यूपी में SC-ST आरक्षित सीटों के रोटेशन पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, याचिका खारिज; कहा- संसद में उठाएं आवाज
Delhi News: उत्तर प्रदेश में अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षित विधानसभा सीटों को रोटेशन यानी समय-समय पर बदलने की मांग पर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। बुधवार को शीर्ष अदालत ने इस संबंध में दाखिल याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि यह मुद्दा विरोध और राजनीतिक बहस का विषय हो सकता है, लेकिन इसका समाधान न्यायपालिका के बजाय संसद और विधायिका के स्तर पर तलाशा जाना चाहिए।
मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता को संसद और जनप्रतिनिधियों के सामने अपनी मांग उठाने की सलाह दी। पीठ में जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहन भी शामिल थे।
गलत जगह अपनी मांग उठा रहे हैं आप
सुनवाई के दौरान CJI सूर्यकांत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि यह विरोध-प्रदर्शन का अच्छा समय है। यह भी विरोध का एक अच्छा मुद्दा हो सकता है। उन्होंने याचिकाकर्ता से कहा कि वह जनप्रतिनिधियों से संपर्क करें और आरक्षित सीटों के रोटेशन को लेकर संसद में कानून की समीक्षा की मांग उठाएं।
बता दें कि CJI ने कहा कि आप गलत नंबर मिला रहे हैं। अपनी आवाज उठाइए। यह सही समय है कि विधायिका और संसद इस मुद्दे पर दोबारा विचार करें।
करीब 60 साल से आरक्षित है यूपी की यह सीट
यह याचिका सुल्तानपुर जिले की कादीपुर विधानसभा सीट के मतदाता जगदीश सिंह ने दाखिल की थी। उनका कहना था कि कादीपुर सीट करीब छह दशक से अनुसूचित जाति के उम्मीदवारों के लिए आरक्षित है। याचिकाकर्ता ने सवाल उठाया कि आखिर एक ही विधानसभा सीट लंबे समय तक आरक्षित क्यों बनी रहती है और इसमें रोटेशन की व्यवस्था क्यों नहीं है?
उनका तर्क था कि इस व्यवस्था के कारण सामान्य वर्ग के मतदाताओं के पास उम्मीदवारों के चयन के सीमित विकल्प रह जाते हैं। उन्होंने परिसीमन अधिनियम, 2002 की धारा 9(1)(c) को भी चुनौती दी थी, जिसके तहत SC/ST आबादी का अनुपात अधिक होने वाले क्षेत्रों में आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों की पहचान की जाती है।
पंचायत चुनाव की तरह विधानसभा सीटों पर भी रोटेशन की मांग
याचिकाकर्ता ने दलील दी कि पंचायत और नगर निकाय चुनावों में आरक्षित सीटों के रोटेशन का प्रावधान है, लेकिन विधानसभा सीटों के मामले में ऐसी व्यवस्था नहीं है। इसके चलते कुछ निर्वाचन क्षेत्र पीढ़ियों तक आरक्षित बने रहते हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि लंबे समय तक एक ही सीट आरक्षित रहने से कुछ राजनीतिक परिवारों का दबदबा कायम हो सकता है और SC/ST समुदायों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को मजबूत करने का मूल उद्देश्य प्रभावित हो सकता है।
हाईकोर्ट से भी नहीं मिली थी राहत
इससे पहले याचिकाकर्ता ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। हाईकोर्ट ने जून 2026 में उनकी याचिका खारिज कर दी थी। अदालत ने कहा था कि संविधान के अनुच्छेद 330 और 332 में लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में SC/ST समुदायों के लिए उनकी आबादी के अनुपात में सीटें आरक्षित करने का प्रावधान है, लेकिन इनमें आरक्षित सीटों को अनिवार्य रूप से बदलने यानी रोटेशन का निर्देश नहीं दिया गया है।
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया था कि रोटेशन की व्यवस्था लागू करना संसद के विधायी अधिकार क्षेत्र का विषय है।
सुप्रीम कोर्ट ने क्यों खारिज की याचिका?
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि किसी निर्वाचन क्षेत्र का लंबे समय तक आरक्षित बने रहना अपने आप में संविधान का उल्लंघन नहीं है। जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने कहा कि इस व्यवस्था से समाज में जातिगत विभाजन की भावना पैदा होगी या नहीं और यह न्यायसंगत है या नहीं, इन सवालों पर फैसला लेना विधायिका का काम है।
पीठ ने यह भी सवाल उठाया कि जब संविधान और कानून में रोटेशन का स्पष्ट प्रावधान नहीं है, तो अदालत किस आधार पर परिसीमन आयोग को समय-समय पर आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों को बदलने का निर्देश दे सकती है।
संसद के पास उठानी होगी रोटेशन की मांग
सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए याचिका खारिज कर दी। हालांकि, याचिकाकर्ता को यह छूट दी कि वह अपने क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों से संपर्क कर इस मुद्दे पर समर्थन जुटा सकते हैं और संसद में कानून में बदलाव की मांग उठा सकते हैं।
इस फैसले के बाद उत्तर प्रदेश में लंबे समय से आरक्षित विधानसभा सीटों के रोटेशन का मुद्दा एक बार फिर राजनीतिक और विधायी बहस के केंद्र में आ सकता है।
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