एक बैंक के डूबने से गिर गई पैराग्वे की सरकार, पेना हुए नजरबंद; जानिए क्या है पूरा मामला
दक्षिण अमेरिकी देश पैराग्वे में एक बैंक के डूबने का मामला अब सिर्फ आर्थिक संकट तक सीमित नहीं रहा है। इसने देश की पूरी राजनीति को हिलाकर रख दिया है। डिजिटल बैंक यूएनो (Ueno Bank) के संकट के बाद राष्ट्रपति सैंटियागो पेना को सत्ता गंवानी पड़ी। संसद ने महाभियोग के जरिए उन्हें पद से हटा दिया और कुछ ही मिनटों बाद पुलिस ने उन्हें उनके घर में नजरबंद कर दिया।
इस पूरे घटनाक्रम ने दुनिया का ध्यान इसलिए खींचा है, क्योंकि एक निजी बैंक की नाकामी ने न सिर्फ लाखों लोगों की जमा पूंजी को संकट में डाल दिया, बल्कि देश के सर्वोच्च राजनीतिक पद को भी हिला दिया। राष्ट्रपति की अपनी पार्टी के सांसदों ने भी उनके खिलाफ मतदान किया।
कैसे एक बैंक ने राष्ट्रपति की कुर्सी तक हिला दी?
पैराग्वे का यूएनो बैंक तेजी से लोकप्रिय हुआ था। डिजिटल बैंकिंग के जरिए इसने बड़ी संख्या में ग्राहकों को जोड़ा और देश के प्रमुख बैंकों में अपनी जगह बना ली। लेकिन 3 नवंबर को केंद्रीय बैंक ने वित्तीय हालत बिगड़ने के बाद इसे अपने नियंत्रण में ले लिया। इस फैसले के बाद करीब 29 लाख ग्राहकों की जमा रकम तक पहुंच प्रभावित हुई। इनमें आम नागरिकों के अलावा पेंशन से जुड़े लोग भी शामिल हैं। बैंक में सरकारी संस्थाओं और पेंशन फंड का भी बड़ा पैसा जमा था।
बैंक की हालत बिगड़ने के बाद लोगों का गुस्सा सड़कों पर दिखाई देने लगा। राजधानी असुनसियोन समेत कई इलाकों में प्रदर्शन शुरू हो गए। लोग अपनी मेहनत की कमाई वापस मांग रहे थे।
राष्ट्रपति पर लगे गंभीर आरोप
इस पूरे मामले में राष्ट्रपति सैंटियागो पेना की भूमिका भी सवालों के घेरे में आ गई। आरोप है कि उन्होंने अपने राजनीतिक प्रभाव का इस्तेमाल करके सरकारी संस्थाओं का पैसा यूएनो बैंक तक पहुंचाने में मदद की। महाभियोग की कार्यवाही में यह भी कहा गया कि सरकारी पेंशन फंड ने बैंक में लगभग 355 मिलियन डॉलर जमा किए थे। आरोप है कि यह रकम निर्धारित कानूनी सीमा से अधिक थी।
इसके अलावा राष्ट्रपति पर हितों के टकराव, बैंक के लिए नियामक संस्थाओं पर दबाव बनाने और वित्तीय गड़बड़ियों से जुड़े तथ्यों को छिपाने जैसे आरोप लगाए गए। गौर करने वाली बात यह है कि पेना का पहले यूएनो बैंक की मालिक कंपनी से कारोबारी जुड़ाव रहा था। हालांकि, उन्होंने 2025 में अपनी हिस्सेदारी बेच दी थी। पेना ने अपने ऊपर लगे आरोपों को खारिज किया है।
इस्तीफे के बजाय महाभियोग से हटाया गया राष्ट्रपति
राजनीतिक संकट बढ़ने के बीच पेना ने गुरुवार को पद छोड़ने की पेशकश की थी। लेकिन संसद ने उनके इस्तीफे को स्वीकार करने के बजाय महाभियोग की प्रक्रिया आगे बढ़ाई। शुक्रवार को सीनेट में मौजूद 45 सदस्यों में से 44 ने उन्हें पद से हटाने के पक्ष में मतदान किया। इसके बाद उन्हें राष्ट्रपति पद से हटाने के साथ पूर्व राष्ट्रपतियों को मिलने वाली आजीवन सीनेट सदस्यता और कानूनी छूट भी गंवानी पड़ी।
इसके तुरंत बाद अभियोजन पक्ष के आदेश पर उन्हें घर में नजरबंद कर दिया गया। अब उनके खिलाफ कथित विश्वासघात, प्रभाव के दुरुपयोग और सरकारी धन से जुड़े मामलों की जांच की जा रही है। उपराष्ट्रपति पेद्रो अलियाना ने नए राष्ट्रपति के रूप में शपथ ली है। वह अगस्त 2028 तक देश की कमान संभालेंगे। उन्होंने प्रभावित लोगों को उनका पैसा वापस दिलाने का भरोसा दिया है।
दुनिया पर क्या पड़ेगा इस संकट का असर?
