, वे दूसरे दलों में संभावनाएं तलाश सकते हैं। इसके अलावा जातीय समीकरण, क्षेत्र में प्रभाव, चुनाव जीतने की संभावना और सत्ता में भागीदारी भी दल बदलने के प्रमुख कारणों में शामिल हैं।

2027 के चुनाव से पहले अगर मौजूदा विधायकों के टिकट कटते हैं, तो अलग-अलग दलों में असंतोष बढ़ सकता है। ऐसे में कुछ नेता बगावत कर निर्दलीय चुनाव लड़ सकते हैं, जबकि कुछ दूसरे दलों का रुख कर सकते हैं। हालांकि, अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि कितने विधायक वास्तव में पार्टी बदलेंगे।

बसपा को लगा सबसे बड़ा झटका?
उत्तर प्रदेश में पिछले डेढ़ दशक के दौरान बहुजन समाज पार्टी को कई नेताओं के पार्टी छोड़ने का सामना करना पड़ा है। 2017 के विधानसभा चुनाव के बाद बसपा के कई विधायक दूसरे दलों में चले गए। 2022 के चुनाव में पार्टी का प्रदर्शन और कमजोर हुआ और उसे केवल एक विधानसभा सीट मिली।

बाद में बसपा के एकमात्र विधायक उमाशंकर सिंह का निधन हो गया। इसके बाद विधानसभा में बसपा का प्रतिनिधित्व समाप्त हो गया। यह घटनाक्रम पार्टी के सामने खड़ी राजनीतिक चुनौतियों को दिखाता है। बसपा से दूसरे दलों में जाने वाले नेताओं में कई ऐसे नाम रहे, जिन्होंने बाद में भाजपा या समाजवादी पार्टी में राजनीतिक भूमिका हासिल की। इससे पार्टी के संगठन और चुनावी आधार पर असर पड़ने की चर्चा भी होती रही है।

मंत्री भी बदल चुके हैं राजनीतिक दल
उत्तर प्रदेश की राजनीति में दल बदलने का सिलसिला केवल विधायकों तक सीमित नहीं रहा। कई नेता अलग-अलग पार्टियों में रहने के बाद मंत्री पद तक पहुंचे हैं।
नंद गोपाल गुप्ता नंदी: बसपा से राजनीतिक सफर शुरू किया, बाद में कांग्रेस से जुड़े और फिर भाजपा में शामिल हुए।
नितिन अग्रवाल: समाजवादी पार्टी से जुड़े रहे और बाद में भाजपा के साथ आ गए।
दारा सिंह चौहान: बसपा, सपा और भाजपा समेत अलग-अलग दलों में रहे।
दिनेश प्रताप सिंह: कांग्रेस से भाजपा में आए।
के.पी. मलिक: राष्ट्रीय लोकदल से भाजपा में गए।
अनिल कुमार: बसपा से राष्ट्रीय लोकदल में शामिल हुए।

इन नेताओं के राजनीतिक सफर से साफ है कि यूपी में पार्टी बदलना कई बार नेताओं की चुनावी रणनीति का हिस्सा रहा है। हालांकि, हर नेता के दल बदलने की वजह अलग हो सकती है।

दारा सिंह चौहान ने कई बार बदला राजनीतिक ठिकाना
दारा सिंह चौहान उत्तर प्रदेश के उन नेताओं में गिने जाते हैं, जिनका राजनीतिक सफर कई दलों से होकर गुजरा है। उन्होंने 1996 में बहुजन समाज पार्टी से राजनीति शुरू की और राज्यसभा पहुंचे। बाद में वह समाजवादी पार्टी में गए और फिर बसपा में लौटे।

2009 में लोकसभा चुनाव जीतने के बाद उन्होंने 2015 में भाजपा का रुख किया। 2017 में भाजपा के टिकट पर विधायक बने और मंत्री पद भी संभाला। 2022 के विधानसभा चुनाव से पहले वह भाजपा छोड़कर समाजवादी पार्टी में शामिल हुए और चुनाव जीते। 2023 में उन्होंने सपा से इस्तीफा देकर फिर भाजपा में वापसी कर ली।

उनका राजनीतिक सफर दिखाता है कि यूपी में नेताओं के लिए पार्टी बदलने के फैसले अक्सर चुनावी समीकरणों और राजनीतिक संभावनाओं से जुड़े होते हैं।

नंद गोपाल गुप्ता नंदी का सियासी सफर
नंद गोपाल गुप्ता नंदी ने 2007 के विधानसभा चुनाव में बसपा के टिकट पर प्रयागराज दक्षिण सीट से जीत हासिल की थी। मायावती सरकार में वह मंत्री बने। 2012 में बसपा से चुनाव हारने के बाद उन्होंने कांग्रेस का दामन थामा। 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने उन्हें प्रयागराज से उम्मीदवार बनाया। इसके बाद 2017 के विधानसभा चुनाव से पहले नंदी भाजपा में शामिल हो गए। वह प्रयागराज दक्षिण सीट से भाजपा के विधायक बने और योगी सरकार में मंत्री पद संभाला। उनका सफर भी उत्तर प्रदेश की बदलती राजनीतिक परिस्थितियों का उदाहरण है।

2024 के लोकसभा चुनाव में सपा को मिला दूसरी पार्टियों से आए नेताओं का साथ
2024 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने उत्तर प्रदेश में 37 सीटें जीतकर शानदार प्रदर्शन किया। चुनाव से पहले दूसरी पार्टियों से आए कई नेताओं को सपा ने उम्मीदवार बनाया। उपलब्ध आंकड़ों में सपा के 37 विजयी सांसदों में से 19 के पहले दूसरे दलों से जुड़े रहने का दावा किया गया है। हालांकि, यह स्पष्ट करना जरूरी है कि किसी सांसद का पहले दूसरी पार्टी में होना और चुनाव से ठीक पहले दल बदलना एक जैसी श्रेणियां नहीं हैं। इन आंकड़ों की पुष्टि के लिए प्रत्येक सांसद के राजनीतिक इतिहास और पार्टी बदलने की तारीखों की जांच जरूरी है।

2027 में दलों के सामने होगी बड़ी चुनौती
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 में अभी समय है, लेकिन टिकट वितरण और चुनावी समीकरणों को लेकर राजनीतिक गतिविधियां तेज हो सकती हैं। भाजपा, सपा, बसपा, कांग्रेस और क्षेत्रीय दलों के सामने अपने संगठन को मजबूत रखने और असंतुष्ट नेताओं को संभालने की चुनौती होगी।

अगर टिकट वितरण के दौरान बड़े पैमाने पर नाराजगी सामने आती है, तो दल-बदल का मुद्दा फिर सुर्खियों में आ सकता है। ऐसे में सवाल सिर्फ यह नहीं होगा कि कौन नेता पार्टी बदलता है, बल्कि यह भी होगा कि उसके साथ कितना जनाधार जाता है और उसका असर चुनावी नतीजों पर कितना पड़ता है। यूपी की राजनीति में 2027 का चुनाव दलों के साथ-साथ उन नेताओं के लिए भी बड़ी परीक्षा होगा, जो अपनी सीट बचाने या नए राजनीतिक ठिकाने की तलाश में हैं। 

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