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SIR के खिलाफ प्रदर्शन, अब 300 लोगों पर FIR! गोवा में 'हिंदुत्व मुर्दाबाद' के नारों पर बवाल

Shailesh Yadav · 18 अक्टूबर 2026
Goa CJP Protest FIR

Goa CJP Protest FIR: मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) में कथित गड़बड़ियों को लेकर शुरू हुआ विरोध प्रदर्शन अब गोवा में कानूनी विवाद में घिर गया है। पणजी में 11 अक्टूबर को हुए प्रदर्शन के मामले में पुलिस ने कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के पदाधिकारियों और समर्थकों समेत करीब 300 लोगों के खिलाफ FIR दर्ज की है।

आरोप है कि प्रदर्शन के दौरान 'हिंदुत्व मुर्दाबाद' जैसे नारे लगाए गए, जिससे धार्मिक भावनाएं आहत हुईं। पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धाराओं 196 और 299 के तहत मामला दर्ज किया है। लेकिन इस विवाद की शुरुआत कहां से हुई, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग क्यों उठी और अब तक इस मामले में क्या-क्या हुआ? समझिए पूरा घटनाक्रम।

SIR के विरोध से धार्मिक विवाद तक, क्या है पूरा मामला?
गोवा की राजधानी पणजी में 11 अक्टूबर को कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के बैनर तले विरोध प्रदर्शन किया गया था। प्रदर्शनकारी मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR में कथित गड़बड़ियों और मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के मुद्दे को उठा रहे थे। उनकी मांग मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की थी।

हालांकि, अब यह प्रदर्शन अपने मूल मुद्दे से आगे बढ़कर धार्मिक नारों के आरोपों को लेकर चर्चा में है। पणजी पुलिस के मुताबिक, प्रदर्शन के दौरान 'मुर्दाबाद, मुर्दाबाद, हिंदुत्व मुर्दाबाद' जैसे नारे लगाए गए। पुलिस का आरोप है कि इन नारों से धार्मिक असंतोष फैलने और हिंदू समुदाय की भावनाएं आहत होने की आशंका पैदा हुई। यही आरोप अब FIR का आधार बने हैं। हालांकि, आरोपों की अंतिम पुष्टि जांच और न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही हो सकती है।

300 प्रदर्शनकारियों के खिलाफ FIR क्यों दर्ज हुई?
पणजी पुलिस इंस्पेक्टर विजयकुमार चोडनकर ने FIR दर्ज किए जाने की पुष्टि की है। पुलिस के अनुसार, प्रदर्शन के दौरान लगाए गए कथित नारों को लेकर भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 196 और 299 के तहत मामला दर्ज किया गया है। धारा 196 विभिन्न समूहों के बीच धर्म, नस्ल, भाषा या अन्य आधारों पर वैमनस्य बढ़ाने से संबंधित अपराधों से जुड़ी है। वहीं, धारा 299 जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण तरीके से किसी वर्ग की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के इरादे से किए गए कृत्यों से संबंधित है।

पुलिस ने जिन आरोपों के आधार पर कार्रवाई की है, उनकी जांच के दौरान यह महत्वपूर्ण होगा कि नारे किस संदर्भ में लगाए गए, उनका आशय क्या था और क्या वे संबंधित कानूनी प्रावधानों के तहत अपराध बनते हैं।

सोशल मीडिया वीडियो से कैसे शुरू हुई शिकायत?
इस मामले में शिकायत तलेइगाओ निवासी रामप्रसाद केलकर ने दर्ज कराई। उन्होंने बताया कि उन्होंने सोशल मीडिया पर 11 अक्टूबर के विरोध प्रदर्शन का एक वीडियो देखा था। इसके बाद उन्होंने पुलिस से शिकायत की। केलकर के मुताबिक, प्रदर्शनकारी मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग कर रहे थे। उन्होंने अपनी शिकायत में यह भी दावा किया कि प्रदर्शन के दौरान हिंदुओं के खिलाफ नारे लगाए गए, जिससे सामाजिक शांति और सद्भाव प्रभावित हो सकता था।

