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अमित शाह के 62वें जन्मदिन पर चर्चा में उनका सफर, अनुच्छेद 370 से नक्सलवाद तक जानिए प्रमुख फैसले

Shivashakti Narayan Singh · 22 अक्टूबर 2026
अमित शाह के 62वें जन्मदिन पर चर्चा में उनका सफर

नई दिल्ली: केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह 22 अक्टूबर को 62 साल के हो गए। बीजेपी के संगठन को देशभर में मजबूत करने से लेकर गृह मंत्रालय की जिम्मेदारी संभालने तक, उनके राजनीतिक सफर में कई बड़े फैसले और अभियान शामिल रहे हैं। अनुच्छेद 370 हटाने, नए आपराधिक कानून लागू करने, आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई और नक्सलवाद पर अंकुश लगाने की रणनीति उनके कार्यकाल के प्रमुख मुद्दों में रही है।

ANI की रिपोर्ट के मुताबिक, अमित शाह ने 2014 में बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष की जिम्मेदारी संभाली थी। उनके नेतृत्व में पार्टी ने कई राज्यों में अपना संगठन और राजनीतिक प्रभाव बढ़ाया। वर्ष 2019 में केंद्र में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली दूसरी सरकार बनने के बाद शाह को गृह मंत्रालय की जिम्मेदारी मिली। इसके बाद केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर की संवैधानिक व्यवस्था से लेकर आपराधिक न्याय प्रणाली तक कई अहम बदलाव किए।

गुजरात से राष्ट्रीय राजनीति तक का सफर

अमित शाह का जन्म 22 अक्टूबर 1964 को गुजरात में कुसुमबेन और अनिलचंद्र शाह के परिवार में हुआ था। युवावस्था में वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से जुड़े और बाद में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) में सक्रिय रहे। उन्होंने गुजरात में बीजेपी के संगठन के साथ काम करते हुए अपनी राजनीतिक पहचान बनाई। वर्ष 1991 में लालकृष्ण आडवाणी और 1996 में अटल बिहारी वाजपेयी के गांधीनगर संसदीय क्षेत्र के चुनाव अभियानों में भी उनकी भूमिका रही। 2013 में शाह को बीजेपी का राष्ट्रीय महासचिव और उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाया गया। 2014 के लोकसभा चुनाव में पार्टी की बड़ी जीत के बाद जुलाई 2014 में वह बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने। उनके अध्यक्ष रहते पार्टी ने कई राज्यों में चुनावी सफलता हासिल की। मई 2018 तक बीजेपी और उसके सहयोगी दलों की सरकारें 21 राज्यों में थीं।

अनुच्छेद 370 हटाना रहा कार्यकाल का बड़ा फैसला

1 जून 2019 को गृह मंत्री का पद संभालने के कुछ ही महीनों बाद अमित शाह के कार्यकाल में जम्मू-कश्मीर को लेकर बड़ा संवैधानिक बदलाव हुआ। अगस्त 2019 में केंद्र सरकार ने अनुच्छेद 370 के तहत जम्मू-कश्मीर को मिली विशेष संवैधानिक व्यवस्था को समाप्त करने और राज्य को जम्मू-कश्मीर तथा लद्दाख नाम के दो केंद्रशासित प्रदेशों में पुनर्गठित करने का फैसला किया। सरकार ने इस कदम को राष्ट्रीय एकीकरण, विकास और सुरक्षा के लिहाज से अहम बताया। हालांकि, इस फैसले पर राजनीतिक और कानूनी स्तर पर व्यापक बहस भी हुई। शाह के गृह मंत्री रहते नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA), 2019 भी संसद से पारित हुआ। इस कानून में पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आए पात्र हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई प्रवासियों को भारतीय नागरिकता देने के लिए विशेष प्रावधान किए गए। इसके नियम मार्च 2024 में अधिसूचित किए गए।