पैराग्वे की यह घटना भले ही एक छोटे दक्षिण अमेरिकी देश से जुड़ी हो, लेकिन इसके असर को वैश्विक बैंकिंग व्यवस्था के नजरिए से देखना जरूरी है।
डिजिटल बैंकों पर बढ़ेगी निगरानी
दुनियाभर में डिजिटल बैंकिंग का चलन तेजी से बढ़ रहा है। लोग मोबाइल ऐप के जरिए खाते खोल रहे हैं और अपनी बचत जमा कर रहे हैं। यूएनो बैंक का मामला बताता है कि तेजी से ग्राहक जोड़ना किसी बैंक की मजबूत वित्तीय स्थिति की गारंटी नहीं है। इस घटना के बाद दूसरे देशों के नियामक भी डिजिटल बैंकों की पूंजी, कर्ज और जोखिम प्रबंधन की जांच पर ज्यादा ध्यान दे सकते हैं।
आम लोगों का बैंकिंग सिस्टम से डगमगा सकता है भरोसा
जब किसी बैंक में लाखों लोगों की बचत फंस जाती है, तो इसका असर सिर्फ उसी बैंक के ग्राहकों तक सीमित नहीं रहता। दूसरे बैंकों के ग्राहक भी अपनी जमा रकम की सुरक्षा को लेकर सवाल उठाने लगते हैं। अगर ऐसा डर कई संस्थानों तक फैलता है, तो लोग बैंक से पैसा निकालने लग सकते हैं। इससे बैंकिंग सिस्टम पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।
सरकारी पैसे और पेंशन फंड के निवेश पर उठेंगे सवाल
इस मामले में सरकारी पेंशन फंड की बड़ी रकम बैंक में जमा होने के आरोप ने एक अहम सवाल खड़ा किया है। क्या सरकारें और सार्वजनिक संस्थाएं आम लोगों की बचत और पेंशन का पैसा पर्याप्त जांच के बिना किसी निजी बैंक में लगा सकती हैं? यह मुद्दा दुनिया के दूसरे देशों में भी सरकारी निवेश की पारदर्शिता और जवाबदेही पर बहस तेज कर सकता है।
विदेशी निवेशकों के भरोसे को लग सकता है झटका
किसी देश में बैंकिंग संकट के साथ राजनीतिक अस्थिरता पैदा होने पर विदेशी निवेशक सतर्क हो जाते हैं। उन्हें डर रहता है कि भविष्य में सरकारी नीतियों, वित्तीय नियमों और निवेश की सुरक्षा को लेकर अनिश्चितता बढ़ सकती है। इससे पैराग्वे में नए निवेश और कारोबारी गतिविधियों पर दबाव पड़ सकता है।
पड़ोसी देशों तक पहुंच सकता है आर्थिक असर
यूएनो बैंक से जुड़ा कारोबारी समूह दूसरे व्यवसायों से भी जुड़ा है। इस संकट के कारण अर्जेंटीना में आईटीटीआई कंपनी के करीब एक हजार कर्मचारियों को 30 दिनों के लिए काम से रोकने की खबर भी सामने आई है। इससे पता चलता है कि किसी एक देश का बैंकिंग संकट दूसरे देश के कारोबार और रोजगार को भी प्रभावित कर सकता है।
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