730 दिन की Child Care Leave पर बड़ा प्रस्ताव, अब मां ही नहीं पिता भी निभाएंगे बराबर जिम्मेदारी
नई दिल्ली: भारत में कामकाजी माता-पिता के लिए बच्चों की देखभाल से जुड़ी छुट्टियों के नियमों में बड़ा बदलाव हो सकता है। राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) ने केंद्र सरकार को 37 सिफारिशें भेजी हैं, जिनमें मौजूदा 730 दिन की Child Care Leave (CCL) व्यवस्था को जेंडर-न्यूट्रल बनाने का प्रस्ताव शामिल है। इसका मतलब है कि बच्चे की देखभाल की जिम्मेदारी सिर्फ मां तक सीमित न रहकर पिता भी बराबर तौर पर निभा सकेंगे।
NCW ने सुझाव दिया है कि मौजूदा 730 दिनों की Child Care Leave को कामकाजी माता-पिता के बीच साझा किया जाए। प्रस्ताव के तहत दोनों अभिभावकों को 365-365 दिन की छुट्टी मिल सकती है। अगर दोनों माता-पिता एक ही संस्थान में काम करते हैं, तो उन्हें 730 दिनों का एक साझा पूल उपलब्ध कराने का विकल्प भी दिया जा सकता है।
अभी क्या है 730 दिन की Child Care Leave की व्यवस्था?
मौजूदा नियमों के तहत Central Civil Services (Leave) Rules के अनुसार पात्र महिला केंद्रीय सरकारी कर्मचारी अपनी पूरी सेवा अवधि के दौरान अपने दो सबसे बड़े जीवित बच्चों की देखभाल के लिए अधिकतम 730 दिन की Child Care Leave ले सकती हैं। यह सुविधा सामान्य तौर पर बच्चों के 18 वर्ष की आयु तक उपलब्ध है। दिव्यांग बच्चे के मामले में आयु सीमा अलग है।
समय के साथ इस व्यवस्था में कुछ बदलाव भी किए गए हैं। CCL की न्यूनतम अवधि को 15 दिन से घटाकर 5 दिन किया गया है। निर्धारित नियमों और सक्षम अधिकारी की मंजूरी के अधीन कर्मचारी CCL के दौरान मुख्यालय से बाहर जाने या विदेश यात्रा करने की अनुमति भी ले सकते हैं।
हालांकि, यह सुविधा अभी सभी कामकाजी अभिभावकों के लिए समान रूप से उपलब्ध नहीं है। 2020 में पुरुष सरकारी कर्मचारियों के लिए CCL की व्यवस्था की गई थी, लेकिन यह सुविधा मुख्य रूप से सिंगल मेल पैरेंट्स, जैसे विधुर, तलाकशुदा या अकेले बच्चों की परवरिश कर रहे अविवाहित पिता के लिए है।
NCW अब इसी व्यवस्था को व्यापक और जेंडर-न्यूट्रल बनाने की दिशा में बदलाव चाहता है।
730 दिनों को माता-पिता के बीच बांटने का प्रस्ताव
NCW के प्रस्ताव के मुताबिक 730 दिनों की CCL को दोनों कामकाजी अभिभावकों के बीच 365-365 दिन के बराबर हिस्से में बांटा जा सकता है।
वहीं, यदि माता-पिता एक ही संगठन में काम करते हैं तो दोनों के लिए 730 दिनों का एक कॉमन चाइल्डकेयर लीव पूल बनाने का विकल्प भी हो सकता है।
आयोग ने बच्चों के शुरुआती वर्षों पर भी विशेष जोर दिया है। 0 से 2 वर्ष की उम्र के बच्चों के लिए 60:40 के साझा देखभाल मॉडल का सुझाव दिया गया है, जिसमें प्राथमिक और द्वितीयक देखभालकर्ता के बीच जिम्मेदारी बांटने की बात कही गई है।
इसका उद्देश्य यह है कि बच्चे के जन्म के बाद लंबे समय तक करियर से दूर रहने की जिम्मेदारी सिर्फ मां पर न आए। पिता भी बच्चे की देखभाल के लिए पर्याप्त समय ले सकें और मां अपने करियर में अपेक्षाकृत जल्दी वापस लौट सके।
सभी सेक्टर में Paid Paternity Leave की मांग
NCW ने सभी क्षेत्रों में अनिवार्य Paid Paternity Leave लागू करने की भी सिफारिश की है। इसमें सरकारी, निजी और असंगठित क्षेत्र शामिल हैं।
आयोग का मानना है कि पिता की शुरुआती childcare में भागीदारी बढ़ाना जरूरी है। इससे बच्चे की देखभाल का बोझ सिर्फ महिलाओं पर नहीं रहेगा और परिवार में caregiving की जिम्मेदारी अधिक समान रूप से बंट सकेगी।
Child Care Leave और Maternity Leave में क्या अंतर है?