नए आपराधिक कानूनों से न्याय व्यवस्था में बदलाव

अमित शाह के कार्यकाल में भारतीय आपराधिक न्याय व्यवस्था से जुड़े तीन नए कानून लागू हुए। भारतीय न्याय संहिता, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता और भारतीय साक्ष्य अधिनियम ने क्रमशः भारतीय दंड संहिता (IPC), दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) और भारतीय साक्ष्य अधिनियम की जगह ली। ये कानून 1 जुलाई 2024 से लागू हुए, हालांकि कुछ प्रावधानों में अपवाद रखे गए। सरकार के अनुसार, इन कानूनों का उद्देश्य आपराधिक न्याय प्रणाली को आधुनिक बनाना, तकनीक और फॉरेंसिक साक्ष्यों के इस्तेमाल को बढ़ावा देना तथा जांच और न्यायिक प्रक्रिया को समयबद्ध बनाना है। जेल प्रशासन में सुधार के लिए मॉडल प्रिजन एक्ट, 2023 भी तैयार किया गया। यह राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को जेल प्रबंधन को आधुनिक बनाने के लिए एक रूपरेखा देता है। इसे अपनाने का फैसला संबंधित राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों पर निर्भर है।

आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई और पूर्वोत्तर में शांति समझौते

गृह मंत्रालय के कार्यकाल में आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई भी प्रमुख प्राथमिकताओं में शामिल रही। सितंबर 2022 में केंद्र सरकार ने गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम यानी UAPA के तहत पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) और उससे जुड़े संगठनों को पांच साल के लिए गैरकानूनी घोषित किया था। वर्ष 2019 में UAPA और राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) कानून में भी संशोधन किए गए। इनके जरिए आतंकवाद से जुड़े मामलों में कानूनी प्रावधानों और जांच एजेंसी की शक्तियों का दायरा बढ़ाया गया। पूर्वोत्तर में उग्रवाद और लंबे समय से चले आ रहे संघर्षों से निपटने के लिए केंद्र ने विभिन्न संगठनों और समुदायों के प्रतिनिधियों के साथ कई शांति समझौते भी किए। इनका उद्देश्य हिंसा कम करना, उग्रवादी समूहों के सदस्यों के पुनर्वास और आत्मसमर्पण को प्रोत्साहित करना तथा क्षेत्र में स्थिरता और विकास को बढ़ावा देना रहा है।

31 मार्च 2026 रखा था नक्सलवाद खत्म करने का लक्ष्य

वामपंथी उग्रवाद यानी नक्सलवाद के खिलाफ अभियान भी शाह के कार्यकाल का एक प्रमुख हिस्सा रहा है। केंद्र सरकार ने सुरक्षा अभियानों के साथ खुफिया एजेंसियों के बीच तालमेल, सड़क और दूसरी बुनियादी सुविधाओं के विस्तार तथा प्रभावित क्षेत्रों में प्रशासनिक पहुंच बढ़ाने पर जोर दिया। ANI की रिपोर्ट के अनुसार, अमित शाह ने नक्सलवाद को समाप्त करने के लिए 31 मार्च 2026 की समयसीमा तय की थी और रिपोर्ट में इस लक्ष्य को हासिल किए जाने का दावा किया गया है। हालांकि, देशभर में नक्सलवाद पूरी तरह समाप्त होने की स्थिति का आकलन करने के लिए संबंधित सरकारी आंकड़ों और सुरक्षा संबंधी अपडेट को अलग से देखना जरूरी है।

नशा तस्करी और सीमा सुरक्षा पर भी जोर

केंद्र सरकार ने नशा तस्करी के खिलाफ अभियान तेज करने पर भी ध्यान दिया है। रिपोर्ट के मुताबिक, सरकार का लक्ष्य दिसंबर 2029 तक इस नेटवर्क को खत्म करने की दिशा में काम करना है। इस रणनीति में तस्करी के नेटवर्क, वित्तीय लेनदेन, अंतरराज्यीय संपर्कों और अंतरराष्ट्रीय मार्गों की जांच शामिल है।इसके अलावा, गंभीर अपराधों के आरोपियों को विदेश से भारत वापस लाने के लिए NIA, इंटरपोल और विदेशी कानून प्रवर्तन एजेंसियों के साथ समन्वय किया जाता है। सीमा सुरक्षा के लिए तकनीक, निगरानी प्रणालियों और खुफिया जानकारी के इस्तेमाल पर भी जोर दिया गया है। जून 2024 में लोकसभा चुनाव के बाद अमित शाह ने एक बार फिर केंद्रीय मंत्रिमंडल में गृह मंत्री की जिम्मेदारी संभाली। उनके पास सहकारिता मंत्रालय का प्रभार भी बना रहा, जिसकी जिम्मेदारी उन्हें 2021 में दी गई थी।

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