Nagchandreshwar mandir: नागपंचमी पर साल में सिर्फ एक बार खुलता है ये रहस्यमयी मंदिर, पूरी होती हैं मनोकामनाएं!
MadhyaPradesh: मध्य प्रदेश के उज्जैन में स्थित बाबा महाकाल के धाम में तीसरी मंजिल पर स्थित भगवान नागचंद्रेश्वर मंदिर के कपाट आज यानी 17 अगस्त की मध्यरात्री 12 बजे एक खोल दिए गए हैं. यह दुर्लभ मंदिर साल में केवल 24 घंटे यानी एक दिन के लिए खुलता है. 18 अगस्त 2026 की रात 12:00 बजे इसके कपाट फिर से बंद कर दिए जाएंगे. नाग पंचमी पर जहां महाकालेश्वर मंदिर परिसर में भक्तों का तांता लगा रहता है. तो वहीं भगवान नागचंद्रेश्वर के दर्शन कर दिव्य कृपा पाने के लिए अलग ही उत्साह देखने को मिलता है.
नागचंद्रेश्वर की तपस्या से खुश हुए थे भोलेबाबा
उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर के तीसरी मंजिल पर स्थित नागचंद्रेश्वर मंदिर साल में महज एक बार नाग पंचमी वाले दिन ही खुलता है. मध्यरात्री को खुलने वाले नागचंद्रेश्वर मंदिर के दुर्लभ दर्शन के लिए भक्त सालभर इंतजार करते है. केवल 1 दिन 24 घंटे के लिए खुलने वाले इस नागचंद्रेश्वर मंदिर से जुड़ी प्राचीन कथा भी है जो नागराज तक्षक की तपस्या से जुड़ी है. मंदिर को लेकर मान्यता है भोले बाबा को प्रसन्न करने के लिए तक्षक ने कड़ी तपस्या की थी. भोलेबाबा ने नागराज तक्षक को अमरता का वरदान दिया था, लेकिन वह भोलेनाथ के साथ ही रहना चाहते थे. इसके बाद नागराज तक्षक की घोर तपस्पा से खुश होकर बाबा महाकाल ने उन्हें वहीं वास करने का आशीर्वाद दिया था. इसलिए यह मंदिर साल में 1 दिन नागपंचमी के दिन 24 घंटे के लिए ही खुलता है. साल भर में एक बार कपाट खुलने के पीछे की असली वजह भी यही है कि नागराज तक्षक देवताओं और मनुष्यों के बीच विघ्न या कोई रूकावटे ना आए इसलिए इस मंदिर के कपाट नागपंचमी पर ही खुलने की प्रथा है.
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त्रिकाल पूजन का है विधान
मंदिर के कपाट खुलने के बाद नागचंद्रेश्वर की त्रिकाल पूजा का विधान अभी भी चलता आ रहा है। प्रथम पूजा महानिर्वाणी अखाड़े के संत करते हैं. दूसरी पूजा नाग पंचमी पर ही दोपहर प्रशासन की तरफ से अधिकारियों द्वारा की जाती है. तीसरी पूजा शाम साढ़े 7 बजे बाबा महाकाल की आरती के बाद मंदिर समिति की तरफ से महाकाल मंदिर मुख्य पुजारियों द्वारा की जाती है. इसके बाद ठीक 12 बजे नागचंद्रेश्वर धाम के कपाट फिर से 1 साल के लिए बंद कर दिए जाते हैं.
काफी विशेष है मंदिर में मूर्ति
नागचंद्रेश्वर मंदिर में मूर्ति की अपनी अलग ही खासियत है. यह मूर्ति 11वीं सदी में नेपाल से उज्जैन लाई गई थी. इस मंदिर का इतिहास राजा भोज से जुड़ा है. शेष शैय्या रूप में यहां भोले बाबा स्वंय मां पार्वती के साथ नाग की शैय्या पर विराजमान हैं. गणेश और कार्तिकेय भी परिवार सहित मूर्ति रूप में बैठे हैं. नागचंद्रेश्वर मंदिर में दर्शन से करने मात्र से लोगों में सांपों का डर खत्म होता है. घर की महिलाएं अपनी भाईयों की लंबी उम्र के लिए व परिवार में सुख शांति की कामना करती हैं. भक्तों की मान्यता यह भी है कि यहां दर्शन करने से काल सर्प दोष भी खत्म होता है. इसके साथ ही मान्यता यह भी है कि भोलेबाबा को नाग अत्यंत प्रिय है, इसलिए आज नागपंचमी के अवसर पर महाकाल के दर्शन करते के साथ-साथ नागचंद्रेश्वर मंदिर में भी दर्शन पूजन कर अपनी मनोकामना पूर्ण करने की कामना करते हैं. फिलहाल मंदिर से जुड़ी मान्यता की सच्चाई कितनी सटीक है इसकी पुष्टी टीएनपी न्यूज चैनल नहीं करता।
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Written By: MADHVI TANWAR