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AIIMS दिल्ली में 44 साल की महिला की दुर्लभ सर्जरी, सिर्फ 98 सेंटीमीटर लंबा था कद; 90 मिनट में डॉक्टरों ने कर दिखाया कमाल

Shailesh Yadav · 17 अक्टूबर 2026
AIIMS दिल्ली में 44 साल की महिला की दुर्लभ सर्जरी (ANI)

नई दिल्ली: दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) के डॉक्टरों ने एक जटिल सर्जरी को सफलतापूर्वक अंजाम देकर चिकित्सा क्षेत्र में महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। डॉक्टरों की बहुविषयक टीम ने 44 वर्षीय महिला की लैप्रोस्कोपिक हिस्टेरेक्टॉमी यानी दूरबीन विधि से गर्भाशय निकालने की सर्जरी की। महिला का कद महज 98 सेंटीमीटर और वजन 22 किलोग्राम था। उन्हें गंभीर ऑस्टियोपोरोसिस की समस्या भी थी, जिससे सर्जरी के दौरान हड्डियों में फ्रैक्चर और एनेस्थीसिया से जुड़ी जटिलताओं का खतरा बढ़ गया था।

हड्डियों के कमजोर होने से सर्जरी थी चुनौतीपूर्ण
महिला डीप एंडोमेट्रियोसिस और एडेनोमायोसिस से पीड़ित थीं। इन स्थितियों के कारण उन्हें पेल्विक क्षेत्र में तेज दर्द का सामना करना पड़ रहा था और सर्जरी की जरूरत थी। हालांकि, उनका बेहद कम कद, कम वजन और हड्डियों की गंभीर कमजोरी डॉक्टरों के सामने बड़ी चुनौती थी। ऐसी स्थिति में मरीज को सही तरीके से लिटाना, शरीर को सुरक्षित रखना और सांस से जुड़ी जटिलताओं से बचाना बेहद जरूरी था। डॉक्टरों ने महिला की शारीरिक स्थिति के अनुसार विशेष पोजिशनिंग, दर्द प्रबंधन और सावधानीपूर्वक सर्जिकल तकनीक का इस्तेमाल किया।

90 मिनट में पूरी हुई सर्जरी, तीसरे दिन मिली छुट्टी
AIIMS की टीम ने करीब 90 मिनट में लैप्रोस्कोपिक सर्जरी पूरी की। यह कम चीर-फाड़ वाली प्रक्रिया थी। सर्जरी के बाद महिला की हालत स्थिर रही और उनकी रिकवरी भी बेहतर रही। उन्हें ऑपरेशन के तीसरे दिन अस्पताल से छुट्टी दे दी गई।

इस प्रक्रिया में स्त्री रोग विभाग की प्रोफेसर रीता माहे और डॉ. स्वाति तोमर के नेतृत्व वाली टीम के साथ एनेस्थीसिया विभाग के डॉ. परिन लालवानी और डॉ. चोरो अथिफ्रो कायिना शामिल थे। स्त्री रोग विभाग की प्रमुख प्रोफेसर नीना मल्होत्रा और प्रोफेसर के. अपर्णा शर्मा का भी इस उपलब्धि में योगदान रहा।

AIIMS में सुपर माइक्रोसर्जरी से भी बढ़ रहीं इलाज की संभावनाएं
AIIMS दिल्ली में जटिल सर्जरी के क्षेत्र में एक अन्य महत्वपूर्ण पहल के तहत 16 और 17 सितंबर को सुपर माइक्रोसर्जरी कार्यशाला आयोजित की गई थी। इसमें छह सर्जरी और अत्याधुनिक चिकित्सा तकनीकों का प्रदर्शन किया गया। सुपर माइक्रोसर्जरी, सामान्य माइक्रोसर्जरी का उन्नत रूप है।

इसमें 0.8 मिलीमीटर से भी छोटी रक्त वाहिकाओं पर काम किया जाता है। कुछ प्रक्रियाओं में 0.3 से 0.5 मिलीमीटर तक की बेहद महीन रक्त वाहिकाओं को जोड़ने की जरूरत होती है। इसके लिए अत्याधुनिक सर्जिकल माइक्रोस्कोप और बेहद महीन उपकरणों का इस्तेमाल किया जाता है। टांके बाल की एक लट से भी कई गुना पतले हो सकते हैं।

हाथ-पैर की सूजन और डायबिटिक फुट का भी इलाज
प्लास्टिक सर्जरी विभाग की ओर से आयोजित इस कार्यशाला में फाइलेरिया और स्तन कैंसर के बाद हाथ में होने वाली सूजन यानी लिम्फेडेमा के लिए लिम्फैटिक सुपर माइक्रोसर्जरी की गई। इसके अलावा, लंबे समय से नहीं भर रहे डायबिटिक फुट अल्सर के पुनर्निर्माण के लिए बेहद पतली त्वचा की फ्लैप तकनीक का प्रदर्शन किया गया।

कार्यशाला में दक्षिण कोरिया के प्रसिद्ध विशेषज्ञ प्रोफेसर जून पियो (जे.पी.) होंग ने प्रमुख विशेषज्ञ के रूप में हिस्सा लिया। उनके साथ कोयंबटूर के गंगा अस्पताल के डॉ. हरि वेंकट्रमणि, कासरगोड के एस्टर अस्पताल की डॉ. समरीन जाफर और AIIMS के विशेषज्ञों ने भी योगदान दिया।

नई तकनीकों से मरीजों को मिल सकते हैं बेहतर विकल्प
कार्यशाला में इंडोसायनिन ग्रीन (ICG) इंफ्रारेड मैपिंग और हाई-फ्रीक्वेंसी अल्ट्रासाउंड मैपिंग जैसी तकनीकों का प्रदर्शन भी किया गया। इनकी मदद से बेहद छोटी रक्त और लसीका वाहिकाओं की पहचान करने में सहायता मिल सकती है। AIIMS दिल्ली में हर साल 300 से अधिक माइक्रोसर्जरी प्रक्रियाएं की जाती हैं।

सुपर माइक्रोसर्जरी और नई मैपिंग तकनीकों को अपनाने से कैंसर के बाद होने वाली सूजन, लिम्फेडेमा और डायबिटिक फुट जैसी समस्याओं के इलाज के विकल्प बढ़ सकते हैं। इन तकनीकों की संभावनाओं पर पुनर्निर्माण सर्जरी के साथ अन्य चुनिंदा क्षेत्रों में भी काम किया जा रहा है। 

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