Child Care Leave और Maternity Leave एक जैसी नहीं हैं। Maternity Leave गर्भावस्था, प्रसव और प्रसव के बाद की अवधि से जुड़ी छुट्टी है, जबकि Child Care Leave पहले से जन्मे बच्चे की देखभाल के लिए ली जाती है।
केंद्रीय सरकारी सेवा नियमों के तहत पात्र महिला कर्मचारियों के लिए 730 दिन तक की CCL की व्यवस्था है। यह सुविधा वर्तमान में प्राइवेट सेक्टर के कर्मचारियों के लिए सार्वभौमिक कानूनी अधिकार नहीं है।
यही वजह है कि NCW ने निजी क्षेत्र तक इस व्यवस्था को विस्तार देने की सिफारिश की है।
सुप्रीम कोर्ट भी कर चुका है Paternity Leave की वकालत
NCW का यह प्रस्ताव ऐसे समय आया है जब सुप्रीम कोर्ट भी पितृत्व अवकाश के महत्व पर जोर दे चुका है।
मार्च 2026 में Hamsaanandini Nanduri v. Union of India मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने पितृत्व अवकाश को सामाजिक सुरक्षा लाभ के रूप में मान्यता देने के लिए कानूनी प्रावधान बनाने पर विचार करने की बात कही थी।
कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि बच्चों की शुरुआती देखभाल में पिता की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। पर्याप्त पितृत्व अवकाश की व्यवस्था नहीं होने से पारंपरिक लैंगिक भूमिकाएं और मजबूत हो सकती हैं।
केंद्रीय सरकारी नियमों में निर्धारित परिस्थितियों में पुरुष सरकारी कर्मचारियों के लिए 15 दिन के पितृत्व अवकाश का प्रावधान है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने व्यापक स्तर पर पितृत्व अवकाश की जरूरत को रेखांकित किया।
Private Sector में लागू करना सबसे बड़ी चुनौती
NCW की सिफारिशों का सबसे अहम हिस्सा निजी क्षेत्र में जेंडर-न्यूट्रल Child Care Leave को लागू करने की मांग है।
आयोग ने इसके लिए चरणबद्ध व्यवस्था का सुझाव दिया है। शुरुआत बड़े उद्योगों से हो सकती है और बाद में मध्यम तथा छोटे उद्यमों को इसमें शामिल किया जा सकता है।
NCW ने Child Care Leave को Social Security Code में शामिल करने, साथ ही ऐसे नियोक्ताओं को वित्तीय प्रोत्साहन और टैक्स सपोर्ट देने की भी सिफारिश की है, जो बेहतर childcare policies लागू करते हैं।
'मां बनने की कीमत करियर से नहीं चुकानी पड़े'
NCW ने महिलाओं के सामने आने वाली कई कार्यस्थल चुनौतियों को भी रेखांकित किया है। इनमें भर्ती के दौरान भेदभाव, प्रमोशन में देरी, वेतन पर असर और childcare leave लेने वाली महिलाओं को कम committed मानने जैसी धारणाएं शामिल हैं।
आयोग का मूल संदेश है कि मां बनना किसी महिला के करियर के लिए नुकसान का कारण नहीं बनना चाहिए।
2030 तक 5 लाख Creche Seats का प्रस्ताव
NCW ने केवल छुट्टी की व्यवस्था बदलने की बात नहीं की है। आयोग ने एक व्यापक National Childcare Infrastructure Mission की भी सिफारिश की है।
इसके तहत 2030 तक करीब 5 लाख क्रेच सीटें तैयार करने का प्रस्ताव है। इसके लिए:
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कार्यस्थल पर ऑन-साइट क्रेच
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साझा या क्लस्टर क्रेच सुविधाएं
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State Childcare Fund में योगदान
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क्रेच के लिए न्यूनतम राष्ट्रीय मानक
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Work From Home की सुविधा
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Flexible Workload व्यवस्था
जैसे उपाय सुझाए गए हैं।
Informal और Gig Workers को भी लाभ देने की कोशिश
NCW ने उन महिलाओं के लिए भी चिंता जताई है जो औपचारिक रोजगार व्यवस्था से बाहर हैं। आयोग के मुताबिक बड़ी संख्या में महिला श्रमिकों को मौजूदा सामाजिक सुरक्षा और childcare benefits का प्रभावी कवरेज नहीं मिल पाता।
इसीलिए अनौपचारिक क्षेत्र, Gig Workers और Platform Workers के लिए भी मातृत्व और childcare benefits उपलब्ध कराने की सिफारिश की गई है।
क्या बदलेगा अगर प्रस्ताव लागू हुआ?
अगर NCW की सिफारिशों को लागू किया जाता है तो भारत में childcare की पूरी व्यवस्था में बड़ा बदलाव आ सकता है।
730 दिनों की Child Care Leave केवल महिलाओं से जुड़ी सुविधा न रहकर shared parental entitlement बन सकती है। पिता बच्चों की देखभाल के लिए लंबी अवधि की छुट्टी ले सकेंगे और मां के करियर पर पड़ने वाला अतिरिक्त दबाव कम हो सकता है।
यानी प्रस्ताव सिर्फ पिता को ज्यादा छुट्टी देने तक सीमित नहीं है। इसका बड़ा उद्देश्य भारत में caregiving की पूरी व्यवस्था को बदलना है-जहां बच्चे की जिम्मेदारी मां और पिता दोनों की साझा जिम्मेदारी मानी जाए और इसके लिए छुट्टी, क्रेच और flexible workplace जैसी सुविधाएं भी उपलब्ध हों।
हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि ये NCW की सिफारिशें हैं। इन्हें लागू करने के लिए केंद्र सरकार की ओर से नीतिगत और कानूनी फैसले की जरूरत होगी।