शिकायतकर्ता ने स्थानीय समाचार रिपोर्टों का हवाला देते हुए यह भी कहा कि प्रदर्शन की अनुमति के लिए उत्तर गोवा के जिला प्रशासन से संपर्क किया गया था, लेकिन अनुमति नहीं मिली थी। यह शिकायतकर्ता के आरोप हैं। वीडियो, उपलब्ध साक्ष्यों और प्रदर्शन की परिस्थितियों की जांच के बाद ही पूरे मामले की वास्तविक स्थिति स्पष्ट होगी।

प्रशासन ने अनुमति नहीं दी, फिर आजाद मैदान में क्या हुआ?
रिपोर्ट के मुताबिक, जिला प्रशासन से अनुमति नहीं मिलने के बावजूद प्रदर्शनकारी आजाद मैदान में पहुंच गए थे। इसके बाद पुलिस ने सात प्रदर्शनकारियों को हिरासत में ले लिया। मामले ने उस समय नया मोड़ लिया, जब 11 अक्टूबर की देर शाम बॉम्बे हाईकोर्ट में एक याचिका पर सुनवाई हुई। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, सुनवाई के बाद हिरासत में लिए गए सात प्रदर्शनकारियों को रिहा कर दिया गया।

यहां एक बात समझना जरूरी है कि हिरासत में लिया जाना, FIR दर्ज होना और किसी अपराध में दोषी साबित होना अलग-अलग कानूनी स्थितियां हैं। रिहाई को अपने आप में आरोपों से बरी होना भी नहीं माना जा सकता।

मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत ने क्या कहा?
गोवा के मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत ने कहा था कि घटना की जांच चल रही है। उन्होंने स्पष्ट किया कि राज्य सरकार सांप्रदायिक सद्भाव बिगाड़ने की किसी भी कोशिश को बर्दाश्त नहीं करेगी। अब पुलिस की जांच में प्रदर्शन के वीडियो, शिकायत में लगाए गए आरोप और अन्य उपलब्ध साक्ष्य अहम भूमिका निभा सकते हैं। जांच के आधार पर ही आगे की कार्रवाई की दिशा तय होगी।

CJP के नेताओं की गिरफ्तारी का मामला क्या है?
SIR में कथित हेराफेरी का आरोप लगाकर CJP मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग कर रही है। खबर में दी गई जानकारी के मुताबिक, पार्टी के तीन प्रमुख नेताओं अभिजीत दीपके, आशुतोष रांका और सौरभ दास को भी इस आंदोलन के सिलसिले में जेल जाना पड़ा है। इससे आंदोलन और उससे जुड़ी कानूनी कार्रवाइयों को लेकर राजनीतिक विवाद और गहरा गया है। हालांकि, इन नेताओं के मामलों की सटीक कानूनी स्थिति और गोवा की FIR में उनकी व्यक्तिगत भूमिका की अलग से पुष्टि आवश्यक है।

अब सबसे बड़ा सवाल, SIR का मुद्दा पीछे छूट जाएगा?
इस पूरे विवाद में दो अलग-अलग मुद्दे सामने हैं। पहला, मतदाता सूची में कथित गड़बड़ियों और नाम हटाए जाने को लेकर उठाए गए सवाल। दूसरा, प्रदर्शन के दौरान धार्मिक भावनाओं को आहत करने वाले कथित नारों का मामला। किसी प्रदर्शन के दौरान लगाए गए नारों की जांच और मतदाता सूची से जुड़े आरोपों की पड़ताल अलग-अलग आधारों पर होनी चाहिए। एक मुद्दे पर विवाद दूसरे मुद्दे की जांच का विकल्प नहीं बन सकता।

फिलहाल, गोवा में 300 प्रदर्शनकारियों के खिलाफ FIR दर्ज होने से CJP का विरोध प्रदर्शन कानूनी जांच के दायरे में आ गया है। अब निगाहें पुलिस की जांच पर हैं, जिससे स्पष्ट हो सकेगा कि कथित नारों और प्रदर्शन की परिस्थितियों में कानून के तहत अपराध बनता है या नहीं। 

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